हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (03)

नालंदा का विध्वंस व इस्लाम का विस्तार / Nalanda’s destruction & rise of Islam


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बिहार के पटना से ९५ [95] कि. मी. दक्षिण-पूर्व में और बिहारशरीफ शहर के दक्षिण में स्थित नालंदा पांचवीं शताब्दी से लेकर सन ११९३ [1193] तक इस संसार के महानतम शिक्षा संस्थानों में एक था।


दुर्भाग्यवश नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास हमें आज विदेशियों के विवरणों से मिलता है। अंग्रेजों से भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात भी भारतीय इतिहासकारों ने यह प्रयास नहीं किया की समाज में जो गाथाएँ, कहानियाँ प्रचलित हैं उनकी वास्तविकता को तथ्यों के आधार पर प्रमाणित किया जावे अपितु उन्होंने तो मुस्लिम व पश्चिमी इतिहासकारों के अभिलेखों की पुष्टि करना उचित समझा। बहुत संभावना है कि मुस्लिम शासकों ने और यूरोपियों ने घटनाओं को अपने अनुरूप लिखा होगा जिस कारण संभवत: हमें सही इतिहास का ज्ञान नहीं हो। (यह विषय एक अन्य लेख में)


मुस्लिम व यूरोपिय दोनों ही भारत को लूटने आए थे और दोनों के लिए अपने तथाकथित धर्म का विस्तार महत्त्वपूर्ण था। अपनी इस उद्देश्य-पूर्ति के लिए भारतीय संस्कृति या दूसरे शब्दों में हिन्दू संस्कृति का दमन, उसका विनाश इनकी उद्देश्य-पूर्ति का एक अंग था और जो इन्होंने किया भी। जिसके परिणाम स्वरूप आज हमारे पास लोक-गीतों के रूप में पुरानी गाथाएँ, खंडरों के रूप में अवशेष और अपने पूर्वजों से सुनी कहानियाँ रह गई हैं और दुर्भाग्यवश समय के साथ-साथ ये तीनों भी नष्ट हो रहें है।


हमारी संस्कृति, हमारे गौरव को पहले मुस्लमानों ने फिर यूरोपियों ने कुचला, नष्ट करने का प्रयास किया और विफल होने पर भारतीय संस्कृति को तुच्छ दिखाने हेतु भ्रांतियाँ फैलाईं। आज हम इसके संरक्षण, इसकी उन्नति की ओर ध्यान नहीं दे रहे। यदि हम ऐसे ही उदासीन रहे तो हमारा गौरवपूर्ण इतिहास मुसलमानों अथवा पश्चिम द्वारा नहीं अपितु हमारे द्वारा ही हमारी उदासीनता के कारण मारा जावेगा। (ऐसा न होवे इसके लिए मै एक साधारण नागरिक क्या कर सकता हूँ, यह एक अलग लेख में )


हूणों ने सन ४५० [450] में तक्षशिला विश्वविद्यालय का विध्वंस कर दिया। शिक्षा के इस महान केंद्र के नष्ट होते ही गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७० [450 - 470] ने नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की। इस प्राचीन विश्वविद्यालय की वैभवता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है की यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। अपने पूर्ण होने पर यहाँ १०,००० [10,000] छात्रों को पढ़ाने के लिए २,००० [2,000] शिक्षक थे। नौवीं शताब्दी से अपने नष्ट होने तक इसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थी। यहाँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं अपितु कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी आते थे। छात्रों को किसी प्रकार की आर्थिक चिंता न थी। उनके लिए शिक्षा, भोजन, वस्त्र औषधि और उपचार सभी निःशुल्क थे। राज्य की ओर से विश्वविद्यालय को दो सौ गाँव दान में मिले थे, जिनसे प्राप्त आय और अनाज से विश्वविद्यालय का खर्च चलता था।

गुप्तवंश पारंपरिक रूप से एक हिंदू राजवंश था। उन्होंने अपने विचार, अपनी मान्यताओं को प्रजा पर कदाचित नहीं थोपा अपितु बौद्ध और जैन मत को भी प्रोत्साहित किया। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक तो बाहर जाकर बौद्ध मत का प्रचार करते थे। कुछ गुप्तवंशी शासकों ने तो विशेष रूप से बौद्ध मत का पक्ष लिया और स्वयं बौद्ध हो गए।

