हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen

स्वतंत्रता दिवस / Independence Day

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हमें बताया जाता है कि भारत १५. अगस्त. १९४७ [15.08.1947] को अंग्रेजों से आजाद हुआ इसलिए १५. अगस्त भारत का स्वतंत्रता दिवस है। सभी भारतीय इस विशेष दिन को न भूलें और इस दिन को विशेष दिवस के रुप में मनाए इसलिए भारत सरकार अपने नागरिकों को एक दिन का अवकाश भी देती है।


क्या भारत वास्तव में १५. अगस्त को स्वतंत्र हो गया? क्या १५. अगस्त १९४७ संपूर्ण भारत का स्वतंत्रता दिवस था? मै दोनों ही प्रश्नों का उत्तर "नही" मानता हूँ।


राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, अन्य मंत्री, संसद आदि होते हुए भी माउंटबैटन (२१. जून १९४८ तक) [21.06.1948] और फिर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (२६. जनवरी. १९५० तक) [26.01.1950] को भारत के सबसे उच्चाधिकारी, गवर्नर-जनरल (वाइसरॉय) के रुप में ब्रिटेन के राजा 'जॉर्ज ६' ने नियुक्त किया। भारत को अपना प्रथम सेनाध्यक्ष भी जनरल करियप्पा के रुप में १५ जनवरी १९४९ को मिला। उनसे पहले अंग्रेज ‘सर रॉय बुचर’ भारतीय सेनाध्यक्ष था। किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी आत्मा, उसका संविधान होता है और भारतीयों के लिए सर्वोच्च “भारत का संविधान” भी २६. जनवरी १९५० [26.01.1950] को कार्यशील हुआ;


यूनाइटेड किंगडम (यू. के.) के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने २०. ०२. १९४७ [20.02.1947] को यु.के. की संसद में "भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम १९४७" रखा जिसे १८. ०७. १९४७ [18.07.1947] को संसद ने पारित कर दिया। इस अधिनियम में एटली द्वारा कहा गया कि


१ ब्रिटिश सरकार ३० जून १९४८ [30.06.1948] तक "ब्रिटिश-भारत" को पूर्ण स्वशासन प्रदान करेगी।

२ रियासतों (रजवाड़ों) के भविष्य का फैसला अंतिम स्थानांतरण की तारीख तय होने के बाद होगा।


एटली द्वारा इस अधिनियम में "ब्रिटिश-भारत" व रजवाड़ों का उल्लेख अलग-अलग किया गया है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि केवल “ब्रिटिश-भारत” का शासन सीधा अंग्रेजों के आधीन था और रजवाड़े भारतीय शासकों द्वारा शासित थे जिन पर अंग्रेजों का बहुत प्रभाव था। अंग्रेजों के पलायन के पश्चात् इन रजवाड़ों पर अंग्रेजों का प्रभाव समाप्त होना था न कि रजवाड़ों को अंग्रेजों द्वारा सत्ता का स्थानांतरण होना था जिसे रजवाड़ों की स्वतंत्रता कहा जा सकता। यदि अंग्रजों का रजवाड़ों पर अधिकार होता तो अंग्रेज ही भारत के बटवारे के समय निर्णय कर देते की कौन से रजवाड़े भारत में सम्मिलित होंगे और कौन से पाकिस्तान में।


अंग्रेजों ने भारत को अपना उपनिवेश अपने हितों के लिए बनाया था। अंग्रेज उपनिवेशों से अपनी आर्थिक उन्नति चाहते थे। १८. वी [18] शताब्दी के आरम्भ में विश्व-अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान २४.४३% [24.43] था और ब्रिटेन का मात्र २. ८८% [2.88]। सन १९५० में भारत का योगदान घट कर ६.५२% [6.52] रह गया।


१८५७ [1857] के युद्ध के पश्चात अंग्रेजों की अर्थव्यवस्था बिगड़ने लगी और अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अंग्रेजों ने ऐसी व्यवस्थाएँ बनाई जिनसे वे उपनिवेशों का अधिक शोषण कर सकें और अंग्रेजों की स्थिति सुदृढ़ हो सकें। भारतीय सम्पदाओं, प्रद्योगिकी (देखे: हम न भूलें-11) के कारण अंग्रेजों के लिए भारत का बहुत महत्त्व था। १८९४ [1894] में भारत में अग्रेज वाइसरॉय विक्टर एलेग्जेंडर ब्रूस कहता है कि, "भारत हमारे साम्राज्य की धुरी है। यदि साम्राज्य अपना कोई अन्य हिस्सा खो देता है तो हम बच सकते हैं, परन्तु यदि हम भारत को खो देते हैं, तो हमारे साम्राज्य का सूरज अस्त हो जाएगा।"


