हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (05)

वसुधैव कुटुम्बकम् / Vasudhaiv Kutumbakam


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अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥


यह अपना बंधु है और यह अपना बंधु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो (सम्पूर्ण) धरती ही परिवार है।

हिन्दुओं को महोपनिषद का यह श्लोक बार-बार अंकित किया जाता है और कहा जाता है कि आपको सभी लोगों को स्वीकार करना चाहिए चूंकि ऐसा आपके धार्मिक ग्रंथों में लिखा है अत: इसमें आपको कोई आपत्ति कैसी?


यदि कोई हिंदू अंध-विश्वासी है और उसने इस श्लोक के अर्थ को न कभी समझा और न कभी समझने का प्रयास किया तो वह तो इसके शब्दश: अनुवाद को ही इस श्लोक का भाव मान लेगा और इसे स्वीकार कर लेगा। शब्दश: अनुवाद अथवा अर्थ किसी सिद्धांत का पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता। जैसे यदि कोई व्यक्ति विज्ञान के सिद्धांत "प्रत्येक क्रिया की समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है" के तात्पर्य को समझे बिना बस उन शब्दों को ही उस सिद्धांत का ज्ञान समझ लेगा तो वह उसे धक्का लगने पर, धक्का देना ही उचित समझेगा। वह स्वयं को एक स्प्रिंग की भाँति समझेगा और ऐसे में कई बार लोगों में झगड़ा, विवाद आदि हो जाते हैं। अधूरी समझ होने से वह व्यक्ति नहीं जानता कि किसी क्रिया की प्रतिक्रिया के भिन्न रुप हो सकते हैं। यदि वह स्वयं को आघात अवशोषक (शॉक ऐब्जॉर्बर) के रुप में देखता तो उसकी प्रतिक्रिया भिन्न होती। किस परिस्थिति में कौन सा सिद्धांत कैसे उपयोग करना है यह सिद्धांतों की पूरी समझ होने पर ही संभव है। अधूरे ज्ञान के कारण दुरुपयोग होने से दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।


आज की प्रचलित भाषा में 'बंधु' शब्द भाई, मित्र, पति, पिता, प्रियजन या ऐसा कहें कि जिससे भी हम संबंध जोड़ना चाहें, एक बंधन चाहें, उसके लिए प्रयोग करते हैं।


परिवार की परिभाषा हिंदू संस्कृति अनुसार माता-पिता व संतान तक सीमित नहीं हैं अपितु इसे तो परिवार की न्यूनतम इकाई समझा गया है। जिसे आज हम संयुक्त परिवार (ज्वाइंट फैमेली) कहते हैं पहले यह परिवार की एक इकाई थी। परिवार रक्त-संबंध (खून का रिश्ता) तक केंद्रित नहीं था अपितु उसकी सीमाओं के बाहिर भी जैसे गुरुकुल के शिक्षक व सहपाठी, एक ही व्यवसाय के लोग, आदि को भी परिवार की भाषा में सम्मलित करता था। हम आज भी किसान-परिवार, शिक्षक-परिवार आदि शब्द सुनते हैं। आज भी हिन्दुओं में एक ही गोत्र में विवाह नहीं होता चूँकि सामान गोत्र वालों को एक ही परिवार का माना जाता है।


हिंदू संस्कृति ने परिवार को बहुत महत्ता दी है। हिंदू मानते हैं कि परिवार ही एक ऐसी इकाई, ऐसी रचना, ऐसा संस्थान है जिसमें वे एक सुरक्षित वातावरण में रह कर अपने जीवन को दुखों से रहित कर सकते हैं (देखें: हम न भूलें -04) व अपने सभी दायित्त्व भी निभा सकते हैं।


चूँकि अपने जीवन को दुखों से रहित करना हिन्दुओं का मुख्य उद्देश्य है इसलिए हिन्दुओं ने उन सभी को, जो उनके दुःख दूर करने में उनकी सहायता कर सकते हैं व दुःख दूर करने हेतु अनिवार्य हैं, अपना ‘बंधु’ माना है। दुखों से निवारण के लिए ये बंधु सदा उपलब्ध हों इसलिए ये बंधु उसके साथ उसके परिवार के सदस्य की भाँति रहने चाहिऐं, ऐसा वे मानते हैं।

