हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (06)

उदारता / Generocity


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श्रीमद भगवतगीता के १६ [16] वे अध्याय के २. [2] श्लोक में श्री कृष्ण मनुष्यों में जो गुण विद्यमान होने चाहिए, उनके संबंध में बताते हुए कहते हैं:-


अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।

दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ।।१६.२।।


अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोध का त्याग, संसार की कामना का त्याग, कर्मों में कर्ता होने का अभिमान न होना, अन्तःकरण में राग-द्वेष न होना, चुगली न करना, प्राणियों पर दया करना, सांसारिक विषयों में न ललचाना, अन्तःकरण की कोमलता व चपलता का अभाव, ये मनुष्यों के गुण हैं।


'वसुधैव कुटुम्बकम्' (देखें: हम न भूलें-05) का सिद्धांत सभी हिन्दुओं से ही नही अपितु संपूर्ण मानव-जाति से उदारचित्त होने की अपेक्षा रखता है। हिंदू स्वयं का उदार होना अपना कर्त्तव्य समझता है अत: 'उदार' शब्द के भिन्न अर्थों को (शब्दकोषानुसार: १) दयालु, २) दानी, ३) जो संकीर्ण-ह्रदय न हो, ४) शिष्ट ) को अपने जीवन में ढ़ालने के लिए सदा प्रत्नशील रहता है। 'उदार' शब्द के इन भिन्न अर्थों (मुख्यत: पहले तीन) के गूढ़ अर्थों को समझना अनिवार्य हैं। इनके परोक्ष (जो न दिखे, छिपा हुआ)अपरोक्ष (जो दिखे) अर्थ हैं।


'दया' के परोक्ष अर्थ को समझने हेतु हम शिशुपालवध की घटना लेते हैं। दया के अपरोक्ष अर्थ अनुसार श्री कृष्ण को शिशुपाल पर दया करनी चाहिए थी। उन्होंने तो शिशुपाल पर दया नहीं की बल्कि उसका वध कर हिंसा भी की। हमारे ग्रंथों में कितने ही उदाहरण मिल जावेंगे जहाँ हमारे ऋषि-मुनियों ने, इष्टों ने या तो स्वयं वध किया है या फिर वध करवाया है। (अहिंसा परमो धर्मः : अन्य लेख में)


शिशुपाल श्री कृष्ण का अपमान कर रहा था। तब श्री कृष्ण उसे चेतावनी देते हैं कि उन्होंने शिशुपाल के १०० दुराचारों को क्षमा करने की प्रतिज्ञा ली थी और शिशुपाल ने १०० [100] पाप कर लिए हैं। यदि वह अब कोई और दुराचार करेगा तो उसे क्षमा नही मिलेगी। शिशुपाल के न रुकने पर व पुन: दुर्व्यवहार करने पर श्री कृष्ण उसका वध कर देते हैं।

श्री कृष्ण हमें समझा रहे हैं कि

  • सहन करने की सीमा होती है

  • आपकी सहन-शक्ति को आपकी कमजोरी समझा जा सकता है

  • दुराचार करने वाला व्यक्ति पाप की वृद्धि कर रहा है और अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी दुःख बड़ा रहा है

- दुराचार करने से उसका यह संस्कार प्रबल होगा और दुराचार करना उसका स्वभाव बन जाऐगा जिससे पाप और बढ़ेगा

- दुराचार सहने से दुराचार को सहने का संस्कार प्रबल होगा और यह दासता की मानसिकता को बढ़ावा देगा।

इन दोनों अवस्थाओं में आत्मा, मनुष्य योनि से पतित हो जावेगी।


मनुष्य को यदि पाप करने से नहीं रोका जावेगा तो उसका पतन निश्चित है। यदि वह समझाने पर भी पाप कर्म नहीं छोड़ता तब उसके पापों के अनुसार व समाज पर उसके पापों के पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए मृत्यु-दंड (वध) भी उचित है। यही उस व्यक्ति पर दया है कि उसके पापों में वृद्धि को रोक दिया गया, उसको और अधिक पतित नहीं होने दिया गया। यही श्री कृष्ण ने किया जिसे हम प्रभु द्वारा शिशुपाल का उद्धार कहते हैं।


