top of page

हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (25)

सनातन-धर्म और विज्ञान

Sanātan Dharm and Science

To read article in english please click here


वर्तमान में वैदिक धर्म का जो स्वरूप हमे देखने को मिलता है, उसे आज का तर्कशील व वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला मानव अंधविश्वास अथवा रूढ़िवाद की संज्ञा देता है। हम देखते हैं कि स्वयं को बुद्धिजीवी मानने वाले धर्म की परंपरा, परिपाटी व उसके वर्तमान स्वरूप की कभी उपेक्षा करते हैं तो कभी व्यंग्य करते हैं। यह विचारणीय है कि क्या वास्तव में हमारे सनातन धर्म की पूजा-पाठ पद्धति, पर्व-त्यौहार, सांस्कृतिक मान्यताएँ, रीति-रिवाज आदि केवल आस्था पर टिके हैं या उनका कोई वैज्ञानिक आधार भी है।


भारतीय संस्कृति व वैदिक धर्म के विषय में आश्चर्यचकित करने वाला सत्य है कि यूरोप और अमेरिका में भारत की जितनी प्राचीन मूल पांडुलिपियाँ हैं उतनी भारत में नहीं हैं। जितनी शोध पश्चिम में भारतीय संस्कृति व वैदिक धर्म पर हुई है और की जा रही है उतनी भारत में नहीं होती है। दुर्भाग्यवश विदेशी मुसलमान व ईसाई आक्रांताओं के शासनकाल में उनकी 'हिंदू-दमन' की नीतियों के कारण हिन्दुओं, हिन्दू-मंदिरों, हिन्दू-ग्रंथों व हिन्दू-जीवनशैली को इतनी हानि पहुंचाई गई कि हिन्दुओं के मूल ग्रन्थ "वेद" भी भारत से लुप्त हो गए। "आर्य समाज" के संस्थापक ऋषि दयानन्द सरस्वती ने जर्मनी से वेदों की प्रतिलिपियाँ मँगवाई।


विदेशी आक्रांताओं के 'हिंदू-दमन' वाले कालखंड में अपने ग्रंथों को नष्ट होने से बचाने के लिए हिन्दू विद्वान ग्रंथों को कंठस्थ करते थे और ये कंठस्थ ग्रंथ एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी को दे दिए जाते थे। उस समय उत्तर भारत में (जहाँ इन आक्रांताओं का दुष्प्रभाव अधिक था) ४ उपनामों का जन्म हुआ।

  • वेद / वेदी: इन्होने एक वेद कंठस्थ किया

  • द्विवेदी: इन्होने दो वेद कंठस्थ किए

  • त्रिवेदी: इन्होने तीन वेद कंठस्थ किए व

  • चतुर्वेदी: इन्होने चारों वेद कंठस्थ किए

यह हिन्दू समाज का दुर्भाग्य ही है कि वर्तमान में हिन्दू विदेशियों द्वारा हिंदू संस्कृति की उपलब्धियों के बखान पर प्रसन्न होता है, उनके सनातन-वैदिक धर्म को स्वीकारने पर हर्ष करता है परन्तु अपने समाज में बढ़ रही कुरीतियों, कुप्रथाओं को दूर करने के स्थान पर धन व सांसारिक सुख-संसाधनों को पाने की दौड़ में लिप्त रहता है। हमारी भावी पीढ़ी में संस्कारों की कमी है, वह सांस्कृतिक मूल्यों को खोती जा रही है, ऐसी चिंता हमारा समाज आज अवश्य करता है परन्तु चिंता-निवारण के लिए भरसक प्रयास नहीं करता। समाज की यह उदासीनता हमारे तथाकथित धर्मगुरुओं में भी देखी जा सकती है जो इस विषय में कुछ नहीं कर रहे। यह खेद की बात है कि वातानुकूलित आश्रमों में भव्य व्यास-पीठों, आसनों पर बैठ कर वे धर्म बेच रहे हैं। आज के परिपेक्ष में वे धर्म-गुरु कम अपितु धर्म-व्यापारी अधिक हो गए हैं। बहुत उचित हो यदि वे हमें धर्म का वैज्ञानिक स्वरूप बताएँ, समाज में व्याप्त भ्रांतियाँ दूर करें जिससे समाज में हिन्दू-मूल्यों की पुनर्स्थापना हो सके।


