हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen

शहीद दिवस / Shaheed Diwas

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राष्ट्र सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं, जानते थे वे

तिरंगे से बढ़कर कोई कफन नहीं, यह मानते थे वे


२३ मार्च १९३१ [23.03.1931] को लाहौर की सैंट्रल जेल में शाम के लगभग ७ बज कर ३३ मिनट [7:33] पर तीन युवक भगत सिंह (आयु २३ वर्ष ६ माह, जन्म: २८ सितम्बर १९०७), शिवराम हरि राजगुरु (आयु २२ वर्ष ७ माह, जन्म: २४ अगस्त १९०८) व सुखदेव थापर (आयु २३ वर्ष १० माह, जन्म: १५ मई १९०७) अंग्रेजों द्वारा फांसी पर लटका दिए जाते हैं। ये युवक अपनी अल्प आयु में ही उस अदंभ्य साहस का परिचय दे गए जिसकी कल्पना करना भी कठिन है।


हम सभी ने इन युवकों के नाम सुने हुए हैं व हम सभी इन युवकों का भारत के स्वातंत्रय संग्राम में अपने प्राणों की आहुति देने के कारण आदर करते हैं। क्या हमें यह स्मरण है कि इन युवकों को किस कारण से मृत्यु-दंड दिया गया था ? क्या हमें इनके वीरगति को प्राप्त होने के घटनाक्रम का ज्ञान है ? क्या हम इन हुतात्माों को अपने विचारों में, अपने स्मरण में रखते हैं ?


इनमें अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस था। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए इन्हे प्राणों का भी भय नहीं था। इनके कृत्य निजी स्वार्थ हेतु नहीं थे। इन्होंने सदा समाज व राष्ट्र के हित को अपने हित से सर्वोपरि रखा। उनका प्रत्येक श्वास स्वाभिमान से भरा हुआ था। आत्म-विश्वास, दृढ़-संकल्प, संवेदना, विश्वसनीयता, गंभीरता व आत्म-जागरूकता उनके चरित्र के कुछ आभूषण थे।


४ सितम्बर १९२० [04.09.1920] को महात्मा गाँधी द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध 'असहयोग आंदोलन' का आह्वान किया गया। इस आंदोलन में पूरे भारत में बहुत से लोग जुड़ गए। फरवरी १९२२ [1922] में चौरी चौरा में कुछ आंदोलनकारी किसानों को पुलिस ने मार डाला जिसके प्रतिशोध में हिंसा भड़क उठी। हिंसक भीड़ ने २२ पुलिसकर्मियों को मर डाला। महात्मा गाँधी ने तथ्यों को जाने बिना ही 'असहयोग आंदोलन' की समाप्ति की घोषणा कर दी। उनके इस निर्णय के निरंतर विरोध होने पर भी उन्होंने हिंसा की भर्त्सना के अतिरिक्त कुछ नहीं किया। (देखें: हम न भूलें-०७ (अहिंसा परमोधर्म)) परिणाम स्वरूप राष्ट्रवादियों के एक वर्ग का महात्मा गांधी की सोच व उनकी नीतियों से मोहभंग हुआ। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक घटक ने मोती लाल नेहरू और चितरंजन दास के संयुक्त नेतृत्व में एक नई स्वराज पार्टी का गठन किया व युवाओं के एक घटक ने राम प्रसाद 'बिस्मिल’ के नेतृत्व में एक क्रांतिकारी पार्टी का गठन किया।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच एसआर ए; १९२८ से), जिसे १९२४ में अपनी स्थापना के समय हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच आर ए) के नाम से जाना जाता था, राम प्रसाद 'बिस्मिल', अशफाकउल्ला खान, सचिंद्र नाथ बख्शी, सचिंद्रनाथ सान्याल और जोगेश चंद्र चटर्जी द्वारा कानपुर में स्थापित एक भारतीय क्रांतिकारी संगठन था। इस दल का उद्देश्य सशस्त्र क्रान्ति द्वारा औपनिवेशिक शासन को समाप्त करना और संघीय गणराज्य, संयुक्त राज्य भारत की स्थापना करना था।


भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव तीनों ही 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' से जुड़े हुए थे। दिसम्बर १९२७ में 'एच आर ए' के राजेन्द्र लाहिडी, अशफाक उल्ला खाँ, राम प्रसाद 'बिस्मिल' तथा रोशन सिंह को भारत की भिन्न-भिन्न जेलों में 'काकोरी ट्रेन लूट' के आरोपी होने के लिए फाँसी दी गई थी। यह दंड नयाय को साख पर रख कर 'एच आर ए' को नष्ट करने की दृष्टि से दिया गया था। ३० अक्टूबर १९२८ को लाहौर में लाला लाजपत राय के 'साइमन कमीशन' के शांतिपूर्ण विरोध का अंग्रेजों ने शक्ति से दमन किया था जिसमें पुलिस की लाठियों की चोट से ६३ वर्षीय लाला जी की मृत्यु हो गई थी। लाला जी मृत्यु ने युवा क्रांतिकारियों के विरोध की अग्नि में घी का काम किया। भगत सिंह, शिवराम राजगुरु, सुखदेव थापर व चंद्र शेखर आजाद ने 'लाठीचार्ज' का आदेश देने वाले पुलिस अधीक्षक, जेम्स ए. स्कॉट को मारने का प्रण लिया। परन्तु चूक के कारण स्कॉट के स्थान पर १७ दिसंबर १९२८ को इन्होने सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सॉन्डर्स को गोली मार दी।


अपनी चूक का ज्ञान होने पर 'एच एस आर ए' ने सॉन्डर्स की हत्या के लिए क्षमा मांगी और लाहौर में इश्तिहार लगवाए जिसके कुछ अंश थे: जे. पी. सॉन्डर्स मर चुका है; लाला लाजपत राय का बदला लिया। ... इसमें भारत में ब्रिटिश सत्ता के एक एजेंट की मौत हो गई है। ...मनुष्य के रक्तपात के लिए क्षमा करें, लेकिन क्रांति की वेदी पर व्यक्तियों का बलिदान ... अपरिहार्य है।


कांग्रेस नेता महात्मा गांधी ने स्व-परिभाषित 'अहिंसा' के सिद्धांत के प्रतिरूप सॉन्डर्स की हत्या की निंदा करी परन्तु इतिहासकार 'एस के मित्तल व इरफान हबीब' के लेख '१९२० के दशक में कांग्रेस और क्रांतिकारी' के पृष्ठ २४ के अनुसार कांग्रेस नेता जवाहरलाल नेहरू ने तो भगत सिंह को 'आतंकवादी' ही बना दिया। नेहरू ने लिखा कि: भगत सिंह अपने आतंकवाद के कृत्य के कारण लोकप्रिय नहीं हुए, बल्कि इसलिए कि वे लाला लाजपत राय के सम्मान को, और उनके माध्यम से राष्ट्र के लिए, प्रतिशोधी प्रतीत होते थे।


१९२९ में 'एच एस आर ए'ने लाहौर और सहारनपुर में बम कारखाने स्थापित किए थे। १५ अप्रैल १९२९ को पुलिस ने लाहौर बम कारखाने को खोज निकाला जिससे सुखदेव, किशोरी लाल व जय गोपाल सहित 'एच एस आर ए' के अन्य सदस्यों की गिरफ्तारी संभव हुई। इसके कुछ देर बाद ही सहारनपुर कारखाने पर भी छापा मारा गया और कुछ क्रांतिकारी पुलिस की यातनाओं के आगे टिक न सके। नई जानकारियाँ मिलने से पुलिस सॉन्डर्स हत्या, असेंबली बम विस्फोट और बम निर्माण के तीन पहलुओं को जोड़ने में सक्षम हुई। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु व २१ अन्य लोगों पर सॉन्डर्स की हत्या का आरोप लगाया गया था।


