हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (14)

धन व सुख / Wealth and Happiness

To read article in english please click here


मन में सदा इच्छाएँ उठती रहती हैं और मन इन इच्छाओं की पूर्ति चाहता है (देखें: हम न भूलें-13)। यदि इन इच्छाओं को पूरा नहीं किया गया तो हमें दुख होगा, मन निरंतर ऐसा आभास कराने का भी प्रयास करता रहता है। इस दुख से बचने के लिए हम इच्छा पूरी करने का प्रयास करते हैं, कर्म करते हैं। हमारा कर्म करने का उद्देश्य, अपनी दुख से रक्षा होता है और हमारी सदा यह अपेक्षा होती है कि हमारे कर्म करने से हमारी इच्छा पूरी होगी और हमें दुख नहीं होगा। ऐसे में हमारे कर्म का परिणाम

  • दुख न मिलाना

  • दुख दूर करने मे सफलता अथवा

  • दुख की ही प्राप्ति

हो सकता है। इन दुखों से बचना हर व्यक्ति अपना कर्त्तव्य समझता है। वह मानता है कि इन दुखों से बचने पर ही वह अपना जीवन अच्छे से बिता पावेगा, अपना जीवन सार्थक बना पाऐगा। इन दुखों से छुटकारा पाने के लिए ही भिन्न-भिन्न धर्म, पंथ, मत, संप्रदाय, गुट आदि ने अपने-अपने उपाय बताए हैं। (देखें: हम न भूलें-04)


ये सभी मत मनुष्य के जीवन को सुखी बनाने के लिए है परन्तु किसी भी मत के लोग आज सुखी नही है। सभी दुखी है। सारा संसार दुखी है। प्रत्येक मत के लोग अपने धर्म-स्थलों पर सुख-शान्ति की प्राप्ति के लिए जाते है जो उनके अनुसार उन्हे उनके धर्म-स्थल पर मिलती भी है पर वह थोडे समय के लिए ही होती है। उसके बाद वही चिंताएँ, दुख-क्लेश और पुन: शान्ति की अभिलाषा होने लगतीं हैं।


ये जितनी भी चिंताएँ है, दुख-क्लेश है, ये सब मनुष्य के कर्मों के कारण है। कभी यह दुख-क्लेश अपने कर्मों के कारण होता है तो कभी दूसरों के कर्मों के कारण। इनमे आधिकाँश वे कर्म होते है जिन्हे करने से हर धर्म रोकता है परन्तु मनुष्य इन्हे फिर भी करता है। हर धर्म के उपदेशक उपदेश देते है कि ऐसा न करो और ऐसे न करो। यदि तुम ऐसा करोगे तो यह प्रभु के निर्देशों के विपरीत होगा और ऐसा करने से प्रभु रुष्ट होगा। परन्तु मनुष्य पर इसका कोई प्रभाव नही पडता और मनुष्य स्वयं को ऐसे कर्मों को न करने से रोक नही पाते और ऐसे कर्मों को करने की उनकी आदत सी बन जाती है। ऐसा क्यों होता है? इसका क्या कारण है? (अन्य लेख में)


आज के युग मे मनुष्य, अपने लिए धन अर्जन करना सबसे मुख्य काम है, ऐसा पाता है। अपने धार्मिक स्थलों पर जा कर ईश्वर की उपासना करना, ईश्वर से प्रार्थना करना और जो उपदेश वहाँ मिले उसे सुन लेना, व्यक्ति का अपने धर्म के प्रति उसका पर्याप्त कर्त्तव्य है, उसका पालन है, ऐसा वह समझता है। यही कारण है कि जब भी मनुष्य धर्म-स्थल पर जाता है, ईश्वर उपासना करता है, ईश्वर से प्रार्थना भी करता है और जो उपदेश उसेसुनने को मिलता है, उसे सुनता भी है पर फिर भी उस उपदेश अनुसार अपना जीवन बनाने की चेष्टा नही करता और यदि प्रयास करता भी है तो वैसा कर नही पाता और धन-अर्जन मे ही लिप्त हो जाता है। वह सुनता तो है कि धर्मानुसार जीवन बनाने से सुख-शान्ति मिलती है परन्तु देखता यह है कि सभी लोग सुख-शान्ति धन के द्वारा प्राप्त करने मे लगे हैं। जिसके पास धन है वह धन होने से समाज मे हर स्थान पर सम्मान पाता है। धार्मिक व्यक्तियों को भी वह सम्मान नही मिलता जो इन धनी व्यक्तियों को प्राप्त होता है। निर्धन तो सदा अपमान व तिरस्कार ही पाता है।