इस पृथ्वी पर बहुत से देश हैं। धरती के भिन्न-भिन्न भागों पर प्राचीन काल से मानव जीवन रहा है। कालांतर में भिन्न सभ्यताओं व संस्कृतियों का उदय व पतन हुआ है। क्या यह मात्र संयोग है कि भारत प्राचीन काल से आध्यात्मिक गुरु रहा है। वेद, उपनिष्द, दर्शन आदि ग्रंथों की रचना इसी धरती पर हुई है। युगों-युगों के भीषण प्रहार, राजनैतिक व सामाजिक परिवर्तनों के उपरांत आज भी इस देश की धरती सहस्रों ऋषियों, साधु-संतों की वाणी से गुंजायमान है। प्राचीन मिस्र, यूनान, बेबीलोन और रोम के धर्म नष्ट हो गए किन्तु हिन्दू सनातन धर्म अनादिकाल से आज भी विद्यमान है। क्या किसी एक विशेष समाज व भू-भाग के साथ इतने संयोग संभव है ? कहीं इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण तो नहीं ? अध्ययन व चिंतन करने पर आप पाएंगे कि यह कोई संयोग नहीं है। भारत की भौगोलिक स्थिति विशेष है। भारत पृथ्वी के उस भू-भाग पर स्थित है जहाँ सूर्य और बृहस्पति ग्रह का अद्भुत प्रभाव पड़ता है। खगोल एवं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य व बृहस्पति मनुष्य की आध्यात्मिकता के कारक माने जाते हैं। सूर्य व बृहस्पति से आने वाली तरंगो का विकिरण भारत के भू-भाग को गहन रूप से प्रभावित करता है जिस कारण भारत में आध्यात्मिकता का वातावरण बना रहता है। प्रेम, दया, सहिष्णुता का भाव भारत-भूमि पर होना स्वाभाविक है, आश्चर्य नहीं।


विश्व के अधिकांश देशों में तीन अथवा चार ऋतुएँ होती हैं। भारत ही एकमात्र ऐसा देश हैं जहाँ छः ऋतुएँ (ग्रीष्म, वर्षा, शरद, पतझड़, शीत व बसंत) होती हैं। (पाकिस्तान व बंगलादेश भी १९४७ से पहले भारत का ही भू-भाग थे।) ऋतुओं का सीधा संबंध सूर्य एवं पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति से होता है।


आज पश्चिम जगत के वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि ऋतु परिवर्तन का प्रभाव मनुष्य के मन, मस्तिष्क एवं शरीर पर पड़ता है। ऋतु में परिवर्तन आने पर प्रकृति भी अपनी लय बदलती है और हमें वायु, वनस्पति, जीव-जन्तु आदि या कहें कि सम्पूर्ण वातावरण में ही अंतर अनुभव होने लगता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति के साथ लय बिठाते हुए जीवन जीने पर बल दिया है। वैदिक संस्कृति के अनुयायी प्रकृति के अंगों सूर्य, चंद्र, नदी, जल, वायु, नक्षत्र, वनस्पति, पशु-पक्षी, आदि को देव मानते है। ('देवो दानात्वा:' जो हमे दान दे, वह देव है।) हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य व प्रकृति के संतुलन को अत्यधिक महत्त्व दिया है और हमे सचेत किया है कि असंतुलित प्रकृति में सुखमय मानव-जीवन संभव नहीं है। प्रकृति की महत्ता समझते हुए ही हमारे ऋषि-मुनियों ने हमें बताया है कि हम पर 'देवऋण' है जिसे हमें उतरना है। (देखें: हिन्दुओं के १६ संस्कार - भाग (६/९)) हमारे पूर्वज यह भली प्रकार जानते थे कि ऋतू बदलने के साथ-साथ हमारे शरीर में भी परिवर्तन आता है और हमारे शरीर में रसायनों के अनुपात बदलते हैं जिस कारण हम भोजन, खाद्य-पदार्थों की ईच्छा, कार्य करने की रुचि, शरीर में ऊर्जा, कामुकता आदि में अंतर अनुभव करते हैं। ऋतु परिवर्तन के कारण मानव शरीर व प्रकृति के संतुलन व लय को बनाए रखने के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्व-त्यौहार जोड़ दिए। इन पर्वों के साथ उपवास जोड़े गए कि जिससे मनुष्य अपने शरीर के रसायनों पर नियंत्रण रख सके। उपवास के समय व उसके पश्चात क्या खाना है इसके प्रावधान भी उन्होंने किए। यह कोई संयोग नहीं अपितु विचारणीय है कि हमारे पर्व व त्यौहार प्राय: पूर्णिमा, अमावस्या अथवा शुक्ल पक्ष में ही मनाए जाते हैं।


