हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen

वीर बंदा बैरागी - भाग (१/२)

Veer Banda Bairagi – part (1/2)

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२७ अक्तूबर, १६७० को ग्राम तच्छल किला, तहसील राजौरी, पुंछ, कश्मीर में श्री रामदेव के घर में एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम लक्ष्मणदास रखा गया। राजपूत क्षत्रिय परिवार में जन्मे इस बालक को धनुर्विद्या, तल्वारबाज़ी के साथ अन्य शस्त्रों व मल्ल-युद्ध (कुश्ती) की शिक्षा भी मिली।


१५ वर्ष की आयु में लक्ष्मणदास से एक गर्भवती हिरणी का शिकार हो गया। इस आखेट में उस हिरणी ही नहीं अपितु उसके पेट में पल रहे शिशु का भी लक्ष्मणदास के हाथों वध हो गया था। अपने इस दुष्कृत्य का इस किशोर के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और अत्यधिक शोक हुआ। दुखी मन की शांति पुन: पाने के लिए वे जानकी दास 'वैरागी' नाम के एक साधु के शिष्य हो गए जिसने इनका नाम लक्ष्मणदास से बदल कर माधोदास 'वैरागी' रख दिया।

माधोदास ने भिन्न साधु शाखाओं (जिनमें औघड़ नागा साधु भी थे) से योग साधना सीखी और समर्थ गुरु रामदास (छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु) के मठ में भी शिक्षा ग्रहण की। तदोपरांत उन्होंने नांदेड़ (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर एक आश्रम की स्थापना की और वहां रहने लगे।


यह समय भारत में मुगलों के शासन का था (देखें: हम न भूलें (०९) मुग़ल)। उनके अत्याचारों के विरुद्ध पूर्व में चन्देले व अहोम वंशज राजा, दक्षिण में मराठा, पश्चिम में राजपूत व उत्तर में कश्मीर व अफगान हिन्दू राजा मुगलों को (विशेषकर शाहजहाँ व औरंगजेब) को क्षति पहुंचा रहे थे। पंजाब में गुरु गोविन्द सिंह जी १६९६ से १७०५ तक मुगलों के साथ निरंतर युद्ध में थे। १७०४ में मई माह से दिसंबर माह तक मुगल सेना ने आनंदपुर (पंजाब) की घेराबंदी कर दी। गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने परिवार व अपने अनुयायियों के साथ आनंदपुर से सुरक्षित मार्ग से बाहर निकलने के औरंगजेब के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। परन्तु औरंगज़ेब ने गुरु जी को धोखा दिया। वह उनके पूरे परिवार को मार देना चाहता था। दिसम्बर १७०४ के चमकौर के युद्ध में उनके दो बड़े बेटे वीरगति को प्राप्त हुए थे और एक वर्ष पश्चात दिसम्बर १७०५ में उनके दो अन्य बेटों को दीवार में जीवित चिनवा दिया गया था (देखें: हम न भूलें (००) टोडरमल)। दिसम्बर १७०५ में 'मुक्तसर' के युद्ध के पश्चात गुरु गोविन्द सिंह जी ने कोई और युद्ध नहीं लड़ा। वे पंजाब से पलायन कर दक्षिण की और चले गए।


सिख गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने धर्मयुद्ध मे सहयोग हेतु १७०६ - ०७ में राजस्थान में यात्राएं करीं। इन्ही यात्राओं में उन्होंने जयपुर (राजस्थान) के दादूपंथी "दादू द्वार" के महंत जैत राम जी से भेंट करी थी। जैत राम जी ने उन्हें अपने शिष्य माधोदास से मिलने को कहा था


महंत जैत राम जी (१६९३ - १७३४) ने सशस्त्र नागा साधुओं के साथ दादूपंथी नागा सम्प्रदाय का गठन किया था। नागा साधुओं ने मुसलमानों व अंग्रेजों के शासनकाल में उनके अत्याचारों के विरुद्ध हिन्दुओं की रक्षा हेतु बहुत से युद्ध लड़े थे। (देखें: हम न भूलें (१०) भक्ति-मार्ग)