राजा स्कंदगुप्त (देखें: हम न भूलें -01) की मृत्यु के पश्चात पुरुगुप्त राजा बना पर वह एक कमजोर शासक था। पश्चिमी सीमाओं पर आक्रांताओं के आक्रमण बढ रहे थे और साम्राज्य के पूर्व सामंतों के सर उठाने के कारण गुप्त साम्राज्य शिथिल हो रहा था। आक्रमणों में बौद्ध-मठों का विनाश तथा हिन्दुओं और बौद्ध-भिक्षुओं के आपसी झगडे बढ़ रहे थे। ६ [6] वीं शताब्दी के मध्य में गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद, उत्तर भारत कई स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया। बौद्ध मत के संरक्षक अब इतने शक्तिशाली नहीं थे।


नालंदा को तीन बार नष्ट किया गया, परन्तु केवल दो बार ही इसका पुनर्निर्माण हुआ। सबसे पहला आक्रमण हूण राजा मिहिरकुल ने ६ वीं शताब्दी में किया था। (हूण सम्राट तोरमाण व उसका पुत्र मिहिरकुल भारतीय इतिहास में अपनी खूँखार और ध्वंसात्मक प्रवृत्ति के लिये प्रसिद्ध हैं। हूण पंजाब, मथुरा के नगरों को लूटते हुए, ग्वालियर होते हुए मध्य भारत तक पहुँचे थे और उनका आधिपत्य मालवा तक छा गया था।)


७ [7] वीं शताब्दी के प्रारंभ में शशांक गौड़ (गौड़ राजपूत स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के छोटे भाई भरत के वंशज मानते है) जिसकी सम्पूर्ण भारतवर्ष पर शासन करने की तीव्र महत्वकांक्षा थी, के कारण विश्वविद्यालय को पुन: क्षति हुई। समकालीन राजा हर्षवर्धन (हर्ष ) ने न केवल विश्वविद्यालय के भवनों व पाठशालाओं का पुनर्निमाण किया अपितु भिक्षुओं के लिए आपूर्ति भी सुनिश्चित की। कन्नौज के सम्राट हर्षवर्धन को बौद्ध मत का अंतिम उल्लेखनीय संरक्षक माना जा सकता है। हर्ष ने बौद्ध मत स्वीकार किया और स्वयं को नालंदा के भिक्षुओं का सेवक माना। नालंदा विश्वविद्यालय अब धीरे-धीरे नालन्दा महाविहार, एक बौद्ध मठ बन रहा था। (भारतीय राज्य बिहार का नाम विहार से अपभ्रंश है)


११९९ [1199] में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी (पूरा नाम: इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी) ने इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया। बख्तियार खिलजी, दिल्ली के गुलाम वंश के शासक कुतुबुद्दीन एबक का एक सैन्य सिपहसालार था। इसने बंगाल और बिहार के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और वहाँ का शासक बना। उसका शासन ही बंगाल में इस्लाम की स्थापना व प्रसार का कारण बना।


फारसी इतिहासकार मिनहाज-ए-सिराज जुजानी ने इस्लामी दुनिया का एक विस्तृत इतिहास (२३ [23] खंड) सन १२६० [1260] में तबक़त-ए-नसीरी के रूप में संग्रहित किया है। खिलजी के गौरव में वह लिखता है कि मात्र १८ [18] घुड़सवारों के सिर पर ही बंगाल पर खिलजी की विजय पूर्व निर्धारित थी।


इस्लाम के विस्तार के लिए प्रारंभिक इस्लामी युद्ध तो मुसलमानों के पैगंबर मुहम्मद के समय से ही शुरू हो गए थे। इस्लाम के विस्तार के लिए मुसलमानों का एक सिद्धांत था कि कोई भी पुस्तक जो उनकी धार्मिक पुस्तक कुरान के विरुद्ध है, वह जायज़ (सही) नहीं है और कोई भी पुस्तक जो कुरान के समर्थन में है, उसकी कुरान के होते कोई आवश्यकता नहीं है। मुस्लिम शासकों ने कभी भी हिंदू और बौद्ध धर्म के गौरव को सहन नहीं किया जिस कारण उन्होंने मंदिरों, मठों व शैक्षिक-संस्थानों का विध्वंस किया।


हम न भूलें कि


  • खिलजी ने हजारों निर्दोष भिक्षुओं और आचार्यों की निर्दयतापूर्वक हत्या की। इस्लाम को जबरन स्थापित करने के लिए और हिंदू व बौद्ध संस्कृतियों को उखाड़ फेंकने के लिए कई गुरुओं को जिंदा जला दिया।

  • नालंदा के विशाल पुस्तकालय का विनाश एक भयावह प्रकरण था जिसमें विद्वानों द्वारा लिखित व सात शताब्दियों के समयकाल में संग्रहित ९० [90] लाख से अधिक अमूल्य लिपियों को नष्ट कर दिया गया।