प्रत्येक ऋतु में मिलने वाले फल, सब्जी, कंद-मूल आदि में प्रकृति के परिवर्तन से विशेष प्रकार के रसायनों एवं तत्वों का प्रभाव मिलता है। ये रसायन ऋतु परिवर्तन के कारण मनुष्य के शरीर में रसायनों के अनुपात में हुए परिवर्तन के कारण मनुष्य के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक व महत्त्वपूर्ण होते हैं। आयुर्वेद ऋतु के फल-सब्जी आदि के सेवन पर अत्यधिक बल देता है। यह दुःख व खेद की बात है कि वर्तमान में ऋतु-फल (फल ही नहीं अपितु सब्जी, कंद-मूल आदि भी) अपना अर्थ खोते जा रहे हैं। आज बेमौसम कृत्रिम-खाद व -वातावरण में (ग्रीनहाउस) औद्योगिक रसायनों व कीटनाशकों का प्रयोग करते हुए कम भूमि-क्षेत्रफल में अधिक से अधिक उपज को पाना वैज्ञानिक उन्नति का मापदंड माना जा रहा है। यह कृषि की तथाकथित उन्नति अधिक धन कमाने की लालसा से वशीभूत है न कि खाद्य -पदार्थों द्वारा रोगरहित स्वस्थ शरीर एवं दीर्घायु पाने की कामना से प्रेरित। पूर्वकाल में प्राकृतिक खाद का प्रयोग होता था और ऋतु व प्रकृति दोनों का प्रभाव कृषि पर पड़ता था और ऐसे ऋतु फल के सेवन से लाभ होता था। यह एक वैज्ञानिक सत्य है कोई अंध-विश्वास नहीं। आज संपूर्ण विश्व इस नवीन वैज्ञानिक औद्योगिक कृषि के दुष्परिणामों से परिचित हो रहा है। आज का विज्ञान 'अधिक धन व अधिक लाभ' को प्राथमिकता दे रहा है और धरती, वायु, जल, वनस्पति आदि पर इस एकाकी वैज्ञानिक उन्नति के दुष्परिणामों को अनदेखा सा कर रहा है। यह कैसा विज्ञान है? यह कैसी उन्नति है जो जीवन के लिए अनिवार्य प्रकृति व उसके संसाधनों को आर्थिक लाभ के लिए हानि पहुंचा सकती है। आज विश्व भर में 'आर्गेनिक' कृषि से अनाज, फल-सब्जियां आदि उगाई जा रही हैं परन्तु (१) वे इतनी महंगी है कि साधारण जन-मानस की पहुंच से बहुत दूर हैं व (२) जनसंख्या का एक विशाल वर्ग इस अविश्वास में है कि 'आर्गेनिक-उत्पाद' वास्तव में प्राकृतिक विधि से ही उत्पन्न हुए हैं।

(क्रमश :- )

हम न भूलें कि

  • विश्वास व अंध-विश्वास दोनों ही मन की धारणाएँ हैं। बौद्धिक-तर्क व अनुभवों की सत्यता के आधार पर बनी धारणा विश्वास है और इनके अभाव में बनी धारणा अंध-विश्वास।

