हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen

श्री राधाबिनोद पाल / Shri Radhabinod Pal

To read article in english please click here

भारत एक प्राचीन देश है जिसका लंबा इतिहास है। भारत आज विश्व में विभिन्न क्षेत्रों में अपने योगदान और उपलब्धियों के लिए जाना जाता है। अनेक लोगों ने भारत की संस्कृति में और इसका गौरव बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। इन व्यक्तियों ने समाज को न केवल प्रेरित किया अपितु ये समाज में आदर्श भी बने। हम उनसे सदैव प्रेरणा लेते रहें, इसलिए हम उन्हें याद करते हैं और उनका जन्मदिवस अथवा पुण्य-तिथि मनाते हैं।

आज, १० जनवरी को, हम श्री राधाबिनोद पाल को उनकी पुण्यतिथि (२७.०१.१८८६ - १०.०१.१९६७ ) [27.01.1886 - 10.1.1967]पर हम उन्हें न केवल, शिक्षाविद, न्यायाधीश कलकत्ता उच्च न्यायालय (१९४१ – ४३) [1941-43], कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति (१९४४ – ४६) [1944-46], ‘देन हाग’ में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश (१९५७) [1957] और अंतर्राष्ट्रीय न्याय आयोग के अध्यक्ष (१९५८ – ६२) [1958-62]के रूप में याद करते हैं अपितु मुख्यत: उनके निर्णय के लिए जो उन्होंने ‘अंतर्राष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण सुदूर-पूर्व’ के न्यायाधीश (१९४६ – ४८) [1946-48]के रूप में दिया था।


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। मित्रपक्ष शक्तियाँ (एलाइड पॉवर्स) ने उन जापानी नेताओं और जनरलों पर मुकद्दमा चलाने का निर्णय लिया, जो उनके अनुसार, प्रशांत युद्ध में जापान की भागीदारी के साथ-साथ 1930 और 1940 के दशक में सैन्यवादी जापान के निर्माण के लिए उत्तरदायी थे। मित्र देशों की शक्तियों के सर्वोच्च कमांडर जनरल डगलस मैकआर्थर ने सुदूर पूर्व के लिए अंतर्राष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण की स्थापना की। नवंबर १९४८ में इस न्यायाधिकरण ने सर्वसम्मति (एक असहमति) से जापान के शीर्ष आठ नेताओं को मृत्यु-दंड व अन्य १७ [17] को कारावास की सजा सुनाई। ट्रिब्यूनल के सभी न्यायाधीशों (कुल 11 और एशिया से 3) में, डॉ राधाबिनोद पाल एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनके निर्णय में प्रतिवादी दोषी नहीं थे। उनकी असहमति के मूल कारण थे:

  • क्या जापान को युद्ध के लिए उकसाने वाले, उसके विरुद्ध लड़ने वालों को अपनी पसंद का एक न्यायाधिकरण स्थापित करने और अपने पराजित दुश्मन को अपनी ही शर्तों पर कटघरे में खड़े करने का कोई नैतिक व कानूनी अधिकार हो सकता है।

  • युद्ध अपराध न्यायाधिकरण के गठन में जापान की कोई भूमिका नहीं थी।

  • न्यायाधिकरण की वैधता संदिग्ध है, क्योंकि प्रतिशोध की भावना निर्णय पारित करने के लिए अंतर्निहित मानदंड था न कि निष्पक्ष न्याय।

  • ट्रिब्यूनल श्रेणी 'ए' अपराध (शांति व मानवता के विरुद्ध) पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं कर सकता है। जब जापान युद्ध के लिए गया था तब अंतरराष्ट्रीय नियमों के आधीन ऐसे कोई अपराध सूचीबद्ध नहीं थे।

  • संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा परमाणु बम के उपयोग को अपराधों की सूची से बाहर रखना।

  • पराजित राष्ट्रों के न्यायाधीशों का बहिष्कार।

कमांडर जनरल डगलस मैकआर्थर ने उनके निर्णय को उस समय सार्वजनिक नहीं होने दिया था। डॉ राधाबिनोद के निर्णय को जानने के पश्चात स्वतंत्र भारत के प्रधान मंत्री नेहरू ने यह कहते हुए पाल से तुरंत दूरी बना ली कि वह औपनिवेशिक सरकार के एक नियुक्त व्यक्ति थे। नेहरू जी को संदेह था कि कहीं अमेरिका व अन्य देश यह न समझें कि भारत सरकार ने पाल के फैसले को प्रेरित किया है।