३ सितम्बर १७०८ को गुरु गोविन्द सिंह जी ने माधोदास जी से भेंट की और उन्हें वैराग्य त्याग कर मुसलमानों के विरुद्ध धर्मयुद्ध में उनका सहयोग माँगा। गुरु गोविन्द सिंह जी ने माधोदास जी को 'बंदा बैरागी' अर्थात 'भगवान का वैरागी सेवक' कह कर सम्बोधित किया। इस भेंट के पश्चात 'बंदा बैरागी' पंजाब की और निकल गए। २१ फरवरी १७०९ को सोनीपत के पास सेहरी खांडा नामक गांव के निर्मोही अखाड़ा मठ को उन्होंने अपना प्रथम सैनिक मुख्यालय बनाया और सेना का गठन किया


निर्मोही अखाड़ा एक बैरागी अखाड़ा है। इनके साधुओं को वेदों व उपनिषदों के साथ-साथ सशस्त्र विद्या में भी निपुणता प्राप्त करनी होती है। यह अखाड़ा मुख्य रूप से किशोरावस्था के ही शिष्य ग्रहण करता है। ये किशोर किसी भी भारतीय जाति से हो सकते हैं।

अयोध्या राम-मंदिर मामले में सबसे पहली कानूनी प्रक्रिया १८८५ में इसी अखाड़े के महंत रघुवीर दास ने प्रारम्भ करी थी।


युद्ध कला में निपुण बंदा बैरागी जी ने थोड़ी सी सेना होते ही नवम्बर १७०९ में पंजाब के 'समाना' नगर पर चढ़ाई कर दी और अपना अधिपत्य स्थापित किया। इस नगर पर आक्रमण करने का मुख्य कारण था कि जल्लाद सैय्यद जलाल-उद-दीन (जिसने गुरु तेग बहादुर जी का शीश काटा था), शशाल बेग और बसल बेग (इन्होंने गुरु गोविन्द सिंह जी के बच्चों को दीवार में चिनवा था), इसी नगर के थे। कुछ दिवस पूर्व ही आपने कैथल में राज्यकोष पर अपना नियंत्रण कर लिया था। अगले एक वर्ष में आपने घुरम, सनौर, थस्का, तहनेसर, दहमाला, शाहाबाद, मुस्तफाबाद, कुंज पुरा और कपोरी से मुगलों को खदेड़ दिया। १७१० में बंदा वैरागी ने सधौरा को उस्मान खान के शासन से मुक्त कराया। (मुस्लिम संत सैयद बदरुद्दीन शाह (जिसे पीर बुद्धू शाह के नाम से भी जाना जाता है) ने भनगानी की लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह जी की मदद की थी जिस कारण मुग़ल उनसे नाराज थे और उस्मान खान ने उन्हें मार डाला था)। पास के ही गांव मुखलिसगढ़ के किले पर भी बंदा वैरागी ने अपना अधिकार कर लिया। उन्होंने मुखलिसगढ़ गांव का विकास किया और इसे अपनी राजधानी (१७१० - १७१६) बनाया। इसके बाद उन्होंने इसका नाम बदलकर लोहगढ़ कर दिया जहां उन्होंने गुरु नानक देव जी व गुरु गोविन्द सिंह जी के नाम से सिक्के जारी किए।


