हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (00)

श्री टोडरमल जी / Shri Todarmal ji


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१३ दिसंबर १७०५ को गुरु गोबिंद सिंह जी के २ पुत्र (साहिबज़ादे), जोरावर सिंह (६ वर्ष) और फतेह सिंह (९ वर्ष) का उनकी दादी (गुरु गोविंद सिंह जी की माँ) माता गुजरी के साथ अंतिम संस्कार किया गया। एक धनी हिंदू व्यापारी दीवान टोडरमल के प्रयासों के कारण ही अंतिम संस्कार संभव हो सका।


एक दिन पूर्व, १२ दिसंबर १७०५ को गुरु गोविन्द सिंह जी के बेटों को पंजाब के सरहिंद के स्थानीय मुगल प्रशासक वजीर खान के आदेश पर जीवित दीवार में चिनवा दिया गया था चूंकि साहिबज़ादों ने अपनी आस्था को न छोड़ इस्लाम स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। यह समाचार सुन कर माता गुजारी की भी उसी समय मृत्यु हो गई थी।


साहिबज़ादों और माता गुजरी के देहांत के तुरंत बाद यह सरकारी फरमान सुनाया गया कि तीनों का अंतिम संस्कार सरकारी जमीन पर नहीं बल्कि केवल निजी जमीन पर ही किया जा सकता है। अंतिम संस्कार तभी किया जा सकता है, जब चौधरी अत्ता अपनी निजी जमीन इस कार्य हेतु बेचे। आधिकारिक घोषणा ने जमीन की खरीद को और अधिक प्रतिबंधित किया कि जमीन का केवल वह क्षेत्र जो सोने के सिक्कों को लंबवत खड़ा कर ढाँका जा सकेगा, खरीदा जा सकता है।


ऐसा माना जाता है कि टोडरमल जी उस भूमि को खरीदने के लिए ७८,००० सोने के सिक्कों (वर्ष १७०५के ४०० करोड़ रूपये के मूल्य) से लगभग ४ वर्ग गज जमीन को ढाँकने में सफल हुए थेजो इसे मानव जाति के इतिहास में सबसे महंगा भूमि सौदा बनाता है। आज वह स्थल गुरुद्वारा ज्योति सरूप है।


श्री टोडरमल जी का त्याग यहीं समाप्त नहीं होता है। जब गुरु गोविंद सिंह जी टोडरमल जी से मिले और उन्हें अपने परिवार के लिए उनके इस कृत्य के लिए धन्यवाद देने के पश्चात पूछा कि वे उनके लिए क्या कर सकते हैं तो टोडरमल जी ने बहुत ही विनम्रतापूर्वक एक वरदान मांगा कि टोडरमल के कभी भी संतान न हो ताकि भविष्य में उनके परिवार से कोई भी कभी भी यह न कह सके की उसके वंशजों ने सिख गुरु के लिए उपकार किया था।


हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि


  • साहिबजादे दीवार में चिनवाए गए थे क्योंकि उन्होंने इस्लाम को स्वीकार नहीं किया था। यदि सभी धर्म, मत-मतान्तर एक ही बात बोलते है तो गुरु गोविंद सिंह जी को इस्लाम के विरुद्ध लड़ाइयाँ नहीं लड़नी पड़तीं और वे अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा नहीं देते की वे अपनी आस्था पर डटे रहते।

  • टोडरमल जी ने यह त्याग, बलिदान धर्म की रक्षा के लिए किया उन्होंने अपना सर्वस्व धर्म की रक्षा करने वाले इन योद्धाओं के समर्थन में, उनके स्वाभिमान के लिए दे दिया।

