हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (15)

प्रार्थना व सुख / Prayer and Happiness

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आप जहाँ कहीं भी देखते हैं आपको लगता है कि हर ओर धन-संपदा के लिए लोग संघर्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि धन-प्राप्ति से वे जीवन में सब कुछ पा लेंगे और अपने जीवन के कष्टों को दूर कर सकेंगे। परन्तु धन-संपदा मिल जाने पर भी, न कष्ट दूर होते हैं और न ही अधिक धन-संपदा की इच्छा शांत होती है। मन की यह अशांति तन के व मानसिक रोगों को जन्म देने लगती है। इन रोगों के निवारण के लिए मनुष्य चिकित्सकों के पास जाता है और मन की अशांति दूर करने के लिए धार्मिक-संस्थानों, धार्मिक-गुरुओं, ज्योतिषियों , तांत्रिक आदि के पास भी कभी उपाय ढूंढता है। वह अपने वर्तमान के कष्टों के निवारण के लिए, इन कष्टों के मूल कारणों को जानने के लिए अपने जीवन का अवलोकन नहीं करता। वह यह निरंतर मानता रहता है कि धन से वह अपने सभी दुःख दूर कर सकता है।


यह सत्य है कि जीवन-निर्वाह के लिए धन की आवश्यकता होती है व प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आवश्यकतानुसार अवश्य ही धन अर्जन करना चाहिए परन्तु आवश्यकता से अधिक धन की कामना लोभ को जन्म देती है।


अति सर्वत्र वर्जयेत्।

अर्थ: अधिकता सभी जगह वर्जित होती है।


अपने लोभ को सही ठहराने के लिए लोग तर्क खोजने लगते हैं और अनावश्यक चीज़ों को भी आवश्यक बताने लगते है। मन की इच्छाओं की पूर्ति के लिए जन्मा लोभ बुद्धि को स्थिर नहीं रहने देता और मन के प्रभाव में बुद्धि विचलित हो जाती है।


लोभेन बुद्धिश्चलति लोभो जनयते तृषाम्।

तृषार्तो दुःखमाप्नोति परत्रेह च मानवः॥ (हितोपदेश, मित्रलाभ, १३४)


अर्थ: लोभ से बुद्धि विचलित हो जाती है, लोभ सरलता से न बुझने वाली तृष्णा को जन्म देता है । जो तृष्णा से ग्रस्त होता है वह दुःख का भागीदार बनता है, इस लोक में और परलोक में भी।


हितोपदेश भारतीय कथाओं का पंचतंत्र के बाद दूसरा प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसकी रचना पंचतंत्र शैली पर ही की गयी है। इसके रचनाकार का नाम नारायण मिलता है। हितोपदेश के चार भाग हैं – मित्रलाभ, मित्रभेद, विग्रह तथा संधि। इसका मुख्य उद्देश्य बालकों को लोक कथाओं के माध्यम से नीति की शिक्षा प्रदान करना था। इसमें ६७९ [679]नीति-संबंधी श्लोक हैं, जो महाभारत, धर्मशास्त्र, पुराण, चाणक्य-नीति आदि से संग्रहीत किये गये हैं। हितोपदेश को संस्कृत शिक्षण का पहला ग्रंथ माना जाता है।


यह लोभ ही तो है जो बुद्धि के हर लिए जाने पर किसी व्यक्ति को ठगी करने वाले के द्वारा किए जा रहे दावे पर विश्वास करने को बाध्य कर देता है। व्यक्ति गंभीरता से विचार नहीं करता और वस्तुस्थिति की पर्याप्त जानकारी प्राप्त किए बिना ही झांसे में आ जाता है।


लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते।

लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम्॥ (हितोपदेश, मित्रलाभ, २७)


अर्थ: लोभ से क्रोध का भाव उपजता है, लोभ से कामना या इच्छा जागृत होती है, लोभ से ही व्यक्ति मोहित हो जाता है, यानी विवेक खो बैठता है, और वही व्यक्ति के नाश का कारण बनता है । वस्तुतः लोभ समस्त पाप का कारण है।


लोभमूलानि पापानि संकटानि तथैव च।

लोभात्प्रवर्तते वैरं अतिलोभात्विनश्यति॥ (गरुढ़ पुराण)


अर्थ: लोभ पाप और सभी संकटों का मूल कारण है, लोभ शत्रुता में वृद्धि करता है, अधिक लोभ करने वाला विनाश को प्राप्त होता है।