निरंतर हो रही विजय से हिंदू जनता उत्साहित थी और हिंदू युवक दूर दूर से वैरागी की सेना में भरती होने लगे। गुरुपुत्रों व गुरु जी की माँ की मृत्यु का दंड सरहिंद के मुगल प्रशासक वजीर खान को अभी देना शेष था। वजीर खान के पास तोपखाना व हाथी थे और बंदा वैरागी के पास मात्र पैदल सैनिक व कुछ घुड़सवार ही थे। अपने रण -कौशल से मई १७१० को 'छप्पर चिरी' के युद्ध में वैरागी ने सरहिंद पर भी विजय प्राप्त की। सतलुज से लेकर यमुना तक का क्षेत्र अब उनके नियंत्रण में था। बंदा वैरागी एक विरक्त थे। उन्होंने सिखों को राज्य के कार्य बाँटे और राज्य से चले गए।


बंदा वैरागी ने मुग़ल जमींदारी और तालुकदारी व्यवस्था को रोकने के लिए आदेश दिया कि भूमि का स्वामित्व किसानों को दिया जाना चाहिए।


लाहौर के पूर्व में पूरे पंजाब पर वैरागी के शासन ने पंजाब की राजधानी लाहौर और दिल्ली के बीच संचार को बाधित कर दिया जिससे मुगल सम्राट बहादुर शाह परेशान हो गया। उसने बंदा वैरागी को हराने और मारने के लिए अन्य क्षेत्रों से ध्यान हटा कर पूरी शाही सेना का आयोजन किया और पंजाब की ओर कूच किया। मुनीम खान के नेतृत्व में मुगलों ने सरहिंद और उसके आसपास के क्षेत्रों को जीत लिया। सिख अपनी अंतिम लड़ाई के लिए लोहगढ़ चले गए। मुग़ल सेना बंदा वैरागी से पराजित हुई परन्तु मुगलों ने ६०,००० सैनिकों के साथ किले की घेराबंदी कर दी। बंदा वैरागी रूप बदल कर एक मुगल सैनिक के वेष में किले से बाहर निकलने में सफल हो गए।


गुलाब सिंह बख्शी (मृत्यु १७१६), मूल रूप से एक तंबाकू विक्रेता बनिया था। उसका नाम गुलाबू था। बंदा वैरागी की सशस्त्र सेना की विजयों से प्रभावित होकर वह एक सिख के रूप में सैनिक बन गया था। दिसंबर १७१० में लोहगढ़ की घेराबंदी में, गुलाब सिंह ने बंदा वैरागी के जीवन को बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान करने का फैसला किया। वह बंदा वैरागी से अत्यधिक शारीरिक समानता रखता था, इसलिए उसने बंदा वैरागी का वेष धारण किया और उनका स्थान ले लिया। मुग़ल सेना ने गुलाब सिंह को बंदा वैरागी समझ कर बंदी बना लिया था।


बंदा वैरागी को मारने या पकड़ने में सेना की विफलता ने बहादुर शाह को विचलित कर दिया और उसने आदेश दिया कि जहां भी कोई सिख दिखे उसकी हत्या कर दी जानी चाहिए। फरवरी १७१२ में बहादुर शाह की बीमारी से मृत्यु हो गई। जहाँ एक ओर बहादुर शाह के चार बेटे सिंहासन के लिए खुद को मार रहे थे, वहां दूसरी ओर बंदा वैरागी ने सधौरा और लोहगढ़ पर पुन: अपना ध्वज लहरा दिया।

(क्रमश: …)


हम न भूलें कि

  • आधुनिक विश्व इतिहास में वीर बंदा वैरागी जैसा कोई अन्य योद्धा नहीं मिलता जिसने अल्पकाल में बहुत युद्ध लड़े हों (बताया जाता है: ९१ लड़ाईयां लड़ी और लगभग सभी में विजय प्राप्त की)।

  • पंजाब में मोहाली जिले के ऐतिहासिक गांव 'छप्पर चिरी' में बनी 'फतेह बुर्ज' भारत में सबसे ऊंची मीनार (१०० मीटर; दिल्ली की कुतुब मीनार से भी ऊँची) है। यह युद्ध स्मारक वीर बंदा वैरागी को समर्पित है।

  • यह एक दुर्भाग्यपूर्ण विवाद है कि वीर बंदा वैरागी सिख अथवा हिन्दू थे। वे सच्चे अर्थों में "राष्ट्र नायक" थे जिन्होंने समाज की रक्षा के लिए आक्रांताओं से युद्ध किए।

Veer Banda Bairagi – part (1/2)

ऊपर


On 27th October 1670, a child was born in the house of Shri Ramdev in village Tachhal Qila, District Rajouri, Poonch, Kashmir. He was named Lakśhmandās. Being born in a Rajput Kśhatrīy family, Lakśhmandās got educated and trained in archery, sword-fighting, along with other weapons and also wrestling.