आज जो धार्मिक बनने का उपदेश देते है वे भी धन एकत्रित करने मे जुटे हैं। जो कोई भी उन्हे धन प्राप्त करवाता है वे भी उसे ही सदा सम्मान देते है। ये उपदेशक भी वास्तव मे धार्मिक बनने के स्थान पर धनवान बनना चाहते हैं और धार्मिक उपदेश देना तो जैसे उनका व्यवसाय हो गया है। इस कारण धर्म के नाम पर जितना भी उपदेश दिया जाता है, सुना जाता है, वह लगभग एक औपचारिकता ही बन कर रह गया है। किसी पर उसका प्रभाव नही पडता। इसका प्रभाव तभी पडेगा जब धनवान से अधिक सम्मान ज्ञानी व धार्मिक व्यक्ति को मिलेगा जिससे लोग वास्तविक सुख-शान्ति अनुभव कर पावेंगे जो धर्मानुसार जीवन बनाने से प्राप्त होती है और जो उस सुख-शान्ति से कहीं अधिक आनन्ददायक है जो मनुष्य धन द्वारा प्राप्त कर पाता है।


आज ज्ञान की देवी सरस्वती की तुलना में, धन की देवी लक्ष्मी की पूजा अधिक की जाती है। क्या यह संकेत नहीं है कि समाज अध्यात्मवादी से ज्यादा भौतिकवादी हो रहा है। आज धन पाने की हमारी इच्छा ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से अधिक है। हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में यह उल्लेख किया गया है कि देवी सरस्वती लक्ष्मी देवी की बड़ी बहन है जिसका प्रतीकात्मक रूप से समझाने का प्रयास किया है कि यदि बड़ी बहन आपके साथ में है तो छोटी बहन स्वतः ही बड़ी बहन की उपस्थिति होने से अपने आप आ जाएगी। हमारे शास्त्रों में ज्ञान प्राप्त करने पर बहुत कुछ लिखा गया है, जैसे:


सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम्

अहार्यत्वादनर्ध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा


अर्थ: सब द्रव्यों में विद्यारुपी द्रव्य सर्वोत्तम है, क्योंकि वह किसी से हरा नहीं जा सकता; उसका मूल्य नहीं हो सकता, और उसका कभी नाश नहीं होता।


विद्या नाम नरस्य कीर्तिरतुला भाग्यक्षये चाश्रयो

धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा ।

सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्

तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु ॥


अर्थ: विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, कामधेनु है, विरह में रति समान है, तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, बगैर रत्न का आभूषण है; इस लिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन ।


"विद्या", शिक्षा ग्रहण करने पर ही प्राप्त होती है। दुर्भाग्यवश आज शिक्षा व्यवसायिक शिक्षा तक ही सीमित हो गई है। यह शिक्षा भी मात्र धन कमाने के उद्देश्य से ली जाती है जिस कारण शिक्षा पूरी होने के पश्चात व्यक्ति धन कमाने के लिए नैतिक-अनैतिक, धर्म-अधर्म आदि का ध्यान भी नहीं रखता। किसी शैक्षिक संस्थान से निर्धारित परीक्षा में उत्तीर्ण होना किसी को "शिक्षित" कहने के लिए पर्याप्त है और यदि अंग्रेजी भाषा बोलने की सामर्थ्य हो तो भारत में आप अवश्य ही शिक्षित माने जावेंगे। मात्र व्यवसायिक शिक्षा से ही यदि विद्या मिल जाती, ज्ञान आ जाता और व्यक्ति योग्य बन जाता तो समाज में लोग, “अच्छे-अध्यापक”, “अच्छे-डाक्टर”, “अच्छे-काम करने वाले”, आदि के बारे में नहीं पूछते।


आज शिक्षित होना किसी के ज्ञानी होने, योग्य होने का परिचायक नहीं है और दुर्भाग्यवश समाज ज्ञान व योग्यता के स्थान पर शिक्षा की अभिलाषा करता है चूँकि वह समझता है कि आज की व्यवसायिक शिक्षा उसे ज्ञानी व योग्य बना देगी जबकि किसी ज्ञानी व योग्य व्यक्ति के लिए उसका उन अमुक विषयों में शिक्षित होना अनिवार्य है। वास्तविकता में व्यवसायिक शिक्षा किसी को भी ज्ञानी व योग्य नहीं बना सकती। उसके लिए तो अन्य गुणों का होना भी अनिवार्य है जिनके लिए सार्वभौमिक शिक्षा (देखे: हम न भूलें-01, 02) हमारी मदद करती है।