श्रीमद भगवत गीता के प्रथम अध्याय में भी अर्जुन लोभ से पथभ्रष्ट हुए लोगों के संबंध में कहता है:


यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस:

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम || गीता, १. ३८ ||


अर्थ: यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक लुप्त हो चुका है ऐसे ये कुल का नाश करने से होने वाले दुष्परिणामों को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते।


आज धर्म के नाम पर बहुत कुछ किया जाता है और लोग अपने धार्मिक होने का दावा भी करते है व अपनी धार्मिकता दिखाने की होड़ में भी लग जाते है। प्रभु का जप करना व प्रभु से प्रार्थना करना इनमें विशेष हैं। नाम जपने से या उसका नाम कानों मे पड जाने से लाभ होगा, दुख दूर होंगे, ऐसा कह दिया जाता है पर कैसा लाभ होगा और कब होगा यह कोई नहीं बताता। नाम जपने से मन एकाग्र होता है यह भी मात्र एक कथन ही है क्योंकि हम सभी कितने ही लोगों को जानते है जो एक ही समय में जप भी कर रहे होते है व कोई अन्य कार्य भी। यह जप किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए नही होता अपितु "लाभ-प्राप्ति" के लिए होता है। इस विशेष संदर्भ में यह "लाभ" लोभ की ओर ही तो संकेत करता है।


यदि हम प्रभु का नाम जपने का सही से तात्पर्य समझना चाहते हैं तो हमे इसके गूढ़ रहस्य को समझना होगा। एक बीज है और यदि कहा जाए कि वह बीज बहुत से व्यक्तियों को छाया दे सकता है, पक्षियों को रहने के लिए ठिकाना दे सकता है, मकान बनाने के लिए लकडी दे सकता है, भोजन पकाने को ईधन दे सकता है, सजावट ईत्यादि के लिए भी पदार्थ दे सकता है तो क्या यह गल्त होगा? नही! एक बीज यह सब दे पाऐगा जब वह वृक्ष बन सके। बीज के रूप मे वह कुछ भी नही दे पाऐगा। इसी प्रकार भगवान का नाम जपने से ही कुछ प्राप्त नही होगा। कुछ पाने के लिए प्रभु नाम को बीज की भांति बोना होगा, सींचना होगा। बीज भी हर भूमि मे नही उपजता और उसी प्रकार जब तक मन पर पडे वासनाओं और विकारों के कंकड-पत्थर दूर नही हो जावेंगे, मन साफ नही होगा तब तक उसमे प्रभु नाम का बीज नही बोया जा सकेगा। प्रभु नाम को मन मे बोने के लिए भगवान के गुणों को अपने भीतर धारण करना होगा। इस प्रकार मन मे बोने के बाद जब यह भगवान नाम का वृक्ष बडा होगा (प्रभु के गुण आपके व्यवहार में दिखेंगे) तब यह आपको वे सब फल देगा जिनकी आपको तब इच्छा होगी। बिना बोए तो यह बस बीज की भांति है जो कुछ नही दे सकता।


प्रार्थना का अर्थ है किसी से कुछ माँगना अथवा निवेदन करना। प्रार्थना में आदर, प्रेम, आवेदन एवं विश्‍वास समाहित हैं, अत: प्रार्थना उसी से की जाती है जो सहायता करने में समर्थ हो। ईश्वर जैसा समर्थ ओर कोई नहीं, इसलिए प्रभु से प्रार्थना करना उचित है। चूँकि प्रार्थना एक निवेदन है, सहायता की माँग है, यह अपने पूर्ण पुरुषार्थ के बाद ही उचित है। प्रार्थना के आधार पर बिना पुरुषार्थ के परिणाम तो कर्म-फल के सिद्धांत को ही झुठला देगा। गंभीरता से सोचने पर हम पाऐंगे कि हम प्रभु से प्रार्थना नही करते अपितु प्रभु से इच्छा रखते हैं कि वह हमारी इच्छाओं को पूरा कर दे। हमारी ये प्रार्थनाएँ (मनोकामनाएँ) अधिकांशत: निजी स्वार्थ से भरी व अपनी क्षमता एवं सामर्थ्य अनुसार पूर्ण प्रयास के आभाव में प्रभु से की गई होती हैं। बिना प्रयास के परिणाम तो न्यायोचित नहीं होगा और यदि हम प्रभु को न्यायप्रिय मानते है तो वह हमारी ऐसी प्रार्थनाएँ (मनोकामनाएँ) कभी स्वीकार नहीं करेगा जिसलिए हम बहुत बार लोगों को यह कहते सुनते हैं कि मैं इतना भजन-कीर्तन, प्रभु-पाठ इत्यादि करता हूँ परन्तु प्रार्थना स्वीकार ही नहीं होती और मनोकामनाएँ पूरी नहीं होतीं।