  • अंध-विश्वास मनुष्य की तार्किक-शक्ति को क्षीण व बुद्धि को कुंठित करता है।

  • विषयों की सत्यता अनुभव व बुद्धि के समर्थन एवं स्वीकारने से ही प्रमाणित होती है।

  • विज्ञान सत्यता के प्रमाण का आधार है।

Sanātan Dharm and Science

ऊपर

The Vedic religion, as it appears today is defined as conservative and full of superstition by people who claim to have a logical and scientific approach in life. We find that people who consider themselves intellectuals sometimes either ignore the present form of religion, its traditions and conventions or sometimes even make fun of it. It is worth considering whether our Sanātan Dharm's worship methods, festivals, cultural beliefs, customs, etc. are based only on faith or they have any scientific basis.


It is a surprising truth that India does not have as many ancient original manuscripts about its culture and Vedic religion as possessed by Europe and America. The amount of research that has been done and is being done today on Indian culture and Vedic religion in the West is not done in India. Unfortunately, during the reign of foreign Muslim and Christian invaders, their 'Hindu-suppression' policies harmed Hindus, Hindu-temples, Hindu-scriptures and Hindu-lifestyle so much that even the main scriptures of Hindus, the "Veds" also disappeared from India. Rishi Dayanand Saraswati, the founder of "Arya Samāj", had to get the printed copies of the Veds from Germany.


In order to save the Hindu sacred texts and scriptures from destruction during the Hindu-oppressive period of foreign invaders, Hindu scholars used to memorize the texts and these memorized texts were passed from one generation to the next. At that time in North India (where the losses and destruction by invaders was the most) 4 surnames were born

Ved / Vedi: they memorized one Ved

  • Dwivedi: they memorized two Veds

  • Trivedi: they memorized three Veds and

  • Chaturvedi: they memorized all the four Veds

It is sad for the Hindu society that at present, on one side the Hindus feel good when foreigners talk about the achievements of Hindu culture, when they give-up everything and accept the Sanātan-Vedic religion and way of life, but on the other side instead of removing the increasing evils and bad practices in the society, the Hindus themselves indulge and involve more and more in the rat race to get more wealth and worldly pleasures. Our Hindu society talks a lot about the loss of ethics and values in the young generation and worries about the further loss of these and Hindu-culture in the future generations but does not do much to solve these concerns. This indifference of the society can also be seen among our so-called religious leaders who are hardly doing anything in this regard. It is a matter of regret that these Dharm-Gurus sitting on grand thrones like chairs on decorated air-conditioned stages are selling religion from their āshrams. In today's context, these spiritual leaders have become more or less 'religion-traders'. It would be highly appreciable if they would remove the misconceptions prevailing in the society, tell us the scientific and appropriate form of traditions and rituals of religion, so that Hindu values can be restored in the society.


Human life has existed in different parts of the earth since ancient times. Different civilizations and cultures have risen and fallen over time. Is it just a coincidence that India has been a spiritual master since ancient times! Veds, Upanishads, Darshans and other sacred texts were composed on its soil. In spite of the terrible attacks, political and social changes over the ages, the land of this country is resonating even today with the words of thousands of sages, holy-, sacred- and great- personalities. The religions of ancient Egypt, Greece, Babylon and Rome got destroyed but Hindu Sanātan Dharm is still present since time immemorial. Are so many coincidences possible with any particular society and region? Or if there is any scientific reason behind this? On analysing you will find that this is not a coincidence. The geographical position of India is special. India is located on that part of the earth where Sun and Jupiter have a wonderful effect on it. According to astronomy and astrology, Sun and Jupiter are considered to influence the human spirituality. The radiations from Sun and Jupiter affect the Indian territory due to which an atmosphere of spirituality prevails here. The feelings of love, kindness, tolerance are natural on the land of India.


Most of the countries of the world have three or four seasons. India is the only country which has six seasons (summer, monsoon, cold, autumn, winter and spring). (Pakistan and Bangladesh were also part of India before 1947.) The seasons are directly related to the geographical position of the sun and the earth.