जनमानस में क्रांतिकारियों का समर्थन बढ़ता जा रहा था। क्रांतिकारियों के अपनी मांगों के लिए आमरण अनशन को अंगेजों द्वारा बल से कुचलने के प्रयासों के कारण भी जनता में अंग्रेजों के प्रति प्रतिशोध प्रबल हो रहा था। अंग्रेज चाहते थे कि क्रांतिकारियों का शीघ्र से शीघ्र दमन कर दिया जाए। ७ अक्तूबर १९३० को अदालत के द्वारा भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गई। उन्हें २७ अक्तूबर १९३० को फाँसी दी जानी थी। फाँसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा १४४ (उन लोगों की संख्या को सीमित करती है जो एक स्थान पर एकत्रित हो सकते हैं) लगा दी गई कि फाँसी के समाचार से कहीं स्थिति नियंत्रण के बाहर न हो जाए।


इस मृत्यु-दंड के विरुद्ध प्रिवी काउंसिल (ब्रिटिश सम्राट की सलाहकार परिषद के रूप में चुने गए अधिकारियों और गणमान्य व्यक्तियों का एक निकाय) में अपील का निर्णय लिया गया जिसे अंग्रेजों ने ठुकरा दिया। भीमराव अम्बेडकर जी के अनुसार तीनों क्रांतिकारियों की अपील को स्वीकार किए बिना उन्हें निष्पादित करने का निर्णय न्याय की सच्ची भावना में नहीं लिया गया था अपितु 'लेबर पार्टी' के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सरकार के 'कंजरवेटिव पार्टी' से प्रतिक्रिया के भय व इंग्लैंड में जनता को प्रसन्न करने की आवश्यकता से प्रेरित था।


इन तीनों की बचाव की भिन्न प्रक्रियाओं के कारण फाँसी की तिथि २४ मार्च १९३१ तक बढ़ गई। जनता के प्रतिशोध के भय के कारण सभी नियमों को ताक पर रख कर निर्धारित समय से ११ घंटे पूर्व ही २३ मार्चकी सांय को इन तीनों को फँसी दे दी गई। यह संभवत: अंग्रजों की घृणा व अपमान की परिकाष्ठा ही थी कि हुतात्माओं के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के स्थान पर अंग्रेजों ने इनके मृत शरीरों के टुकड़े किये और बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये। सतलुज नदी (लाहौर से लगभग ५० कि. मी. दूर) के किनारे इनके विक्षिप्त शवों को घी नहीं अपितु मिट्टी का तेल डालकर ही जलाया जाने लगा। देर रात में नदी किनारे जलती आग देख कर गाँव के लोग वहां आए तो अंग्रेज वहाँ से भाग गए। गाँव के लोगों द्वारा उन मृत शरीरों के टुकड़ों के अवशेषों का विधिवत दाह संस्कार कराया गया।


हम न भूलें कि

  • क्रांतिकारी व आतंकवादी में अंतर आप उसके उद्देश्य व उद्देश्य-पूर्ति के लिए कार्य किस प्रकार किए गए है, उन्हें जान कर लगा सकते है। दोनों के स्वभाव में अंतर है। जनमानस में क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखने वाली एक बड़ी संख्या आपको मिल जाएगी परन्तु आतंकवादियों से नहीं।

  • महात्मा गाँधी ने सदा क्रांतिकारियों के कृत्यों की निंदा की। अपनी साप्ताहिक पत्रिका 'यंग इंडिया' के २ जनवरी १९३० के लेख में क्रांतिकारियों के विरोध में उन्होंने 'बम का पंथ' शीर्षक से लेख भी लिखा।

  • बहुत से क्रांतिकारी आमरण अनशन करते हुए मृत्यु के ग्रास हुए। जतिन दास (६३ दिन तक अनशन, आयु २५ वर्ष) का नाम इनमें प्रमुख है।

  • भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने नई दिल्ली संसद के केन्द्रीय कक्ष में बम धमाका में स्वयं को अंग्रेजों द्वारा 'राजनीतिक कैदी' स्वीकार किए जाने हेतु ११६ दिन तक अनशन किया था। दोनों ने ही संसद में स्वयं को गिरफ़्तार होने दिया था ताकि वे न्यायालय व समाचार-पत्र आदि के माध्यम से अपने उद्देश्यों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा सकें। आतंकवादी ऐसा नहीं करते।

Shaheed Diwas: (Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev)

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rāshtr sewā se badkar koi dharm nahi, jānte the ve

tirange se badkar koi kafan nahi, yah mānte the ve


On 23rd March 1931, in the Central Jail of Lahore at about 7.33 PM, three youths Bhagat Singh (Age 23 years 6 months, born on 28th September 1907), Shivram Hari Rajguru (Age 22 years 7 months, born on 24th August 1908) and Sukhdev Thapar (age 23 years 10 months, born on 15th May 1907) were hanged by the British. These young men showed indescribable courage at a very young age, which is difficult to imagine.


We all have heard the names of these young men and we all respect them for sacrificing their lives in the freedom struggle of India. Do we remember why these youths were given the death penalty? Do we have knowledge of the events leading to their martyrdom? Do we keep these dead souls in our thoughts, in our memory?


They had the courage to fight against injustice. They did not even fear for their lives to achieve their purpose. Their deeds were not for any personal benefits. They had always put the interest of the society and the nation above their own interests. Their each and every breath was filled with pride. Self-confidence, determination, sensitivity, credibility, seriousness and self-awareness were some of the jewels of their character.


On 4th September 1920, Mahatma Gandhi called for a 'Non-cooperation Movement' against the British. Many people all over India joined this movement. In February 1922, some agitating farmers were killed by the police at Chauri Chaura. In retaliation violence broke out and the violent mob killed 22 policemen. Mahatma Gandhi announced the end of the 'Non-cooperation Movement' without considering the facts. Despite constant opposition and request to reconsider his decision, he did nothing except condemed the violence. (See: Hum Naa Bhooleen-07 (Ahimsa Paramodharma)) As a result, a section of nationalists became disillusioned with Mahatma Gandhi's thinking and his policies. A constituent of the Indian National Congress formed a new Swaraj Party under the joint leadership of Motilal Nehru and Chittaranjan Das and a constituent of the youth formed a revolutionary party under the leadership of Ram Prasad 'Bismil'.

The Hindustan Socialist Republican Association (HSRA; from 1928), was known as the Hindustan Republican Association (HRA) at the time of its formation in 1924. It was an Indian revolutionary organization founded by Ram Prasad 'Bismil', Ashfaqullah Khan, Sachindra Nath Bakshi, Sachindranath Sanyal and Jogesh Chandra Chatterjee in Kanpur. The objective of this party was to end the colonial rule by armed revolution and to establish the Federal Republic of India.


Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev were associated with 'Hindustan Socialist Republican Association'. In December 1927, Rajendra Lahidi, Ashfaq Ulla Khan, Ram Prasad 'Bismil' and Roshan Singh of 'HRA' were accused of 'Kakori train robbery' and hanged in different jails of India. The hidden agenda behind this punishment was to destroy the 'HRA' by ignoring justice. On 30th October 1928, the British repressed Lala Lajpat Rai's peaceful protest against the Simon Commission in Lahore with force, in which 63 year old Lala ji got killed by police batons. Lala ji's death served as fuel in the fire for protesting young revolutionaries. Bhagat Singh, Shivram Rajguru, Sukhdev Thapar and Chandra Shekhar Azad vowed to kill James A Scott, the superintendent of police, who gave the order of 'Lathicharge', but due to mistaken identity they shot John P. Saunders, the Assistant Superintendent of Police instead of Scott, on 17th December 1928.