यदि नाम जपने व प्रार्थना करने से ही सब संभव होता तो इन धार्मिक संस्थानों के पुजारी, मौलवी, पादरी आदि विश्व के सबसे सुखी व समृद्ध लोग होते।


हम न भूलें कि

  • संसार मे मनुष्य का सबसे बडा शत्रु स्वयं उसका मन हो जाता है जब वह उसे गल्त कार्यों के लिए प्रेरित करता है और यही मन यदि अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करे तो उसका सबसे अच्छा मित्र बन जाता है।

  • गल्त व सही का निर्णय अपनी भावनाओं को नहीं अपितु अपनी बुद्धि को करने दें।

  • यदि बुद्धि स्थिर होगी, विवेक जागृत होगा तभी बुद्धि सही आंकलन कर पाऐगी और तभी व्यक्ति उन इच्छाओं के लिए, उन लक्ष्य की पूर्ति के लिए कर्म करेगा जो उसे उन्नति की ओर ले जाऐंगे। (देखें: हम न भूलें-13)

  • वेद, उपनिषद व शास्त्र मनुष्य को कर्म एवं उद्यम के लिए प्रेरित करते है। रामायण, महाभारत में भी कहीं भजन-कीर्तन व उससे मनोरथ सिद्ध होने का उल्लेख नही है।

  • संस्कृत शब्द "प्रार्थना" का अर्थ अंग्रेजी के "प्रेयर" से व्यापक है। हिंदी के “प्रार्थना-पत्र” का "प्रेयर" से कोई संबंध नही।

  • ‘प्रभु-स्मरण’ एवं ‘प्रभु-स्तुति’, प्रभु से प्रार्थना से भिन्न हैं परन्तु अंग्रेजी में सभी के लिए "प्रेयर" शब्द का ही प्रयोग होता है।

  • पुरुषार्थ के बाद, प्रभु से की गई प्रार्थना आपको आंतरिक संबल प्रदान करेगी, आपके भीतर नए बल, उत्साह व आशा का सृजन करेगी।

Prayer and Happiness

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As you look around, you will find that people are in a race to collect wealth. They believe that through money they can get everything in life. Money will enable them to get rid of all their troubles and worries. Even after obtaining wealth, neither do their troubles go away nor does it pacify the desire for wealth. This disturbance in the mind creates physical and mental health problems. One visits doctors, religious-institutes, religious-gurus, astrologers, tantrik etc . to get remedy of problems and peace of mind. People do not introspect to find out the root causes of their sufferings to get rid of their current problems. A person continues to believe that he can get rid of all his sufferings with money.


It is true that money is needed for subsistence and every person must earn sufficient money according to his needs, but the desire for more money than necessary, gives birth to greed.


ati sarwatr varjyet

Meaning: Excess is forbidden everywhere.


People start looking for reasons to justify their greed. They try to prove even unnecessary things as a necessity. The greed born out of desires of the mind does not allow the intellect to remain stable and under such an influence of the mind, the intellect gets disturbed.


lobhen budhishrachalti lobho janyate trishām

trishārto dukhmāponnti partreh cha mānavah (Hitopdesh, Mitrlabh, 134)


Meaning: Greed distracts the intellect; greed gives rise to an insatiable craving. One who suffers from craving becomes a companion of sorrow, in this world and also in the hereafter.


Hitopadesh is the second most famous text of Indian tales after Panchatantr and is also composed in the same style as Panchatantr. Its creator is Narayan. There are four parts of Hitopadesh – Mitralabh, Mitrabhed, Vigrah and Sandhi. Its main objective was to provide education of ethics to the children through folk tales. It has 679 ethics-related verses, which have been collected from Mahabharat, Purans, Dharmashastr, Chanaky-niti, etc. Hitopadesh is considered to be the first scriptures of Sanskrit teaching.