ज्ञान” जानने को कहते हैं। किस कर्म का क्या परिणाम अथवा फल होगा या किस फल अथवा परिणाम की प्राप्ति किस प्रकार के कर्म से होगी; इस जानकारी का होना या जानना ही ज्ञान है। धन-प्राप्ति के लिए किए गए कर्म किस प्रकार किए गए और उनका परिणाम क्या केवल धन का मिलना ही होगा, इसका ज्ञान केवल शिक्षित होने पर नहीं मिलता। धन-प्राप्ति तो व्यक्ति के कर्म का मात्र एक अपरोक्ष (जो दिखे) परिणाम है। अपनी धन की स्वार्थ-पूर्ति के लिए किए कर्म के कितने ही परोक्ष व अपरोक्ष परिणाम हो सकते है, इसकी कल्पना भी वह स्वार्थ में लिप्त व्यक्ति नहीं कर सकता। जब मनुष्य कर्म किस कारण से किया गया है, किस प्रकार किया गया है और इस कर्म का क्या परोक्ष व अपरोक्ष परिणाम हो सकता है, इस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है तब उसकी इच्छा व कर्म के फल के बीच कोई विरोधाभास नही रहता और इच्छा व कर्म के फल के बीच एक समानता आ जाती है। ऐसा होने पर इच्छाओं और उनकी पूर्ति के लिए होने वाले कर्मों के लिए चिंताएं, दुख-क्लेश आदि कम होने लगते हैं व वास्तविक सुख का अनुभव होने लगता है और मनुष्य में संतुष्टि आने लगती है।


हम न भूलें कि


  • धन, जीवन-निर्वाह को सरल बनाने के लिए एक साधन हो सकता है, जीवन का लक्ष्य कदाचित नहीं।

  • यदि धन से ही दुख दूर होते और सभी सुख व साधन मिलते तो कोई भी धनी दुखी न होता।

  • शिक्षा, ज्ञान व योग्यता की पहली सीढ़ी है, शिखर नहीं।

  • जो समाज धन को अपना लक्ष्य और धनी को ही योग्य समझता है उसका पतन निश्चित है।

Wealth and Happiness

ऊपर


Desires always keep arising in the mind and the mind wants fulfillment of these desires. (see: Hum Naa Bhooleen-13). At the same time the mind also keeps trying to give us the impression that if these desires are not fulfilled, we will feel sad. To avoid this sorrow, we try to fulfill our desire and act. The purpose of doing action (karm) is to protect ourselves from sorrow and we always expect that our karm will fulfill our desire and we will not be sad. The result of our karm can be

  • no suffering

  • success in getting rid of sorrow or

  • the realization of new suffering

Every person considers it as his duty to avoid sorrows. He believes that only by avoiding sorrows, he will be able to live his life well and will be able to make it meaningful. Different religions, creeds, faiths, sects, groups etc. have suggested their respective ways to get rid of these sufferings. (see: Hum Naa Bhooleen-04)


All these paths shown by different religions are meant to make the life of a person happy, but followers of none of these paths are happy today. Everyone is sad. The whole world is sad. People of every faith go to their religious places to get happiness and peace, which, according to them, they find at their shrines too, but it is only for a short time. After that, the same worries, sorrows and grief begin again.


All these worries, sorrows and tribulations are due to person's deeds. Sometimes this misery is caused by our own actions and sometimes by the actions of others. Majority of actions among these are forbidden by nearly every religion but a person still does them. The preachers of every religion preach to not to do certain things and refrain from others. Doing things, which a person is not supposed to do will be in contradiction to the instructions of the Lord which will annoy Him. Unfortunately, it does not have any effect on human beings and people are not able to refrain themselves from doing such deeds which after some time becomes their habit. Why does this happen? What is the reason for this? (in other articles)


Today, a person finds earning wealth as the most important task. People think that worshiping God by going to their religious places, praying to God, and listening to the sermons at their respective shrines, is a person's sufficient duty towards his religion. This is the reason that although a person goes to the religious shrine, worships, prays to God and hears the sermon, but still does not try to live his life according to the sermons. In case a person tries to follow the teachings, he is unable to do so and again gets involved in earning money. He hears that leading life according to the path shown by religion brings peace and happiness but finds that people are engaged in achieving happiness and peace through wealth. A wealthy person is respected in every society. Even religious persons do not get as much respect as the wealthy. The unwealthy are always subject to insult.