१९५२ [1952]में जापान ने ‘सैन फ्रांसिस्को शांति संधि’ पर हस्ताक्षर किए और सभी मुकदमों के निर्णयों को स्वीकार किया। तब अमेरिका ने जापान पर अपना कब्जा समाप्त किया और प्रतिबंध हटने के पश्चात डॉ पाल का निर्णय प्रकाशित हो सका। १९५८ में डॉ पाल को संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय न्याय आयोग के लिए चुना गया जिसके उपरांत १९५९ में भारत सरकार ने उन्हें "पद्म विभूषण" से सम्मानित किया।

१४ दिसंबर, २००६ को प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने भारत-जापान मित्रता को मजबूत करने में डॉ पाल के "सैद्धांतिक निर्णय" को याद किया। जापानी प्रधान मंत्री आबे ने तब भारत की संसद को बताया, "जस्टिस पाल को आज भी कई जापानी लोगों द्वारा उनके द्वारा प्रदर्शित साहस की महान भावना के लिए अत्यधिक सम्मानित किया जाता है।" जापान के यासुकुनी मंदिर तथा क्योतो के र्योजेन गोकोकु मंदिर में न्यायमूर्ति राधाबिनोद के लिए विशेष स्मारक निर्मित किए गये हैं ।


डॉ पाल की शिक्षा का आरम्भ बहुत रोचक है। उनका जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। पिता की मृत्यु उनकी अल्प आयु में ही हो गई थी और जीवन निर्वाह के लिए उनकी मां लोगों के घर का काम करती थी। डॉ पाल गायों को चराने के लिए खेतों में ले जाते थे। धन के अभाव में विद्यालय में न जा पाने के कारण वे अक्सर गांव के प्राथमिक विद्यालय की कक्षा की खिड़की के बाहर से अंदर झांकते थे और छात्रों को पढ़ते हुए देखते थे। एक दिन, इंस्पेक्टर की यात्रा पर, जब लड़के सवालों के जवाब देने में असफल रहे, तो खिड़की के बाहर से ग्वाले ने उत्साह से उत्तर दिया, "मुझे सभी उत्तर पता हैं"। उन्हें भीतर बुलाया गया और उन्होंने सभी उत्तर सही दिए। आश्चार्यचकित निरीक्षक ने तुरंत उनकी औपचारिक शिक्षा का निर्देश दिया और छात्रवृत्ति की आज्ञा दी। इस प्रकार डॉ पाल की शैक्षिक यात्रा शुरू हुई।


परिवर्तनशील समय में संसार व समाज की जीवनशैली व आकांक्षाएं बदल गई हैं। आज समाज उन्हें अपना आदर्श बनाना चाहता है जिन्होंने आधुनिक समय में उपलब्धियां प्राप्त की हैं व प्रसिद्धि पाई है। संभवत: यही कारण है कि चाहें क्रिकेट कुछ ही देशों द्वारा खेला जाता है (अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के १२ [12] पूर्ण सदस्य और ९४ [94] सहयोगी सदस्य), फिर भी युवा भारतीय किसी अन्य खेल की अपेक्षा क्रिकेट से अधिक जुड़ते हैं चूंकि वर्तमान समय में इसी खेल में भारत की सबसे अधिक उपलब्धियां हैं।


अपने धन व चकाचौंध के कारण भारतीय सिनेमा व दूरदर्शन (टी. वी.) भी युवा समाज को बहुत आकर्षित करता है। मनोरंजन उद्योग में कुछ गिने-चुने लोगों ने अपने कार्यों से किन्हीं शिखरों को पाया होगा परन्तु समाज में मनोरंजन और "टाइम पास" से अधिक इसकी उपलब्धि नहीं हो सकती।


भारत में क्रिकेट व सिनेमा के प्रति असाधारण उन्माद होने के पश्चात भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोनों क्षेत्रों में उपलब्धियां कम हैं। भारत वर्ष २००७ [2007] के पश्चात मात्र एक बार ही ‘टी-२० विश्व चैंपियन’ रहा है (हर 2 साल में विश्व चैंपियनशिप) और १९७५ [1975] के बाद से केवल दो बार एक-दिवसीय चैंपियन (हर ४ [4] साल में एक-दिवसीय विश्व चैंपियनशिप)। किसी भी भारतीय फिल्म को अभी भी ऑस्कर, कान्स (फ्रांस) जैसे अंतरराष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोहों में "सर्वश्रेष्ठ फिल्म" का पुरस्कार मिलना है।