  • केवल पुस्तकें ही जल कर नष्ट नहीं हुई अपितु उनके साथ अपार ज्ञान नष्ट हो गया जिसका अनुमान हमें नहीं है।

  • दिल्ली के महरौली में अशोक का लौह स्तंभ है और मध्य प्रदेश के धार नगर में एक विध्वंसित लोहे का स्तम्भ (कुल भर ७३०० [7300] किलो) जिनमें लोहे की मात्रा लगभग ९८% [98%] है और उन्हे अभी तक जंग नहीं लगा है। धातुकर्म का यह ज्ञान ही नहीं अपितु भवन-निर्माण, वास्तुकला, आदि का ज्ञान भी आक्रांताओं ने नष्ट कर दिया है।

  • इस विश्वविद्यालय में ज्ञान का स्तर बहुत ऊँचा था। यहाँ प्रवेश-परीक्षा अत्यंत कठिन थी और प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। शिक्षक-छात्र का अनुपात भी अधिकतम १:६ [1:6] का रहा जो आज भी विश्व में कहीं देखने को नहीं मिलता।

  • हूणों की बर्बरता ने उत्तरी भारत के शासकों में एकजुट होने की प्रेरणा दी और राजा यशोधर्मन के नेतृत्व में इन शासकों ने मिहिरकुल को हराया। (एक बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए एकजुट होने में और उसके लिए अपने निजी स्वार्थों को, मतभेदों को भूलने में ही भलाई है)

  • अपनी उद्देश्यपूर्ति के लिए आक्रांताओं ने विफल होने के बाद भी प्रयास करना नहीं छोड़ा और आज भी कर रहे हैं।

  • हिंदू राजा विभाजित होने से इतने कमजोर थे कि फारसी इतिहासकार ने मात्र १८ योद्धाओं के बल पर निश्चित विजय का उल्लेख किया।

  • बौद्ध मत का विस्तार तब तक हुआ जब तक उसके संरक्षक शक्तिशाली थे। महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ मनुष्यों को कष्ट, पीड़ा, दुःख से मुक्त करने के उद्देश्य से हैं और पंचशील के पाँच सिद्धांतों में एक के अनुसार किसी बौद्ध के लिए किसी भी जीव का जीवन लेना वर्जित है। अहिंसा के सिद्धांत के कारण युद्ध मना था। आक्रमण होने पर आत्मरक्षा के विचार को बाद में स्वीकार किया गया।

  • शक्तिशाली, सामर्थ्यवान ही अपनी संस्कृति, अपने गौरव की रक्षा कर सकता है। धर्मो रक्षति रक्षित: (अन्य लेख में)


Nalanda’s destruction & rise of Islam

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Nalanda, located 95 km southeast of Patna and south of the city Biharsharif, in the Indian state of Bihar was from the 5th century until the year 1193 one of the greatest educational institutions in the world.


Unfortunately, the history of Nalanda University is available today from the annals of foreigners. Even after India became independent from the British empire, Indian historians did not try to prove the narrations prevailing in the society by providing facts about them, rather quoted and verified the records and documentations of the Muslim and the western historians. It is very likely that the Muslims and the western historians may have written the incidents according to their suitability due to which we probably may not have the right knowledge of history. (in another article)


Both Muslims and Europeans came to plunder India and propagation of their religion was important for them. Suppression of Indian culture (Hindu culture) and its destruction was one of their priorities to achieve their goal and they did so. As a result, today we are left with folklores in the form of folk songs, relics in the form of ruins and stories heard from our ancestors, highlighting the ancient glory of India. Unfortunately over the time these three are also gradually vanishing.


Our culture and pride were first trampled upon by the Muslims, and later the Europeans tried to destroy it. On being unsuccessful, they manipulated it to portray it inferior to their culture. Today we are not paying attention towards its protection and progress. If we remain indifferent like this, then our glorious history will get destroyed, this time not by the Muslims or the West, but by our own apathy towards it. (What can I do as an ordinary citizen to avoid this? This in a separate article)


In the year 450, the Huns demolished Taxila University, the great center of education. After its destruction, the Gupta ruler Kumargupta I (450 - 470), established the Nalanda University. The grandeur of this ancient university can be understood from the fact that it was the world’s first fully residential university. Upon its completion, there were 2,000 teachers to teach 10,000 students. It enjoyed international prominence from the ninth century until its destruction. Students from not only different regions of India but also from Korea, Japan, China, Tibet, Indonesia, Persia and Turkey came here. Education, food, clothes, medicines and treatment were provided free of cost to the students. The state donated 200 villages to the university to meet all their expenses.