स्रोत : Wikipedia


विदेशी आक्रमणों के आरम्भ होने से पहले विश्व-अर्थव्यवस्था में अपने योगदान के कारण ही भारत "सोने की चिड़िया" कहलाता था। निरंतर आक्रमण होने से अर्थव्यवस्था गिरने लगी। १६०५ [1605] में मुग़ल राजा अकबर की मृत्यु के पश्चात हिंदू राजा पुन: बलवान होने लगे और छत्रपति शिवाजी के मराठा साम्राज्य में स्वराज होने से भारत ने अल्प-काल के लिए आर्थिक उन्नति देखी।


२ अगस्त १८५८ [2.08.1858] को ब्रिटिश संसद ने 'भारत सरकार अधिनियम १८५८' , को पारित किया और ईस्ट इंडिया कंपनी से भारतीय उपनिवेश का नियंत्रण ब्रिटिश राजशाही को हस्तांतरण करने की अनुमति दी।


अपना शासन प्रबंध स्थापित करने के लिए १८५८ में ही अंग्रेजों ने "भारतीय लोक सेवा" (आई. सी. एस.) जिसे आरम्भ में "इंपीरियल सिविल सर्विस" कहा जाता था का गठन किया। जहाँ प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड लौय्ड जार्ज ने आई. सी. एस. को भारत में ब्रिटिश राज की नींव बताते हुए कहा था कि "यह इस पूरे ढाँचे का स्टील फ़्रेम है" वहीं पं जवाहरलाल नेहरु ने आई. सी. एस. की भर्त्सना करते हुए कहा था कि "इंडियन सिविल सर्विस न तो इंडियन है, न सिविल है, और न ही सर्विस है"। अंग्रेजों के १९४७ में भारत छोड़ने के बाद पं नेहरु ने इसी आई. सी. एस. को कुछ मामूली बदलाव करके अपना लिया। उनमे एक बदलाव इसका नाम बदल कर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई. ए. एस.) करना भी था। (स्मरण रहे कि अंग्रेजों के समय में आई. सी. एस अधिकारी "कलैक्टर" कहे जाते थे क्योंकि इनका मुख्य कार्य कर, लगान, चुंगी आदि (धन) ‘कलैक्ट’ (एकत्रित) करना होता था।)


१८६१ [1861] में, आई. सी. एस. के प्रशासकों की मदद करने हेतु एवं १८५७ के अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह से उपजे खतरों को समझते हुए 'भारतीय परिषद अधिनियम, १८६१' के अंतर्गत अंग्रेजों ने भारत में पुलिस नौकरशाही की नींव रखी। इसे पहले 'सुपीरियर पुलिस सेवा' बाद में 'भारतीय इम्पीरियल पुलिस' और आज 'भारतीय पुलिस सेवा'के नाम से जाना जाता है।


पुलिस के कार्यक्षेत्र को परिभाषित करने के लिए १ जनवरी १८६२ [01.01.1862] से 'भारतीय दण्ड संहिता' लागू हुई। इस संहिता का गठन लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता में किया गया था। यह वही लॉर्ड मैकाले है जिसे हम भारत में लाई अंग्रेजों की शिक्षा-नीति के माध्यम से भी जानते हैं। (देखे: हम न भूलें-11) यह 'दण्ड संहिता' ब्रिटिश भारत में ही लागू थी और रजवाड़ों में नहीं। रजवाड़ों की अपनी अदालतें और कानूनी प्रणालियाँ थीं।


भारत की ये दोनों मुख्य प्रशासनिक सेवाएँ आज भी अधिकांशतः अंग्रेजों के बनाए प्रतिरुप के अनुसार कार्य कर रही हैं। 'भारतीय दण्ड संहिता' में कुछ संशोधन अवश्य हुए है परन्तु अधिकांश नियम आज भी ब्रिटिश-काल के हैं। भारत सरकार नए कानून बना देती है परन्तु यदि उन्हें भारतीय दण्ड संहिता में सम्मिलित नहीं किया जाता तो पुलिस उसे अपने कार्यक्षेत्र में नहीं मानती।


