हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (09)

मुगल शाही / Mughal Empire

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बाबर, तैमूर व चंगेज खान का वंशज था और १३९८ [1398] में भारत पर आक्रमण करने वाले तैमूर के कारनामों से प्रेरित हो कर भारत विजय करने आया था। इतिहासकार मानते हैं कि मुगल साम्राज्य की स्थापना उसके द्वारा १५२६ [1526] में की गई थी हालांकि मुगल शाही का आरम्भ १६०० [1600] से, अकबर (बाबर का पोता) के शासन से माना जाता है। यह शाही संरचना अंतिम प्रमुख सम्राट, औरंगजेब की मृत्यु के कुछ समय बाद तक चली। १७२० [1720] के बाद मुगल शाही ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव में धीरे-धीरे कमज़ोर होती गई। १८५७ [1857] के भारतीय स्वतंत्रता समर के बाद अंग्रेजों ने मुगल शाही को औपचारिक रुप से भंग कर दिया।


बाबर का संक्षिप्त राज्य-काल का समय (मृत्यु १५३० [1530]) अफ़ग़ानों से व मेवाड़ के राणा साँगा के नेतृत्व में राजपूतों से युद्ध में बीत गया। उसके बेटे हुमायूँ का काल (शासनकाल: १५३०-५६ [1530-56]) भी बुंदेलखंड की हिंदू रियासत कालिंजर के उस पर आक्रमण से आरम्भ हुआ और १५३२ [1532] से ही वह निरंतर शेरशाह सूरी से युद्ध में उलझा रहा (कालिंजर से युद्ध में ही १५४५ [1545] में शेरशाह की मृत्यु हुई)। हुमायूँ का भाई हिंडाल भी युद्धों में उसकी सहायता नहीं कर रहा था। स्वयं को भारत में असुरक्षित अनुभव करते हुए हुमायूँ ने १५४३ [1543] में फारस (ईरान) में शरण ली (शेरशाह सूरी द्वारा स्थापित सूर साम्राज्य ने १५४०-१५५५ [1540-55] तक राज्य किया)। १५५५ [1555] में हुमायूँ ने शेरशाह पर विजय पाई और मुगल शासन का पुनरारंभ किया। अगले ही वर्ष दिल्ली में एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई जिसे एक पखवाड़े तक छुपाया गया ताकि उसके १३ [13] वर्षीय बेटे अकबर, जो उस समय पंजाब में था, को शांतिपूर्वक राजा घोषित किया जा सके। हुमायूँ के साढू बैरम खान को अकबर (शासनकाल: १५५६-१६०५ [1556-1605]) का संरक्षक बनाया गया जिसने पानीपत की दूसरी लड़ाई (१५५६) [1556] में सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य या हेमू (ये पहले आदिल शाह सूरी, जो एक अयोग्य राजा था और अपने कार्यों का भार हेमू पर डाले रहता था, के प्रधानमंत्री थे) को हराया। १५६० [1560] तक प्रशासन बैरम खान के हाथों में था जिसका उसने निरंतर विस्तार कर हिंदुस्तान में मुगल वंश को स्थापित किया।


मध्य एशिया में उस समय रूसी साम्राज्य, चीन के किंग राजवंश, और अन्य शक्तियों का विस्तार हो रहा था और वहाँ से भारत पर आक्रमण लगभग समाप्त हो गए थे। १५६४-७४ [1564-74] तक मुगलों के पुराने साथियों (उज़्बेक, मिर्ज़ा, कक्षाल (मुलत: तुर्क) व खैल) ने इस्लाम के नाम पर एकजुट हो धन-सम्पदा की इच्छा रखते हुए मिर्जा हाकिम (अकबर का सौतेला भाई) के नेतृत्त्व में अकबर के विरुद्ध हमला बोला जिसे अकबर ने बेरहमी से कुचल दिया।