हूण राजा मिहिरकुल (देखें: हम न भूलें-03) ने नालंदा विश्वविद्यालय पर आक्रमण किया था। मिहिरकुल ने सम्राट यशोधर्मन से पराजित होने के पश्चात उनका आधिपत्य स्वीकार कर लिया था पर अपने स्वभाववश उसने अन्य भारतीय राजाओं पर आक्रमण करना व मंदिर एवं मठों का विनाश करना नहीं छोड़ा। उसने मगध शासक बालादित्य पर आक्रमण किया और पकड़ा गया। राजा बालादित्य ने भी उदारता दिखाते हुए उसका वध न कर, उसे मुक्त कर दिया। अपने भाई द्वारा सिंहासन से हटाए जाने के बाद मिहिरकुल ने कश्मीर में शरण ली पर स्वभाव से दुष्ट इस आक्रांता ने अपने को शरण देने वाले को ही मार डाला और स्वयं सिहासन पर बैठ गया।



११९२ [1192] में मोहम्मद ग़ौरी ने पृथ्वीराज चौहान को तराइन (हरियाणा में) की लड़ाई में हराया। उनकी हार को भारत में मुस्लिम शासन की नींव के रूप में देखा जाता है। पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद ग़ौरी के बीच यह कोई अकेला युद्ध नहीं था। कुछ मुस्लिम इतिहासकारों ने दोनों के बीच केवल दो युद्ध बताए हैं तो हिन्दू और जैन लेखकों का कहना है कि पृथ्वीराज चौहान ने मारे जाने से पहले कई बार मोहम्मद ग़ौरी को हराया था। (हम्मीर महाकाव्य दोनों के बीच ९ [9] लड़ाइयाँ और पृथ्वीराज प्रबन्ध ८ [8] लड़ाइयों का वर्णन करता है)। दर्भाग्यवश, पृथ्वीराज चौहान ने विजयी होने के पश्चात मोहम्मद ग़ौरी को न तो बंदी बना कर रखा और न ही उसका वध किया अपितु बार-बार उदारता दिखाते हुए उसे मुक्त कर दिया। मोहम्मद ग़ौरी ने अपने दुष्कर्म समाप्त नहीं किए और बार-बार लड़ाई की। अंतत: उसे हिंदू राजा जयचंद का साथ मिला और वह पृथ्वीराज को हरा पाया। विजयी होने पर मोहम्मद ग़ौरी ने अनेकों मंदिर व मठ विध्वंस किए और हिन्दुओं का नर-संहार किया।


इतिहास में उदारता के परोक्ष अर्थ को समझे बिना दया करने से हुए दुष्परिणामों के ये कुछ उदाहरण है जिनके कारण समाज को दुख झेलने पड़ें व संस्कृति का नाश हुआ।


पापी को दंड ही वास्तव में उस पर दया है, समाज पर दया है। राजतंत्र में अपराधी (पापी) को दंड (मृत्यु-दंड भी) का विधान है। हम स्वयं को समाज के संरक्षक समझ, समाज को पाप से बचाने के लिए स्वयं ही किसी को पापी नहीं कह सकते, उसे दंड नही दे सकते। पापी को दंड देने का अधिकार केवल उस समाज की प्रणाली के स्थापित योग्य व्यक्तियों (शासन) का है। इन योग्य व्यक्तियों के पास ही इन पापियों के सुधार के साधन उपलब्ध है व पापी का सुधार कैसे हो कि वह सुधरने के बाद समाज में अपना योगदान दे पाए, यह वे योग्य जन ही जानते हैं।


शासन का मुख्य उद्देश्य, राज्य की कार्य-प्रणाली व्यवस्थित ढंग से चलती रहे, है। अपनी व्यवस्थाओं को चलाने के लिए शासन, नियम, आचार- व दंड-संहिता बनता है। समाज की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की सक्षमता को शासन समाज की उन्नति मनाता है। समाज के बौद्धिक विकास के लिए शासन शैक्षिक-संस्थान (विद्यालय, विश्वविद्यालय, आदि) बनवाना अपना दायित्त्व समझता है। इस धरती के कुछ शासन समाज की आध्यात्मिक उन्नति को भी अपना दायित्त्व समझ उसके लिए कार्य करते हैं तो कुछ शासन इसके प्रति उदासीन हैं। (शासन व आध्यात्म: अन्य लेख में) शासन अपने द्वारा इन दायित्त्वों की पूर्ति का गुण-गान करता है व इसे समाज के प्रति अपनी उदारता समझता है।


हम न भूलें कि


  • किसी भी कही बात को स्वीकार करने से पहले उसके परोक्ष व अपरोक्ष भाव को समझना अनिवार्य है।

  • बिना सोचे-समझे किसी बात को स्वीकार कर लेना, उसे आचरण में ले आना हमें अंध-विश्वासी बनाता है। ऐसे में हमारा पतन निश्चित है।