It is this greed which when overrides the intelligence, compels a person to believe the claims made by the fraudster. The person is unable to think rationally and take control of the situation hence unfortunately falls into the trap.


lobhātkrodhah prabhavati lobhātkāmah prajāyate

lobhānmohaścha nāshaścha lobhah pāpasy kāranam (Hitopadesh, Mitralabh, 27)


Meaning: Greed gives rise to anger and desires. It is greed that takes control and person is carried away and loses intellect which becomes the cause of his destruction. In fact, greed is the cause of all sins.


lobh mulāni pāpāni sankatāni tathaiv cha

lobhātpravartate vairam atilobhātvinashyati (Garur Puran)


Meaning: Greed is the root cause of all sinful deeds and also of various types of dangers and difficulties. Greed also causes enmity between persons and excessive greed in a person surely results in his destruction.


Even in the first chapter of Shrimad Bhagavad Gita, Arjun says regarding those who have been misguided by greed:


yadypyete na pashyanti lobhophatchetasah

kulakshayakritam dosham mitradrohe cha pātakam || Gita, 1. 38 ||


Meaning:Because they have no conscience any more which has been lost due to greed, they do not see the ill-effects of destroying the clan and the sin caused by envying their friends.


Today a lot is done in the name of religion. People claim to be religious and compete to show their religiosity. Chanting the God’s name and offering prayers are especially noticeable. It is commonly said that even hearing the name of God will bring benefits and free one from sorrows. No one tells about the benefits and time when the person will get them. “The mind can be controlled and it concentrates by chanting Lord’s name”, is also just a statement because we all know so many people who are busy doing different things while chanting. This chanting is not done for the fulfillment of any need, but for one’s "benefit and gain". In this particular context, this "benefit" relates to greed.


If we want to understand the true meaning of chanting the name of God, then we must understand its hidden, deep-lying meaning. If it is said that a seed can give shade to many people, a place to live for birds, wood for building houses, fuel to cook food, material for decoration, etc. will it be wrong? No! A seed can give all this only when it can become a tree. It will not be able to give any of these if it remains as a seed. Similarly, by mere chanting of the name of God, nothing will be achieved. To get something, the name of God must be sown like a seed, watered, nourished and protected. The seed cannot grow in each and every type of soil. Similarly, until the pebbles and stones of desires and greed are not removed from the mind, the mind will not be clean and the seed of the name of God cannot be sown in it. To sow the God's name in the mind, one has to imbibe the qualities of God within oneself. In this way, after planting God’s name in the mind, when this will grow into a tree (qualities of God will be visible in your behavior), then it will give you all the fruits that you may desire.


‘Prarthana’ means asking or requesting something from someone. ‘Prarthana’ incorporates respect, love, application and faith, hence the ‘Prarthna’ is done to those who are able to help. There is no one more powerful than God, hence it is appropriate to pray to God. Since ‘Prarthana’ is a request, it is appropriate only after one has made full efforts to achieve the thing one is requesting for. Any result, without putting in any effort, just based on prayer, will put a big question mark on the ‘Karm-Phal’ (Action-Result) philosophy. If we will look closely we find that mostly we do not pray to God rather make wishes to be fulfilled by him. These prayers (desires) are mostly entirely of personal interests without putting in full effort according to one’s capacity and capability. In the absence of which the result will not be justified. If we believe God to be impartial, then he will never accept such prayers (wishes). That is the reason we often hear people saying that they do so much Bhajan-Kirtan, chanting, praying etc. but their prayer is not accepted, and wishes are not fulfilled.


If everything would be possible just by chanting and praying, then the priests, clerics, pastors of the religious institutions would be the happiest and richest people in the world.


Let us not forget that

  • The mind becomes a person's biggest enemy when it inspires him to do wrong deeds and the same mind will be his best friend by motivating him for good deeds.

  • Do not let your emotions decide what is wrong or right, but your intellect.

  • If the intellect is stable, the conscience will be awakened, and then only the intellect will be able to make the right assessment. Only then the person will work for the fulfillment of those desires and those goals which will lead him towards progress. (see: Hum Naa Bhooleen-13)

  • Veds, Upanishads and Shaastrs inspire a person for deeds and enterprise. There is no mention of Bhajan-Kirtan and fulfillment of desire from it in Ramayan, Mahabharat also.

  • The meaning of the Sanskrit word "Prarthana" is broader than the English "prayer". The hindi word “prarthna-patr” has nothing to do with "Prayer".

  • ‘Remembering and praising God’ are different from praying to God, but the English word "prayer" is used in all context.

  • Praying to God after making an effort will give you inner strength, create enthusiasm and hope within you.

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