The Gupta dynasty was traditionally a Hindu dynasty. During their reign they did not impose their views and beliefs on the people but also encouraged Buddhism and Jainism. The distinguished scholars of Nalanda even went out to preach Buddhism. Some Gupta rulers particularly favored Buddhism and became Buddhists themselves.


Purugupta became king after the death of King Skandagupta (see: Hum Naa Bhooleen-01) but he was a weak ruler. The invasions by the invaders on the western frontiers were increasing and the Gupta empire was also weakening due to the uprising of the former feudatories. The invasions led not only to the destruction of Buddhist monasteries but also increased the conflicts between Hindus and Buddhists. After the fall of the Gupta Empire in the middle of the 6th century, Northern India was divided into several independent states. The patrons of Buddhism were no longer powerful enough.


Nalanda was destroyed three times, but rebuilt only twice. The first invasion was made by the Hun king Mihirkul in the 6th century. (The Hun emperor Toraman and his son Mihirkul are famous for their ferocious and subversive tendency in Indian history. The Huns plundered the cities of Punjab, Mathura and reached central India via Gwalior and dominated the Malwa region.)

In the early 7th century, the university was again damaged by Shashank Gaud (Gaud [in English: Gaur] Rajputs consider themselves descendants of Maryada Purushottam Shri Ram's younger brother Bharat), who had a strong ambition to rule over entire India. Contemporary king Harshavardhana (Harsha) not only rebuilt the university buildings and schools but also ensured the supplies for the monks. Harshavardhana, the emperor of Kannauj, can be considered as the last notable patron of Buddhism. Harsha accepted Buddhism and considered himself a servant of the monks of Nalanda. Nalanda University was now slowly becoming Nalanda Mahavihar, a Buddhist monastery. (The name ‘Bihar’ of the Indian state is derived from Vihar)


In 1199 the Turk invader Bakhtiyar Khilji (full name: Ikhtiyaruddin Muhammad bin Bakhtiyar Khilji) burnt Nalanda Mahavihar and destroyed it completely. Bakhtiar Khilji was a military warlord of Qutubuddin Aibak, the ruler of Delhi's slave dynasty. He conquered the territories of Bengal and Bihar and became the ruler there. His rule is responsible for the spread of Islam in Bengal.


The Persian historian Minhaj-e-Siraj Jujani has written a detailed history of the Islamic world (23 volumes) and compiled it as Tabqat-e-Nasiri in the year 1260. In Khilji's honour, he writes that Khilji's conquest of Bengal with just 18 horsemen was predestined.


The early Islamic conquest for the spread of Islam had already begun during the time of the Prophet Muhammad. For the spread of Islam, Muslims had a theory that any book against their religious book Quran is not justified and any book that is in support of Quran is not needed as Quran already exists. The Muslim rulers never tolerated the glory of Hinduism and Buddhism due to which they destroyed temples, monasteries and educational institutions.


Let's not forget that


  • Khilji mercilessly slautered thousands of innocent monks and acharyas. Many gurus were burnt alive to forcibly establish Islam and overthrow Hindu & Buddhist cultures.

  • The most frightening episode was the destruction of the huge library of Nalanda which had over 9 million invaluable collections of scripts collected over 7 centuries.

  • Not only books were burned, but immense knowledge was destroyed, which we cannot even imagine.

  • Ashok’s iron pillar in Mehrauli, Delhi and a demolished iron pillar (7,300 kg) in Dhar Nagar, Madhya Pradesh (98% iron) have not rusted till date. Not only this knowledge of metallurgy, but also the knowledge of various subjects, architecture, etc. has been destroyed by the invaders.

  • The level of knowledge at this university was very high. The entrance examination was very difficult and only talented students could get admission. The highest teacher-student ratio was 1:6, which is not seen anywhere in the world even today.

  • The barbarity of the Huns united the rulers of northern India. Under the leadership of King Yashodharman these rulers defeated Mihirkul. (To serve a larger purpose, it is meaningful to unite, and to forget personal interests and differences)

  • Despite failures, the invaders did not stop and continue to persue their goals even today.

  • The divided Hindu kings were so weak that the Persian historian could write a definite victory for Khilji with a force of 18 horsemen only.

  • Buddhism expanded as long as its patrons were powerful. The teachings of Mahatma Buddha are aimed at freeing humans from suffering, agony and sorrow. According to one of the five principles of Panchsheel, it is forbidden for a Buddhist to take the life of any living being. War was forbidden due to the principle of non-violence. The idea of ​​self-defense during attack was accepted later.

  • Only the powerful and capable can protect their culture, and pride. Dharmo Rakshati Rakshita: (another article)


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