  • समाज में पाप की वृद्धि न हो, समाज में दुःख कम होवे व समाज उन्नति कर सके, यह शासन का दायित्त्व है।

  • शासन में ऐसे योग्य व्यक्ति हों जो उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति में सक्षम हों, ऐसे व्यक्तियों को चुनना हमारा दायित्त्व है।

  • यदि हमने ही किसी अयोग्य व्यक्ति को चुना है तो उसकी उदारता समाज के हित में नहीं होगी अपितु प्रथम स्वयं के, तदोपरांत अपने चाटुकारों के व अंतत: जन-सामान्य के प्रति (देखें: हम न भूलें-01)

  • उदारता का उद्देश्य दुखों को कम करना है।

  • हमारी उदारता किसी प्राणी विशेष के दुःख कम करते समय किसी अन्य प्राणी या समुदाय के दुःख बड़ा न दे चूँकि सभी के कल्याण में ही हमारा कल्याण है। (अन्य लेख में)

  • पश्चिम में जन्मे मत (ईसाई व इस्लाम) उदारता के प्रति भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस्लाम केवल मुसलमानों के प्रति उदारता की बात कहता है।

  • ईसाई दूसरे प्राणियों के प्रति सेवा भाव व उनकी मदद को उदारता का रुप समझते हैं। बीमारों, अपंगों व शारीरिक रुप से लाचारों की सेवा, जो वंचित हैं, असहाय हैं उनकी मदद इनके लिए महत्त्वपूर्ण है। परन्तु यह भी सत्य है कि इनकी उदारता आज भी भिन्न जाति व रंग के मनुष्यों में भेद करती हैं (अफ्रीका व अमेरिका से आज भी रंग-भेद के समाचार सुनने को मिलते हैं। ईसाई देशों में ‘ब्लैक लाईफ मैटर्स’ आंदोलन इसका नवीनतम उदाहरण है)। इनकी उदारता पूर्णत: अपरोक्ष है।

  • आज कोरोना महामारी के टीकाकरण की दवा की उपलब्धता के लिए यूरोपीय देश आपस में झगड़ रहें है। आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर दक्षिण-अमेरिका, अफ्रीका व एशिया के देशों को दवा मिलने से पहले ये अपने लिए दवा सुनिश्चित करना चाहते हैं और इसके लिए यूरोपीय संघ आर्थिक प्रतिबन्धों व नए नियम बना उनका सहारा लेने की सोच रही है।

  • मनुष्यों के अतिरिक्त इनकी उदारता केवल उन प्राणियों तक सीमित है जिनके संपर्क में ये आते हैं। सभी पशु-पक्षी मनुष्य की सेवा के लिए हैं व उनका शोषण किया जा सकता है, ऐसा ये मानते हैं।


Generocity

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In the 2nd Shlok of chapter 16 of Shrimad Bhagavad Gita, Shri Krishn mentions the qualities a human should have:


Ahinsa Satyamkrodhastyaagah Shantirpeshunam

Dayaa Bhuteshvloluptvam Maardavam Hrirchaaplam


Ahinsa, speak only truth, renunciation of anger, renunciation of the desire of this world, being humble, no anger in the conscience, no cheating, mercy on living beings, no temptation for worldly matters, gentleness and stability of conscience, are the qualities of humans.


The doctrine of 'Vasudhaiva Kutumbakam' (see: Hum Naa Bhooleen-05) expects the entire human race and not only Hindus to be broad-minded and open to other thoughts. Hindus consider it as their duty to be generous, liberal, humble, kind, and open-hearted doing charity in their lives. It is essential to understand the deeper meanings of these words.


To understand the deeper meaning of 'kindness', we look into the incident of the killing of Shishupal. Shri Krishn should have shown mercy on Shishupal and should have forgiven him. In complete contradiction Shri Krishn did not show kindness on Shishupal but killed him which was an act of violence. Many examples can be found in our Hindu texts where our saints and people we worship have either killed people themselves or inspired others to kill. (Ahinsa Paramo Dharma: In another article)


When Shishupal was insulting Shri Krishn, Shri Krishn warns him that he had vowed to forgive his 100 misdeeds. Since Shishupal has committed 100 sins he will not be forgiven for any further sin. Even after this warning when Shishupal did not stop and abused Shri Krishn further, Shri Krishn killed him.

Shri Krishn is making it clear to us that

  • There is a limit to tolerance

  • Your tolerance can be misinterpreted as your weakness

  • The person who is misbehaving is creating problems, pain and grief not only for himself but also for others.

- By continuous misbehaving this rite will prevail and misbehavior will become his nature, which will increase sin.