अंग्रेजों ने अपने हितों की रक्षा के लिए भारत में प्रशासन व्यवस्था स्थापित की थी न कि भारत की, भारत के नागरिकों की भलाई के लिए। यह ऐसी व्यवस्था थी जिसमें भारत की जितनी भी हानि हो जाए उसके लिए शासन व प्रशासन (दोनों के भारत में निर्णय लेने वाले अधिकारी अंग्रेज थे) कदाचित उत्तरदायी नहीं थे। ये अधिकारी अंग्रेज संसद के प्रति उत्तरदायी थे। ये अपने सुझाव अंग्रेज संसद को दे सकते थे पर अपने सुझाव अंग्रेज संसद की स्वीकृति के पश्चात् ही कार्यान्वित कर सकते थे।


अंग्रेजों की बनाई प्रणाली अनुसार ही भारत में आज भी कार्य हो रहा है जिस कारण शासन व प्रशासन कोई भी अपने को उत्तरदायी नहीं समझता और साधारण नागरिक आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं।


भारत तभी पूर्णत: स्वतंत्र होगा जब उसके नागरिकों के अधिकार संविधान की पुस्तक में नहीं अपितु दिन-प्रतिदिन के जीवन में सुरक्षित होंगे। यह सुरक्षा प्रत्येक भारतीय को मिले मात्र यह सुनिश्चित करना ही शासन व प्रशासन का काम नहीं अपितु ये अधिकार नागरिकों को मिलें इसके लिए अधिकारी उत्तरदायी होने चाहिए। इनका उत्तरदायित्व भारत के संविधान के प्रति होना चाहिए न की भारत की संसद और सांसदों के प्रति।


हम न भूलें कि


  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद ८१ के अनुसार यह सांसद का उत्तरदायित्व है कि वह

  • अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के विचारों व आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करे।

  • यह सुनिश्चित करे कि कार्यपालिका (सरकार) अपने कर्तव्यों का संतोषजनक ढंग से पालन करती है।

  • कानून बनाने में अपना योगदान दे।

  • यदि आप अधिकारों के लिए नहीं अपितु मात्र जाति, धर्म के लिए वोट करते है तो आपका सांसद, संसद में उन्ही विचारों के लिए आपका प्रतिनिधित्व करेगा न कि आपके संवैधानिक अधिकारों का।

  • सांसद का कार्य सड़क, पुल, आदि बनवाना नहीं है। ये पार्षद के काम हैं।

  • जब तक आप जागरुक हो कर संविधान में दिए अपने अधिकारों को नहीं पहचानेंगे और सांसदों से इस पुरानी अंग्रेजी प्रणाली को सुधारने और नए नियमों और प्रक्रियाओं को लागू करने के लिए के लिए आग्रह नहीं करेंगे तब तक आप स्वयं को लाचार व वंचितही पाऐंगे।

Independence Day

ऊपर


We are told that India became independent from the British on 15th August 1947, hence 15th August is India’s Independence Day. Indians should not forget this day and to celebrate this day as a special day, Indian Government gives a day off to its citizens.


Did India really become independent on 15th August? Was 15th August 1947 “The Independence Day” for all Indians? My answer to both questions is "no".


Although President, Prime Minister, other ministers and Parliament were functioning, still Mountbatten (till 21. June 1948) and then Chakravarti Rajagopalachari (till 26. January 1950) were appointed as India's highest-ranking official, Governor-General (Viceroy) by the British King 'George 6' and not by Indian parliament. India got her first Chief of Army Staff, General Cariappa only on 15 January 1949, nearly one and a half year later. The Indian army was till this date under the control of the British 'Sir Roy Butcher'. The soul of any country is its constitution and the Constitution of India also came into force on 26th January 1950.


Clement Attlee, Prime Minister of the United Kingdom (U.K.). placed the "Indian Independence Act 1947" in the British parliament on 20. February 1947 which was accepted on 18. July 1947. According to this act


  1. The British government would give full self-government to "British India" by 30 June 1948.

  2. The future of the princely states will be decided after the date of final transfer.


In the act "British-India" and the princely states were mentioned separately. But why? Because only British-India was ruled directly by the British whereas the princely states were always ruled by Indian rulers, although Britain did have a lot of influence over these princely states. After the exodus of the British, the influence of the British on these princely states was to end. Since the princely states were never under the British rule, there was nothing like transfer of power to the princely states, which could have been called as the independence of the princely states. If the British had the right over the princely states, then at the time of the partition of India, the British could have decided which princely states would join India and which would be in Pakistan.