Today those who preach to become religious are also busy in amassing wealth. They always respect people who make them rich or help them to gain wealth. In reality, they want to become rich instead of becoming religious. Preaching and giving religious lectures is like their business. For this reason, whatever is preached in the name of religion has almost become a formality. It does not affect anyone. Its effect will be experienced only when the knowledgeable people, religious persons will get more respect than the rich. Only then people will experience the real happiness and peace which is obtained by leading the life according to righteous path and this real peace and happiness is more enjoyable than the pleasure a person gets by accumulating wealth.


Today, Lakshmi, the goddess of wealth, is worshiped more than Saraswati, the goddess of knowledge. Isn't this an indication that society is becoming more materialistic than spiritualist? Today our desire to get wealth is stronger than the desire to gain knowledge. In Hindu religious texts Goddess Saraswati is mentioned as the elder sister of Lakshmi Devi. It is tried to explain symbolically that if the elder sister is with you then the younger sister will follow her and come to you on her own. Much has been written in our scriptures on acquiring knowledge, such as


sarvdravyeshu vidyaiv dravyamāhurnuttāmaṁ

ahārytvādandharyatvādakshyatvāchcha sarvadā


Meaning: Among all types of wealth, the wealth of knowledge is the best, because it cannot be defeated by anyone; It cannot be valued and can never be destroyed.


vidyā nām narasy kīrtirtulā bhāgyakshye chāshrayo

dhenuh kāmdudhā ratishch virhe netram trityam ch sā

satkārāytanam kulasy mahimā ratnairvinā bhushanam

tasmādanymupekshy sarvvishayam vidhyādhikāram kuru


Meaning:Knowledge is an incomparable achievement; When misfortune strikes you, it protects you, it is like Kamadhenu and gives you everything you need, it is like a beloved when alone, it is your third eye providing better vision, it is the temple of respect, it is glory, it is an ornament without gems. Therefore, leave all other subjects and become a seeker of knowledge.


"Knowledge" is attained only after receiving education. Unfortunately, today education is limited to vocational education. This education is also solely for the purpose of earning money. That is why even after completion of education, one does not consider moral-immoral, right-wrong, etc. while earning money. Passing the prescribed examination from an educational institution is enough to call someone "educated". In India if you have the ability to speak the English language, even without any institutional education, you are still considered educated. If a person would become knowledgeable, qualified and capable just by getting professional education, then why would people in the society look for “good” teachers, “good” doctors, “good workers”, etc.


Today, being educated is not a sign of being knowledgeable, qualified, and capable. Unfortunately, society aspires for education in place of knowledge and capability, because people believe that today's professional education will make them knowledgeable, qualified and capable, whereas for a knowledgeable, qualified and capable person it is mandatory to be educated in those subjects. Vocational education alone cannot make anyone knowledgeable, qualified and capable. Universal education can help a person to gain other qualities (see: Hum Naa Bhooleen-01, 02).


Knowledge” is to know. What will be the result of which action (karm) or what kind of result will be achieved by what kind of karm; to know this, is the knowledge of that subject. To attain wealth, what was done and how it was done, will the result of those actions be only the attainment of wealth, cannot be understood only by being educated. Getting wealth is just one visible result of the karm of the person. The person indulged in acquiring wealth to fulfill his selfishness has no idea about direct and indirect consequences of his actions. When a person has the knowledge about the reason of his karm, how the karm should be done and what can be the direct and indirect consequences of his karma, then there is no contradiction between his desire and the fruits of karm. When a person starts getting this knowledge, worries about desires and their fulfillment, inability of actions, sorrows, grief etc. start decreasing and real happiness is experienced. This leads to satisfaction.


Let us not forget that


  • Money can be a means to simplify living, but not the goal of life.

  • If wealth would remove misery and get all the comforts and resources, then no rich person would be sad.

  • Education is the first step towards knowledge and capability, not the summit.

  • The downfall of a society which considers wealth as its goal and the rich as worthy, is certain.

Article Begin

Recent Posts

See All

प्रार्थना व सुख / Prayer and Happiness To read article in english please click here आप जहाँ कहीं भी देखते हैं आपको लगता है कि हर ओर धन-संपदा के लिए लोग संघर्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि धन-प्राप्ति

स्वतंत्रता दिवस / Independence Day To read article in english please click here हमें बताया जाता है कि भारत १५. अगस्त. १९४७ [15.08.1947] को अंग्रेजों से आजाद हुआ इसलिए १५. अगस्त भारत का स्वतंत्रता दि

इच्छाएँ व सुख / Desires and Happiness To read article in english please click here क्या आपने कभी किसी पार्टी में बच्चों को गुब्बारों के साथ खेलते हुए देखा है। एक बच्चा अचानक एक बड़ा लाल गुब्बारा पकड़ता