At the age of 15, he hunted a deer. Unfortunately it was a pregnant deer. Not only the deer but also the baby in its womb died. This misconduct had a profound effect on the mind of this teenager and saddened him extremely. In order to get back his peace of mind, he became a disciple of a monk named Janaki Das 'Vairāgi' who then changed his name from Lakśhmandās to Mādhodās 'Vairāgi'. Mādhodās learned yog practice from different sādhu-branches (including Aoudhar Nāgā Sādhu) and also studied in the monastery of Samarth Guru Ramdās (Guru of Chhatrapatī Shivāji Maharāj). Subsequently, he established an āshram on the banks of the river Godāvari in Nānded (Maharashtra) and started living there.


This was the time of Mughal rule in India (See: Hum Naa Bhooleen (09) Mughals). Against their atrocities, Chandela and Ahom kings in the east, Marathas in the south, Rajputs in the west and Kashmir and Afghan Hindu kings in the north were fighting with the Mughals and doing harm to them (especially Shah Jahan and Aurangzeb). In Punjab, Guru Gobind Singh ji was in constant war from 1696 to 1705 with the Mughals. In 1704 from May till December, the Mughal army held Anandpur (Punjab) under siege. Guru Gobind Singh ji, along with his family and his followers, accepted Aurangzeb's offer to leave Anandpur safely. But Aurangzeb betrayed Guruji. He wanted to kill his entire family. His two elder sons were killed in the battle of Chamkaur in December 1704, and a year later, in December 1705, his remaining two sons were buried alive in the wall (see: Hum Naa Bhooleen (00) Todarmal). After the battle of 'Muktsar' in December 1705, Guru Gobind Singh did not fight any other war. He fled from Punjab and went south.

During 1706 - 07 Sikh Guru Shri Govind Singh Ji traveled extensively in Rajasthan to get support against muslims in the crusade. During his travels, he met Mahant Jait Ram Ji of Dādupanthi "Dādu Dwār" of Jaipur (Rajasthan). Jait Ram ji asked him to meet his disciple Mādhodās.


Mahant Jait Ram Ji (1893 - 1834) formed the Dādupanthi Nāgā Sampradāy with armed Nāgā sadhus. The Nāgā sadhus fought many wars to protect Hindus from Muslims and the British rule against their atrocities. (See: Hum Naa Bhooleen (10) Bhakti-Marg)


On 3rd September 1708, Guru Gobind Singh ji met Mādhodās ji and asked him for his cooperation in the crusade against the Muslims by renouncing his dispassion. Guru Gobind Singh ji addressed Mādhodās ji as 'Banda Bairagi' meaning 'recluse servant of God'. After this meeting 'Banda Bairagi' left for Punjab. On 21st February 1709, he made the Nirmohi Akhara Math of Sehri Khanda village near Sonipat his first military headquarters and formed the army.


Nirmohi Akhara is a Bairagi Akhara. Their sages have to acquire proficiency in the Veds and Upanishads as well as in armed learning. This akhara mainly accepts the disciples in adolescence age. These teens can be from any Indian caste.

The first legal process in the Ayodhya temple case was started in 1885 by Mahant Raghuvir Das of this Akhara.