Today, the scientists of the western world also accept the fact that the change of seasons has an effect on the mind and body of a person. When the season changes, nature also changes its rhythm and we feel the difference in air, vegetation, animals, birds etc. One can say that the whole environment changes. Our sages have emphasized to live in harmony with nature. The followers of Vedic culture consider the sun, moon, river, water, air, stars, vegetation, animals and birds, etc. as Devtās (Gods). ('Devo Dānātvā:' The one who gives us charity is God.) Our sages have given utmost importance to the balance between human and nature and warned us that a happy human life is not possible in an unbalanced nature. Understanding the importance of nature, our sages have told us that we are in 'debt of Devtās' which we must pay back. (See: 16 Samskaras of Hindus - Part (6/9)) Our forefathers knew very well that change of season brings changes in human body too. The proportions of chemicals in our body change due to which we feel the difference in food cravings, interest in work, energy in the body, sexuality etc. To maintain the balance and rhythm between the human body and nature our sages introduced festivals and celebrations for every season. Fasting was added to these festivals so that a person could control the chemicals in his/her body. Our sages also made provisions for what one should eat while fasting. It is not a coincidence, but worth considering that our festivals are usually celebrated on the day of full moon, new moon (amāvasyā) or Shukla Paksh only.


The change of nature has special effect on the elements of the seasonal fruits and vegetables. These elements are beneficial and important for the physical and mental health of a person due to the change in the proportion of chemicals in the human body resulting due to the change in season. Ayurved lays great emphasis on the consumption of seasonal fruits and vegetables. It is a matter of sadness and regret that at present the term seasonal-fruits (not only fruits but also vegetables, tubers-roots etc.) is losing its meaning. Today, harvesting crops using industrial chemicals, fertilizers and pesticides even under artificial environment (greenhouse), getting maximum yield in less land-area is being considered as the parameter of scientific progress. This so-called agricultural progress is motivated by the desire to earn more money and not by the desire of cultivating food items and crops to get healthy, disease-free body and long life. In the past, natural fertilizers were used. Season and nature had their effect on agriculture and the consumption of such seasonal food was beneficial. This is a scientific fact, not a superstition. Today the whole world is becoming familiar with the side effects of this new scientific industrial agriculture practices. Today's science is giving priority to 'more money and more profit' and ignoring the side effects of this one-sided scientific progress on soil, air, water, vegetation etc. What kind of science is this? What kind of progress is this which can harm the nature and its resources essential for life for any economic gain. Today, 'organic' farming is becoming popular. Grains, fruits and vegetables are being grown all over the world, but (1) they are so expensive that they are far out of the reach of common people and (2) a large section of the population is in disbelief if the 'organic-products' are actually produced using natural methods.

(To continue :- )

Let us not forget that

  • Both faith and superstition are the conceptions of the mind. 'Belief' made on the basis of intellectual-reasoning and truthfulness of experiences is a 'belief' but 'belief' made in the absence of these is a 'superstition'.

  • Superstition weakens person's logical power and frustrates his intellect.

  • The truth of subjects is proved only by the support and acceptance of experience and intelligence.

  • Science is the basis of proof of truth.

Article Begin

Recent Posts

See All

हिन्दुत्त्व - विज्ञान अथवा अंध-विश्वास Hinduism - Science or Superstition To read article in english please click here आज की हिन्दू युवा पीढ़ी अपने कई रीति-रिवाजों को भली प्रकार समझ न पाने के कारण उन्

हिन्दू होने पर गर्व करें Be proud to be a Hindu To read article in english please click here आज आपको बहुत लोग कहते मिल जाएंगे, "भगवान एक है, सभी धर्म उसे पाने का मार्ग बताते हैं। आप किसी भी धर्म को मा

हिंदुत्वव अब्रहमिक धर्म Hindutv and Abrahamic religions To read article in english please click here यूरोपीय लोगों द्वारा विशेष रूप से अंग्रेजों द्वारा 'आर्यों' की संस्कृति, जीवन-शैली आदि का अपनी श्रे

bottom of page