- By enduring misconduct, the rite of tolerating misconduct will prevail and the mentality of slavery may grow.

In both cases, it will be degradation of human soul.


If a person is not prevented from committing sin, his downfall is certain. If he does not stop even after warnings, does not avail the offered opportunities for improvement, then keeping in mind his misconducts and their effects on the society death-penalty is also appropriate. It will halt the growth of his sins and his further degradation. This is the ‘kindness’ towards his soul and others. This is what Sri Krishn did which we call as the salvation of Shishupal by God.


The Nalanda University was invaded by Hun king Mihirkul (See: Hum Naa Bhooleen-03). Mihirkul accepted Emperor Yashodharman’s superiority after being defeated by him but due to his nature he did not stop attacking other Indian kings and destroyed many temples and monasteries. Mihirkul attacked Magadh ruler Baladitya, but was captured. King Baladitya showed kindness by not killing him and set him free. Mihirkul was dethroned by his brother and took refuge in Kashmir. But this evil wicked man killed the person who granted him refuge and became king himself and continued further with his evil deeds till his death.



In 1192 Mohammad Ghauri defeated Prithviraj Chauhan in the battle of Tarain (in Haryana). Prithviraj’s defeat is said to have laid the foundation of Muslim rule in India. This was not ‘the only’ war between Prithviraj Chauhan and Mohammad Ghauri. Some Muslim historians have stated only two wars between the two, while Hindu and Jain writers write that Prithviraj Chauhan defeated Mohammad Ghauri several times before being killed. (The epic, ‘Hammir Mahaakavya’ narrates 9 battles whereas ‘Prithviraj Prabandha’ talks about 8 battles between the two). Unfortunately, Prithviraj Chauhan neither held Mohammad Ghauri captive nor killed him after defeating him but repeatedly set him free. On being set free Mohammad Ghauri invaded Prithviraj Chauhan again and again. Eventually, Ghauri got help from the Hindu king Jayachand and could defeat Prithviraj. On being victorious, Mohammad Ghauri destroyed many temples and monasteries and massacred thousands of Hindus.


In history these are some examples of the ill effects of ‘kindness’ without understanding the deep meaning of generosity. It has caused the society to suffer and a lot of heritage and culture has been destroyed.


Punishing the sinner is the real generosity towards him and society. In any administration, there is a law to punish the culprit (also the death penalty). We cannot think of ourselves as the guardians of society and call anyone a sinner to punish him for his sin. Only the appointed eligible persons have the right to punish the sinner. Only these eligible people know how to and have the means to correct a sinner, so that after the correction he can make his contribution to the society.


The main objective of any administration is to keep the functioning of the state in a systematic manner. Rules, regulations, service and penal codes are made to run the system. Government measures the progress of society by its performance on how good it is in fulfilling the material needs of the society. For the intellectual development of the society, the government feels obliged to build educational institutions (schools, universities, etc.). Some of the governments of this world understand their responsibility toward the spiritual progress of the society and work for it, while some are indifferent to it. (Governance and spirituality: in another article) Government blows its own trumpet on fulfillment of these obligations and considers it as its generosity towards society.


Let us not forget that

  • Before accepting any thought, one should try to decrypt and understand its hidden and obvious meaning.

  • Practicing anything thoughtlessly makes us blind-follower. In such a situation, our loss is certain.

  • It is the responsibility of government to reduce misery and grief in the society so that society can progress.

  • It is our responsibility to select such persons who are capable of accomplishing the above objectives.

  • If we have chosen an inappropriate person, then his generosity will not be in the interest of the society but first toward himself, then towards his followers and lastly towards the common man (see: Hum Naa Bhooleen-01)

  • Reduction of suffering should be the aim of generosity.

  • Our generosity, while reducing the misery of a particular person/group, should not increase the misery of any other person or community, because our well-being is in the well-being of others. (In another article)

  • Religions originating in west (Christianity and Islam) have a different view on generosity. Islam talks of generosity towards Muslims only.

  • Christians consider service and help towards other living beings as a form of generosity. The service of the sick, physically helpless, handicapped or deprived is important to them. It is also true that their generosity still discriminates between people of different race and color (News of apartheid is still heard from Africa and America. The 'Black Life Matters' movement in Christian countries is the latest example of this.)

  • Today, European countries are fighting among themselves for Corona vaccine. To ensure vaccine for themselves, before economically weak countries of South-America, Africa and Asia, the European Union is thinking of new rules and regulations for this and may even implement economic sanctions.

  • In addition to humans, their generosity is extended to other creatures as per their convenience.

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