पिछले लगभग एक दशक से कुछ अधिक समय से हम पाते हैं कि क्रिकेट व मनोरंजन उद्योग में अपना भविष्य देखने वालों का समर्पण, त्याग और संघर्ष धन और लोकप्रियता के लिए है। यदि ऐसा नहीं होता तो ये उद्यमी अपनी उपलब्धियों से कई लोगों के लिए प्रेरणा बन जाते। धन और उसकी चकाचौंध ने लोगों को अंधा कर दिया है और खेल-भावना व कला को तो जैसे छीन ही लिया है। आकांक्षी धन व लोकप्रियता चाहते हैं न कि अपने क्षेत्र में उपलब्धियां व कीर्तिमान। आज क्रिकेट व मनोरंजन जगत दोनों ही समाज में "टाइम पास" का विषय बन गए हैं और समाज भी इनके किसी रचनात्मक योगदान के अभाव में "टाइम पास" के उद्देश्य से इनके साथ व्यस्त है। क्या ऐसा वातावरण हमारी वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को उत्कृष्टता और विश्व मंच पर प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रेरित कर सकता है?


समाज में उत्कृष्ट उपलब्धियां पाने वालों का प्रोत्साहन व सम्मान करना सरकार और समाज का सामूहिक दायित्व है। नवंबर-२०२१ [2021] में राष्ट्रपति भवन में ‘पद्म श्री’ पुरस्कार वितरण समारोह और तत्पश्चात ‘सोशल मीडिया’ पर उनका प्रसार इसका उदाहरण था। अब यह समाज पर निर्भर करता है कि वह इन विभूतियों से प्रेरणा लेता है अथवा एक कलाकार की प्रतिभा की सराहना करने के पश्चात उसे भूल जाता है।

हम न भूलें कि

  • डॉ पाल के निर्णय के तर्क एक महान न्यायविद के थे जिसने वास्तव में न्याय के लिए पैरवी की थी।

  • न्याय के लिए डॉ पाल ने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। वे अंतर्राष्ट्रीय दबाव (विशेषकर अमेरिका) के आगे, जबकि हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने के पश्चात विश्व में अमेरिका का भय व्याप्त था, नही झुके।

  • निर्धनता प्रतिभावान के लिए बाधा नही है।

  • सफलता उचित परिश्रम करने के पश्चात ही प्राप्त होती है।

  • विपरीत परिस्थितियों में भी जो साहस व उद्देश्य को नहीं छोड़ता, वह अवश्य सफल होता है।


Shri Radhabinod Pal

ऊपर

India is an ancient country with a long history. India today is known in the world for its contribution and achievements in various fields. Many people have contributed to the culture and pride of India. These individuals not only inspired the society but also became role models for it. We take inspirations by remembering and celebrating their birthday or death anniversary.

Today on 10th January, we commemorate Shri Radhabinod Pal on his death anniversary (27.01.1886 - 10.01.1967) not only as an academician, Judge of Calcutta High Court (1941-43), Vice-Chancellor of University of Calcutta (1944-46), Judge of the International Court of Justice in ‘The Hague’ (1957) and as President of the International Law Commission (1958–1962), but mainly for his judgement he gave as a judge of the International Military Tribunal for the Far-East (1946–1948).


Japan surrendered after World War II. The Allied Powers decided to prosecute the Japanese leaders and generals, who according to them were responsible for Japan's involvement in the Pacific War as well as militarization of Japan in the 1930s and 1940s. The Supreme Commander of the Allied Powers, General Douglas MacArthur, established the International Military Tribunal for the Far East. In November 1948, this tribunal unanimously (one dissent) sentenced Japan's top eight leaders to their death penalty and 17 to imprisonment. Of all the judges of the Tribunal (11 in total and 3 from Asia), Dr. Radhabinod Pal was the only person according to whom the defendants were not guilty. The main reasons of his disagreement were:

  • Can those who instigated Japan and fought against it, have a moral and legal right to establish a tribunal of their choice and to put their defeated enemy on trial, on their own terms?

  • Japan had no role in the formation of the War Crimes Tribunal.

  • The legitimacy of the tribunal is questionable, as the spirit of vengeance was the underlying criterion for passing the judgment and not impartial justice.

  • The Tribunal cannot enforce Category 'A' offenses (against peace and humanity) with retrospective effect. When Japan went to war, no such offenses were listed under international law.

  • Excluding the use of the atomic bomb by the United States from the list of war crimes.

  • Exclusion of judges of defeated nations.

Commander General Douglas MacArthur did not allow Dr. Pal’s decision to be made public at that time. After learning about Dr. Radhabinod's decision, the Prime Minister of independent India, Nehru immediately distanced himself from Dr. Pal, saying that Dr. Pal was an appointee of the colonial government. Mr. Nehru suspected that America and other countries may misunderstand that the Indian government had inspired Dr. Pal's decision.