स्मरण रहे कि गुरु गोविंद सिंह जी ने वैसाखी १६९९ के पर्व पर "पांच प्यारों" से खालसा बनाने आरम्भ कर दिए थे। “खालसा” वे योद्धा थे जो इस्लाम की धार्मिक दृढ़ता, अत्याचारों से समाज की रक्षा करते थे। ये पहले “पांच प्यारे” दया राम जी, धर्म दास जी, हिम्मत राय जी, मोहकम चंद जी और साहिब चंद जी सभी हिंदु थे और इन्होने ही गुरु गोविन्द जी को छठा खालसा बनाया था। खालसा बनने पर ही सभी के नाम के साथ "सिंह" जुड़ा। उस समय हिन्दू -सिख का कोई अंतर नहीं था। हिन्दू समाज में से ही लोग धर्म की रक्षा के लिए योद्धा बनाते थे और खालसा कहलाते थे।

  • सुनी सुनाई बात पर विश्वास संकीर्णता को जन्म दे सकता है, मतभेद उत्पन्न कर सकता है अतः गहन शोध और तथ्यों के आधार पर ही बातों को स्वीकार करें।

  • जो अपने इतिहास को भूल जाता है और उससे शिक्षा नहीं लेता उसका अस्तित्व नष्ट हो जाता है।


Shri Todarmal ji


ऊपर


On 13th December 1705, 2 sons (Sahibjadas) of Guru Gobind Singh ji, Joravar Singh (6 yrs) and Fateh Singh (9 yrs) were cremated along with their Grandmother (mother of Guru Govind Singh ji) Mata Gujari. The last rites could only be made possible due to the efforts of a rich hindu trader Diwan Todarmal.


A day earlier, on 12th December 1705, Guru Gobind Singh ji's sons were executed by burying them alive in a wall for not renouncing their faith and accepting Islam on the orders of the local Mughal administrator of Sirhind in Punjab, Wazir Khan. Hearing this news, Mata Gujari also died at the same time.


Soon after the death of Sahibjadas and Mata Gujri, a government decree was pronounced that the last rites of the three cannot be performed on government land but only on private land. The last rites can be performed only if Chaudhary Atta would sell his personal land. The official announcement further restricted the purchase of land by extending the condition that only the area of ​​land that can be covered by placing the gold coins vertically can be purchased.


It is believed that Todarmal ji could cover roughly 4 square yards of land with 78,000 gold coins (worth around 400 crore rupees of year 1705) to purchase that land which makes it the most expensive land deal in the history of mankind. Today Gurudwara Jyoti Sarup stands there.


Sacrifice of this Hindu trader Shri Todarmal ji does not end here. When Guru Govind Singh ji thanked him for what he has done for Guru’s family and asked him what Guruji could do for him, Todarmal ji very humbly asked for a boon that Todarmal never bears a child so that no one in future from his family could ever make any statement or claim that their forefathers have done any favor to a Sikh guru.


We shall never forget that


  • Sahibzade were executed because they did not accept Islam. If all religions preach the same thing, then why did Guru Gobind Singh ji had to fight against Islam. He would have taught his children that all faiths are similar and no need to keep their own belief. But he did not do so.

  • Todarmal ji made this sacrifice, he gave his all for the sake of religion, for the self-respect of those who protected the religion, in support of warriors of religion.

Guru Gobind Singh ji initiated Khalsa with "Panch Pyaare" on Vaisakhi 1699. Khalsa were the warriors who protected the society from any form of religious persecution, atrocities of Islam. These first five beloved Daya Ram Ji, Dharam Das ji , Himmat Rai ji, Mohkam Chand ji and Sahib Chand ji were all Hindus. After the first five Khalsa had been baptized, the Guru asked the five to baptize him as a Khalsa. This made the Guru the sixth Khalsa, and his name changed from Guru Gobind Rai to Guru Gobind Singh. After becoming Khalsa "Singh" was attached to everyone's name. At that time there was no difference of Hindu- Sikh. People used to become warriors and feel proud being called Khalsa to protect religion.


  • Following something blindly will make us narrow-minded, may create conflicts. Convince yourself with facts after thorough research and findings.

  • The one who forgets his history and does not learn from it, will be forgotten.

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