हिंदू ने अपना बंधु केवल मनुष्य को ही नहीं अपितु इस धरती के सभी जीव-जंतु, वनस्पति और प्रकृति को माना और अपने को इस कुटुंब का हिस्सा माना। हिंदू तो कहता है कि सभी जीव-जंतुओं में आत्मा का वास है। सभी की आत्मा एक समान है। यह जीव-जंतुओं में अंतर केवल कर्मों के फल (अन्य लेख में) के कारण मिली भिन्न-भिन्न योनियों के भिन्न-भिन्न शरीरों का है। प्रत्येक योनि में शरीर प्रकृति से ही बना है। एक-दूजे के बिना यह जीवन, यह संसार संभव ही नहीं है। प्राचीन समय के लोगों ने पञ्चभूतों को माता व देव की संज्ञा दी (धरती-माता, जल-देव, अग्नि-देव, वायु-देव व आकाश-देव) और अपने परिवार का संरक्षक माना। अपने परिवार के इन संरक्षकों का आदर (उनकी सेवा अर्थात उनका संरक्षण) उसने अपना कर्तव्य माना। मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य जीव-जंतुओं व वनस्पति को भी हिन्दुओं ने अपना बंधु व देव माना है जैसे जटायु, हनुमान, नल-नील, नाग-देव, आदि। तुलसी, पीपल, नीम, बरगद आदि वनस्पति का उनके लिए बहुत महत्त्व है। मूषक (गणेश जी), हंस (ब्रह्मा जी), नाग (विष्णु जी), सिंह (माँ दुर्गा), मोर (माँ सरस्वती) व अन्य पशु-पक्षियों को हिंदू अपने इष्ट के सामान आदर देतें हैं।


परिवार में संतुलन बना रहे यह परिवार के प्रत्येक सदस्य का दायित्त्व है। परिवार उन्नत हो, सभी सुखी रहें व सभी इस हेतु अपना योगदान दें इसके लिए प्रत्येक परिवार के कुछ नियम होते है जो उसके प्रत्येक सदस्य के लिए बाध्य होते है। परिवार में मै सुखी रहूं, यह मेरा अधिकार है पर साथ-साथ मै अन्य सदस्यों के सुख में बाधा न बनूँ और अन्य सभी भी सुखी हो सकें इसलिए अपनी क्षमता द्वारा पूरा योगदान दूँ, यह मेरा दायित्त्व भी है। मेरे अधिकार से पहले मेरा दायित्त्व होना चाहिए अन्यथा परिवार का संतुलन बिगड़ जाएगा व परिवार कुछ समय बाद टूट जाऐगा।


जब कभी भी परिवार बड़ा होता है जैसे विवाह पश्चात दुल्हन का नए घर आना, संतान का जन्म होना, किसी संबंधी का परिवार में आना और फिर वहीं रहना या किसी पशु-पक्षी का ही परिवार में आना तो परिवार के सदस्यों का यह प्रयास रहता है कि नव-आगंतुक को कोई कष्ट न हो। उनकी नव-आगंतुक से अपेक्षा होती है कि वह इस परिवार को अपना परिवार समझे और इस परिवार के रंग में रंग जावे। नए सदस्य के आने से परिवार का संतुलन न बिगड़े, वह परिवार की उन्नति में अपना योगदान दे, उसके आने से परिवार का सुख और अधिक बड़े। यदि नव-आगंतुक यह अपेक्षा रखता है कि परिवार में सभी उसको स्वीकार करें, उसकी आवश्यकताओं का, उसकी भावनाओं का सम्मान करें, उसे अपनी मन-मर्जी करने का पूर्ण अधिकार हो और इसके लिए वह परिवार के लिए कुछ भी न करे क्यूंकि परिवार तो पहले से ही संपन्न है तो वह परिवार कुछ समय बाद अपनी सम्पन्नता खो देगा और परिवार के ऐसे सदस्य के कारण अंतत: नष्ट ही हो जाएगा (दीमक लग जाने के बाद भी वृक्ष कुछ समय तक फल देता रहता है पर ऐसा वृक्ष अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता)।


हम न भूलें कि


  • वसुधैव कुटुम्बकम् उनका कुटुंब है जो एक दूजे के सुख की कामना करते हैं व उसके लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं, मनुष्य ही नही अपितु सभी प्राणियों के प्रति सामान भाव रखते हैं व प्रकृति को जीवन के लिए अनिवार्य मान उसका संरक्षण चाहते हैं।

  • यह कुटुंब उदार हृदय वालों का है। हिंदू संकीर्ण नहीं है। हिंदू आज भी

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।

"सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी को अपने हर ओर भद्र (शिष्टता, शुभ, मंगल) दिखे और कोई भी दुखी न हो।"