In 1952 Japan signed the ‘San Francisco Peace Treaty’ and accepted all litigation decisions. Thereafter America ended its occupation of Japan and lifted all sanctions against it. The decision of Dr. Pal was then made public. In 1958, Dr. Pal was elected to the United Nations ‘International Commission for Justice’, after which the Government of India honored him with the "Padma Vibhushan" in 1959.

On 14th December 2006, Indian Prime Minister Manmohan Singh emphasized on Dr Pal's "Principle decision" in strengthening India-Japan friendship. Japanese Prime Minister Abe then told the Parliament of India, "Justice Pal is still highly respected by many Japanese people for the great sense of courage he displayed". In Japan, special monuments have been erected in memory of Justice Radhabinod at Yasukuni Shrine and Ryozen Gokoku Shrine in Kyoto.


The beginning of Dr. Pal's education is very interesting. He was born in a poor family. His father died young and his mother used to work as domestic help for subsistence. Dr. Pal used to take the cows to the fields. He could not attend school as he was unable to pay tuition fees. He often peeped into the classroom through window of the village primary school. One day, during the inspector's visit, when the class failed to answer the questions, the cowherd from outside the window enthusiastically called out, "I know all the answers". He was called in and he answered all the questionscorrectly. The astonished inspector immediately instructed his formal education and granted a scholarship. Thus began the educational journey of Dr. Pal.


In the changing times, the lifestyle and aspirations of the world and society have changed. Today the society consider those who have achieved something and become famous, as their role models. Maybe this is the reason why young Indians are more inclined towards cricket than any other sport, even though cricket is played only by a few countries (12 full members and 94 associate members of the International Cricket Council). As in the present times this is the only sport with highest achievements for India.


The youth is attracted to Indian cinema and TV due to the money and glamour. A few people in the entertainment industry may have reached some pinnacles through their work. Today other than entertainment and "time pass" the industry has not contributed much to the society.


Despite the extraordinary craze for cricket and cinema in India, the achievements in both the fields at the international level are few. India has been only once the 'T20 World Champion' since 2007 (world championships every 2 years) and only twice the ‘ODI-Champion’ since 1975 (One-day World Championships is held every 4 year). Any Indian film is yet to receive the "Best Film" award at any international film award ceremonies like Oscars, Cannes (France).


Since a little over a decade we observe that the dedication and struggle of those who see their future in the cricket and entertainment industry is basically for money and popularity. Otherwise, these aspirants would have become an inspiration to many with their achievements. Money and its glare have blinded people and taken away the art and sportsmanship. Aspirants want wealth and popularity and do not strive for achievements and sustainability in their field. Today both cricket and entertainment industry have become the subject of "time pass" in the society in the absence of any constructive contribution from them. Can such an environment inspire our present and future generations to excel and be a representative on the world stage?


It is the collective responsibility of the government and the society to encourage and respect those who have excelled and achieved in the society. An example of this was the 'Padma Shri' award distribution ceremony at Rashtrapati Bhavan in November-2021 and later how it was made viral on 'social media'. It is now up to the society whether it takes inspiration from these personalities or forget them after appreciating their talent as an artist.


Let us not forget that

  • The strong words and arguments of Dr Pal's decision convinced people that he was a great jurist who stood for the cause of justice.

  • Dr. Pal did not bow down to international pressure (especially the US) though the world feared America after the atomic bombings of Hiroshima and Nagasaki but stood firm with truth.

  • Poverty is not a hindrance for the talented.

  • Success comes only after hard work.

  • One who does not give up courage and purpose even in adversity, surely succeeds.

Article Begin

Recent Posts

See All

शहीद दिवस / Shaheed Diwas To read article in english please click here राष्ट्र सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं, जानते थे वे तिरंगे से बढ़कर कोई कफन नहीं, यह मानते थे वे २३ मार्च १९३१ [23.03.1931] को लाहौर क

श्री शंभुनाथ डे / Shri Shambhunath De To read article in english please click here क्या आपने कभी 'काली मौत' के संबंध में सुना है ? यदि नहीं तो 'प्लेग महामारी' से हुई करोड़ों मृत्यु को बताने के लिए इन श

रामराज्य / Ram-Rajay To read article in english please click here मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम हमारे आदर्श हैं और उनके राज्य-काल को हम सामान्यतः 'रामराज्य' कहते हैं। वर्णनों के अनुसार वह समय सुख-समृद्ध