As soon as Banda Bairagi, who was very well skilled in the art of warfare, had a small army, attacked the city of 'Samana' in Punjab in November 1709 and established his rule. The main reason for attacking this city was that the executioners Sayyid Jalal-ud-din (had beheaded Guru Tegh Bahadur ji), Shashal Beg and Basal Beg (they had laid the children of Guru Gobind Singh ji in the wall), were from this city. Only a few days ago, Bairagi had taken control of the state treasury in Kaithal. In the next one year he drove out the Mughals from Ghuram, Sanaur, Thaska, Tahnesar, Dahmala, Shahabad, Mustafabad, Kunj Pura and Kapori. In 1710, Banda Bairagi freed Sadhaura from the rule of Osman Khan. (The Muslim saint Syed Badruddin Shah (also known as Pir Budhu Shah) helped Guru Gobind Singh ji in the battle of Bhangani, due to which the Mughals were angry with him and Osman Khan killed him). The Banda Bairagi also took control of the fort of Mukhlisgarh in a nearby village. He developed the village of Mukhlisgarh and made it his capital (1710 - 1716). Later he changed its name to Lohgarh where he issued coins in the name of Guru Nanak Dev Ji and Guru Gobind Singh Ji.


The continuous victories over Muslims excited the Hindus and Hindu youths from far and wide started enlisting in the Bairagi's army. Wazir Khan, the Mughal administrator of Sirhind, was still to be punished for the death of the Guru's sons and the Guru's mother. Wazir Khan had artillery and elephants and Banda Bairagi had mainly foot soldiers and some cavalry. Due to his excellent war fighting skills, Bairagi conquered Sirhind too in May 1710 in the battle of 'Chhappar Chiri'. The complete region between river Satluj and Yamuna was now under his control. The Banda Bairagi was a recluse and had no interest in ruling the state. He distributed the affairs of the state to the Sikhs and left.


To stop the Mughal zamindari and talukdari system Banda Bairagi ordered that the ownership of land should be given to the peasants.


The Sikh rule over the entire Punjab east of Lahore disrupted communication between the capital of Punjab, Lahore and Delhi, which upset the Mughal emperor Bahadur Shah. He diverted attention from other areas and marched towards Punjab to defeat and kill Banda Bairagi. The Mughals under the leadership of Munim Khan conquered Sirhind and its surrounding areas. The Sikhs went to Lohgarh for their final battle. The Mughal army was defeated by Banda Bairagi but the Mughals laid siege on the fort with 60,000 soldiers. The Banda Bairagi changed his disguise and managed to get out of the fort in the guise of a Mughal soldier.


Gulab Singh Bakshi (died 1716), was originally a tobacco vendor of Bania creed. His name was Gulabu. Impressed by the victories of Banda Bairagi's armed forces, he became a soldier in the form of a Sikh. At the siege of Lohgarh in December 1710, Gulab Singh decided to sacrifice his life to save the life of Banda Bairagi. He had great physical resemblance to the Banda Bairagi. He dressed himself as the Banda Bairagi and took his place. The Mughal army took Gulab Singh as prisoner thinking that he was Banda Bairagi.


The failure of the army to kill or capture the Banda Bairagi left Bahadur Shah distraught. He ordered to kill every Sikh if they were to be seen. Bahadur Shah died of illness in February 1712. While on one side the four sons of Bahadur Shah were slaying themselves for the throne, on the other side Banda Bairagi again raised his flag at Sadhaura and Lohgarh.

(to continue …)


Let us not forget that

  • There is no other warrior in modern world history like the brave Banda Bahadur who has fought many wars in a short period of time (it is said that he fought 91 battles and won almost all).

  • 'Fateh Burj' is the tallest tower in India (100 meters; even higher than Delhi's Qutub Minar) built in the historic village 'Chappar Chiri' of Mohali district in Punjab. This war memorial is dedicated to Veer Banda Bairagi.

  • It is an unfortunate dispute that if Veer Banda Bairagi was a Sikh or a Hindu. He was a "national hero" in the true sense who fought against the invaders to protect the society.

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