The 'HSRA' put up posters in Lahore in which they also apologized for the death of Saunders. Excerpts from the poster: J. P. Saunders is dead; With the death of J.P. Saunders the assassination of Lala Lajpat Rai has been avenged. .... We are sorry to have killed a man. …. We are sorry for shedding human blood it becomes necessary to bathe the altar of revolution ....


Congress leader Mahatma Gandhi as an icon of the self-defined 'non-violence' principle condemned the assassination of Saunders. According to historian 'SK Mittal and Irfan Habib', page 24 of the article 'The Congress and the Revolutionaries in the 1920s', Congress leader Jawaharlal Nehru declared Bhagat Singh a 'terrorist'. Nehru wrote, “Bhagat Singh did not become popular because of his act of terrorism but because he seemed to vindicate, for the moment, the honour of Lala Lajpat Rai, and through him of the nation.”


In 1929, HSRA installed bomb factories in Lahore and Saharanpur. On 15th April 1929, the police discovered the Lahore bomb factory and arrested Sukhdev, Kishori Lal and Jai Gopal along with some other members of the HSRA. Shortly after this, the Saharanpur factory was also raided and some revolutionaries could not withstand the police torture. With the newly acquired information, the police were able to link the Saunders murder, the assembly bombing and the bomb manufacturing factories. Bhagat Singh, Sukhdev, Rajguru and 21 others were charged with the killing of Saunders.


The public was supporting the revolutionaries in large numbers. The revolutionaries went on 'fast till death' to get their demands heard and fulfilled by British. The use of force by British to crush this fasting of the revolutionaries, enraged the public and vendetta against the British even further. The British wanted the revolutionaries to be suppressed at the earliest. Bhagat Singh, Sukhdev and Rajguru were sentenced to death by the court on 7th October 1930. They were to be hanged on 27th October 1930. Along with the announcement of the death sentence, section 144 (restricts the number of people that can gather at a place) was imposed in Lahore to avoid the situation getting out of control due to the news of the execution.


An appeal against this death penalty was to be made to the Privy Council (a body of officials and dignitaries elected as advisory councils to the British monarch), which was turned down by the British government. According to Bhimrao Ambedkar, the decision to execute the three revolutionaries by the British Government led by the 'Labor Party', without accepting the appeal was not taken in the true spirit of justice. It was driven by the fear of a reaction from the 'Conservative Party' and also by the need to please the public in England.


Due to the different efforts made to save the three lives, the date of execution got extended till 24th March 1931. The British had a strong fear of public retaliation. Britishers ignored the rules and regulations and hanged the three revolutionaries 11 hours before the scheduled time on the evening of 23rd March. It was probably the culmination of the hatred and humiliation by the British that instead of respectable funeral rites for the dead, the British dismembered their dead bodies and carried them in sacks towards Ferozepur. On the banks of the Satluj river (about 50 km from Lahore), their deranged dead bodies were burnt by pouring kerosene instead of ghee. Seeing the fire burning on the banks of the river late in the night, when the people of the village came there, the British fled. The remains of the fragments of those dead bodies were later duly cremated by the people of the village.


Let us not forget that

  • You can differentiate between a revolutionary and a terrorist by understanding their 'purpose' and the way they realise their goals. Both are different by nature and character. You will find a large number of people sympathizing with revolutionaries but not terrorists.

  • Mahatma Gandhi always condemned the actions of the revolutionaries. In his weekly magazine 'Young India' on January 2, 1930, he also wrote an article titled 'Cult of Bombs' in opposition of the revolutionaries.

  • Many revolutionaries died while fasting to death. The name of Jatin Das (63 days fast, age 25 years) is most prominent among them.

  • Bhagat Singh and Batukeshwar Dutt went on a fast for 116 days to get themselves accepted as 'political prisoners' by the British for the bomb blast in the Central Hall of New Delhi Parliament. Both allowed themselves to be arrested in the Parliament so that they could reach out to as many people as possible through courts, newspapers etc. Terrorists don't act this way.

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