की कामना करता है।

  • उदारता का दुरुपयोग न हो कि कहीं यह उदारता ही आपको हानि न पहुँचा दे (यह एक अन्य लेख में)

  • यह कुटुंब तभी तक जीवित रह सकता है जब तक सभी इसका संतुलन बनाए रखें, इसके नियमों का पालन करें और अपनी क्षमता अनुसार अपना योगदान दें। केवल कामना करने से, प्रार्थना करने से सब संभव नहीं। (यह एक अन्य लेख में)

  • उपनिषदों के उपरोक्त दोनों श्लोक उस समय के है जब हिंदू विचारधारा के अतिरिक्त अन्य विचारधाराएँ नहीं थीं। सहस्त्रों वर्ष पुरानी वह विचारधारा आज भी समय की कसौटी पर सही हैं।

  • पश्चिम में जन्मे मत-मतान्तरों का विचार भिन्न हैं। उनके लिए परिवार की बहुत संकुचित परिभाषा है। उनके अनुसार यह प्रकृति व इस पृथ्वी के जीव-जंतु मनुष्य के भोग के लिए है व इनका शोषण हो सकता है।

  • इन मत-मतान्तरों के 'भोग में सुख' के विचार ने इस पृथ्वी व प्रकृति में ऐसा असंतुलन ला दिया है कि मानव-जाति के दुःख कम नहीं हुए अपितु जीवित रहने की चिंताएँ बढ़ रही हैं (वायु व जल प्रदूषण, माँसाहार के लिए बढ़ते उद्योग के कारण बढ़ते रोग जैसे:- कोरोना, बर्ड-फ्लू , स्वाईन-फ्लू )। इस असंतुलन के दिखने के बाद भी ये अपने भोग कम नहीं करना चाहते और इनके द्वारा आज भी शोषण हो रहा हैं।

  • कुछ तो अपने मत की संकीर्णता से इतने ग्रस्त है कि अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए जनसंख्या-विस्फोट कर रहें हैं, भिन्न-भिन्न लालच दे, आकर्षण दिखा अपना अनुयायी बना रहें हैं। इन नव-आगंतुकों को अपने परिवार में लाने के बाद नव-आगंतुक पहले से अधिक सुखी हों इसका ध्यान नहीं रखा जाता।

  • हम मनुष्यों के पास बुद्धि है जो हमें सही अथवा गल्त का आंकलन कर निर्णय लेने में सहायक होती है। हमें सोच-विकार कर ही निर्णय लेना है।

  • हमें अंध-विश्वासी नहीं बनाना है।

  • नव-आगंतुक के चयन में केवल भावनाएँ ही नहीं अपितु गहन सोच-विचार भी होना चाहिए।


Vasudhaiv Kutumbakam

ऊपर


Ayam Nijah Paro Veti Gannana Laghuchetasaam |

Udaarcharitanaam tu Vasudhaiv Kutumbakam ||


This is our bandhu (friend) and this is not, is the way of thinking of people with narrow minds. For those with a generous heart, the (entire) Earth is the family.


This verse from Maha-upnishad is repeatedly quoted to the Hindus. They are told to accept every person as their family member as mentioned in their religious texts and the Hindus should not have any objection to this.


If a Hindu is a blind-follower of texts, has neither tried to understand nor understood the meaning of the verse, will accept its literal translation as its essence. Literal translation or words cannot be the complete knowledge of any text or principle. For example, if a person does not understand the law of science "every action has an equal and opposite reaction", and takes the meaning literally then he would think it is appropriate to push a person back if he gets pushed. He thinks he should react like a spring and such a reaction may lead to a dispute. Due to incomplete, improper understanding, the person did not know that there could be different forms of reactions to an action. If he would have seen himself as a shock absorber, his reaction would have been different. Proper knowledge and complete understanding of the subject is beneficial. Insufficient or wrong understanding may lead to abuse which may have adverse effects.


Today in Hindi, the word 'Bandhu' is used for brother, friend, husband, father, loved one or we may say for anyone with whom we want to have a bond or relate ourselves.


In Hindu culture, family was not limited to parents and children. What we call as ‘joint family’ today was earlier a small unit of the family. The family was not just confined to people having blood relation but also included others like teachers and classmates of a school, people of the same profession, etc. We still come across the words like ‘Shikshak-Pariwar’, ‘Kisaan-Pariwar’. Even today, Hindus do not marry in the same ‘Gotr’ as the people having same gotr are considered to belong to the same family. Western thought differentiates between family, extended family, group, community etc.