The British made India as their colony for their own interests. The British wanted their economic progress financed by their colonies. In the beginning of the 18th century, India's contribution in the world economy was 24.43% and that of Britain was 2. 88% only. In 1950, India's contribution had decreased to 6.52%.


After the war of 1857, the British economy started deteriorating. To manage their economy, the British made arrangements so that they could exploit the colonies more and strengthen their position. India was of great importance to the British because of its wealth, technology (see: Hum Naa Bhooleen-11) etc. In 1894 the then British Viceroy in India, Victor Alexander Bruce, said, "India is the pivot of our Empire... If the Empire loses any other part of its Dominion we can survive, but if we lose India, the sun of our Empire will have set.”


Source: Wikipedia


Before the start of foreign invasions, India was called "Golden Sparrow" because of its contribution to the world economy. The economy started falling due to continuous attacks. After the death of the Mughal king Akbar in 1605, the Hindu kings became strong again, and with Chhatrapati Shivaji's independence (Swaraj) during the Maratha Empire, India saw short-term economic growth.


On 2nd August 1858, the British Parliament passed the ‘Government of India Act 1858’, allowing the transfer of control of the Indian colony from the East India Company to the British monarchy.


To establish their administration, in 1858, the British formed the "Indian Civil Service" (ICS), which was initially called the "Imperial Civil Service". The British Prime Minister David Lloyd George described ICS during the First World War, as the foundation of the British Raj in India by saying "it is the steel frame of this whole structure", whereas Pt. Jawaharlal Nehru said, "the Indian Civil Service is neither Indian, nor civil, nor a service". After the British left India in 1947, Pt Nehru adopted the same ICS with some minor changes, renaming the ICS to Indian Administrative Service (IAS) was one such change. (Do not forget that during the British-period, ICS officers were called "Collectors" because their main work was to collect taxes, rent, excise etc.).


To support the ICS officers and undermine the dangers of war of 1857, the British laid the foundation of police bureaucracy in India through 'Indian Councils Act, 1861’, in 1861. The police force was first known as 'Superior Police Service' later 'Indian Imperial Police' and is called today as 'Indian Police Service'.


To define the scope of the police, the 'Indian Penal Code' came into force from 1st January 1862. This code was formed under the chairmanship of Lord Thomas Babington Macaulay. This is the same Lord Macaulay whom we know from the introduction of education policy in India (see: Hum Naa Bhooleen-11). This 'penal code' was applicable only in British India and not in the princely states. The princely states had their own courts and legal systems.


These two main administrative services of India are still working mostly according to the model made by the British. There have been some amendments in the 'Indian Penal Code', but most of the rules are still from the British era. The Government of India makes new laws, but if they are not included in the Indian Penal Code, then the police does not consider them in their jurisdiction.


The British had established the administrative system in India to protect their own interests and not for the betterment of the citizens of India. It was such a system in which the governance and administration (in India the decision-making officers for both were British) were not responsible for whatever loss India may suffer. These officers were accountable to the British Parliament. These officers could give their suggestions to the British Parliament but could implement their suggestions only after the approval of the British Parliament.


The administration in India till date operates according to the system introduced by the British, due to which no one considers himself accountable for governance and administration and ordinary citizens are still deprived of their rights.


India will be completely independent only when the rights of its citizens are protected not in the constitutional book but in their daily life too. It is not the job of government and administration to ensure that rights of every Indian are protected but the officials should also be responsible that these rights are available to every citizen and can be practically enjoyed by them. Their responsibility should be towards the Constitution of India and not to the Parliament and MPs of India.


Let us not forget that


  • According to Article 81 of the Indian Constitution, it is the responsibility of the Parliament to

  • represent the views and aspirations of the people of their constituency.

  • to ensure that the executive (i.e., government) performs its duties satisfactorily.

  • contribute to law making.

  • If you vote keeping your caste, religion, creed in mind, then your MP will represent these in Parliament and not your constitutional rights.

  • The work of MP is not to build roads, bridges, parks etc. This is the job of the councilor.

  • Until we become aware and exercise our rights given by the constitution we cannot ask our MPs to improve this old English system and implement new rules and procedures, we will keep finding ourself helpless and deprived.

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