Hindu culture has given great importance to the family. Hindus believe that family is an entity, a creation and an institution where people can live their lives in a safe environment without any suffering (see: Hum Naa Bhooleen-04) and can also fulfill all their responsibilities.


Since the main aim of Hindus is to make their lives free from suffering, they have considered all those who can help them overcome their griefs and are necessary to reduce their griefs as their ‘Bandhu’. These ‘Bandhus’ must always be available for the relief from suffering, hence should be with him like a member of his family, is the belief of a Hindu.


The Hindus considered not only humans but all animals, flora-fauna and nature on the earth as a part of this family. According to Hindus every living-being has a soul. Everyone's soul is the same. The difference among all living creatures is their bodies. The actions, deeds (‘Karm’) in a life, determine the body a soul will get after death (in another article). The body is made up of elements of nature. The life in this world is not possible without them. The people of ancient times called the ‘5 elements’ (Panch-bhoot) as mother and God (Mother-Earth, Water-God, Fire-God, Air-God and Space-God) and considered them as protectors of the family. Hindus considered their duty to respect these patrons of his family (their protection). Apart from humans, animals and trees were also idolised and respected as ‘Bandhu’ and God (Jatayu, Hanuman, Nal-Neel, Nag-dev Tulsi, Peepal, Neem, Banyan etc.). Hindus associate and respect even animals with their Gods; Mouse (Lord Ganesh), Swan (Lord Brahma), Snake (Lord Vishnu), Lion (Maa Durga), Peacock (Maa Saraswati).

It is the responsibility of each family member to maintain harmony in the family. For the progress and happiness of the family every member should contribute. It is certainly my right to be happy but at the same time, I should not obstruct the happiness of other members. It is also my responsibility to contribute with all my capabilities to make others happy. I must fulfill my duties before demanding my rights, otherwise the balance will be disturbed and the family will break sooner or later.


Whenever the family gets bigger, such as after marriage, the birth of a child, the arrival of a relative in the family and then staying there or even any animal is brought in the family, it is the effort of each family member that the newcomer feels comfortable. The newcomer is expected to consider this family as his family. The harmony in the family should not get disturbed. On the contrary if the newcomer expects that everyone in the family should accept him, respect his requirements, understand his feelings, he must get the full right to do whatever he wants and should have no obligations toward the family as the family is already prosperous, then this family will certainly get destroyed (The tree keeps giving fruit for some time even after getting termites but such a tree cannot survive for a long).


Let us not forget that

  • Vasudhaiv Kutumbakam is a family of those who not only wish happiness for each other but also strive for it, have same sentiment for humans and all living beings. They desire protection of nature as essential for life.

  • The Hindu is not narrow-mindede but generous and believes in

Sarvey Bhavantu Sukhinah, Sarvey Santu Niraamaya,

Sarvey Bhadraani Pashyantu Maa kashchid Dukh Bhaagbhavet

"May all be happy, all be free from disease, let everyone see courtesy, purity, auspiciousness around him and no one be unhappy."

  • Your generosity is not misused as this may harm you (in another article)

  • This family can survive only as long as everyone maintains its balance, follows its rules and contributes according to his/her capacity. This cannot be achieved just by wishing and praying. (in another article)

  • Both of the above Sanskrit verses from the Upanishads are from the time when no ideologies other than Hinduism existed. This thousands of years old ideology stands even today.

  • Western philosophies (religions) have different views. The family has a very narrow definition for them. According to them, this nature and the creatures of this earth are there to serve human beings and they can be exploited.

  • The idea of ​​'happiness in fulfillment of desires' of these religions has created an imbalance on this earth. The sufferings of mankind have not diminished rather the worries of survival are increasing (air and water pollution, increase in number of epidemics like Corona, Bird-flu, Swine-flu etc. due to increasing demand of meat). Despite this imbalance, they do not want to abstain from their concept of ‘fulfillment of desires' and still continue with their exploitation.

  • Followers of these religions make attractive offers to non-followers to convert. After conversion these new members of the family are not taken care of to make them happier but are left to their fate.

  • We humans have intelligence which helps us to judge between right and wrong and then take decisions.

  • We must neither be blind believer nor superstitious.

  • The selection of newcomer should not be based only on emotions but must also include deep thinking.

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