राजपूतों की बाबर से युद्ध में बहुत क्षति हुई थी। सत्ता पाने के लिए उस समय अन्य मुस्लिम राजा, बहादुर शाह (गुजरात) व शेर शाह सूरी (दिल्ली) भी प्रयास कर रहे थे। तब आमेर (जयपुर के समीप) के राजा पूरणमल (१५२७-३४) [1527-34] ने मुगलों का साथ देना उचित समझा था। उनके छोटे भाई भरमल ५० [50] वर्ष की आयु में १५४८ [1548] में राजा बने और बड़े भाई की मुगलों के साथ आरम्भ की गई मैत्री को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने १५६२ [1562] में अपनी पुत्री (नाम: हीरा कुमारी या हरका बाई व हिन्दी सिनेमा द्वारा जोधा बाई के नाम से प्रसिद्ध) का विवाह अकबर से कर दिया। उस समय मान सिंह आमेर के राजा थे। आमेर की मुगलों से मित्रता को अन्य राजपूत घरानों ने स्वीकार नहीं किया। राणा उदय सिंह, उनके पुत्र राणा प्रताप, फिर उनके पुत्र राणा अमर सिंह के नेतृत्व में राजपूत मुगलों से लड़ते रहे। १५६९ [1569] में रणथंबोर की विजय के बाद लगभग पूरे राजस्थान पर अकबर का अधिपत्य स्थापित हो गया था। १५७३ [1573] में अकबर ने गुजरात पर विजय प्राप्त की और उसकी सीमाएँ समुद्र तक पहुँची जहाँ वह पुर्तगालियों के संपर्क में आया। विदेशों में जो कुछ हो रहा था, उसमें उसकी रुचि नहीं थी परन्तु अपने साम्राज्य के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए उसने भारत के दूसरे समुंद्री द्वार ‘बंगाल’ के राजनीतिक और वाणिज्यिक महत्व को समझा और १५७६ [1576] में उसे भी अपने राज्य में मिला लिया।


अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से राजस्व बढ़ने लगा था, मुस्लिम सूबेदारों के विद्रोह, अकबर बल पूर्वक कुचल चुका था पर समाज मुख्यतः गैर-मुस्लिम था। ऐसे में कहीं हिंदू समाज में विद्रोह न हो जाए और उसके साम्राज्य को खतरा हो, उसने हिन्दुओं के प्रति नर्म होना आरम्भ किया और १५७९ [1579] में जज़िया कर (देखे: हम न भूलें-08) समाप्त किया। यह बताने के लिए कि वह अन्य मुस्लिम शासकों की भांति कट्टरवादी नही है व सभी मत-मतान्तरों का आदर करता है उसने एक नया मत "दीन-ए-ईलाही" आरम्भ किया जिसमें इस्लाम व हिंदुत्व की प्रमुखता के साथ पारसी, जैन एवं ईसाई मत भी सम्मलित थे।


यह निर्णय पाठकों को स्वयं करना है कि क्या जज़िया कर हटा देने से (राजा बनने के २३ [23]साल बाद), नया मत चलाने से, समाज पर अत्याचार न करने से वह "महान" की उपाधि के योग्य हो गया। क्या अकबर वास्तव में सभी मतों का बराबर सम्मान करता था इसका निर्णय भी पाठक अकबर द्वारा बनाई उसकी राजधानी "फतेहपुर सीकरी" जा कर उसकी मुस्लिम रानी, हिंदू रानी व ईसाई रानी के महलों को देख कर लगा सकते हैं। उसके हरम में कितनी महिलाएँ थीं इसकी सही संख्या संभवत: कभी पता न चले पर जहाँगीरनामा में उसकी ३० से अधिक पत्नियों के नाम है। वर्ष १५९२ [1592] में ही उसने १२ [12] राजपूत कुमारियों से विवाह किया था। एक समय में ४ [4] से अधिक पत्नियाँ तो इस्लाम में भी मान्य नहीं हैं।


जहाँगीर (जन्म सलीम, शासनकाल: १६०५-२७ [1605-27]) अकबर और उसकी पत्नी मरियम-उज़-ज़मानी (राजकुमारी हरका बाई; तथाकथित सभी धर्मों के सम्मान करने वाले राजा ने हिंदू रानी का नाम क्यों बदला) का पुत्र था। वह "अफीम" का आदी था और राज्य के मामलों में उसकी रुचि नही थी। उसके राजा बनते ही १६०५ [1605] में उसके सबसे बड़े बेटे ख़ुसरो ने विद्रोह कर दिया जिसे उसने पंजाब में हराया। युद्ध के बाद सिखों के ५ [5] वें गुरु अर्जुन देव जी को ख़ुसरो की मदद करने के कारण जहांगीर ने फांसी दे दी। १६२३ [1623] में जहाँगीर के दूसरे बेटे खुर्रम (शाह जहाँ ) ने विद्रोह कर दिया जिसका अंत १६२५ [1625] में बाप-बेटे में संधि होने पर हुआ। अफीम और शराब के सेवन के कारण जहाँगीर बीमार रहने लगा और १६२७ [1627] में उसका निधन हुआ (उसके छोटे भाई मुराद और दानियाल अकबर के जीवनकाल में अत्यधिक शराब पीने के कारण मर चुके थे)


राजगद्दी पर बैठते ही शाह जहाँ (शासनकाल: १६२८-५८ [1628-58]) ने अपने ससुर, आफ खान की मदद से सभी शाही राजकुमारों को, जो सिंहासन के लिए प्रतिद्वंदी हो सकते थे, मरवा दिया। अपने छोटे भाई शहरीर को उसने अंधा बना कारागार में डाल दिया। उसके राज्यकाल को मुग़ल साम्राज्य के कला व भवन निर्माण के स्वर्णिम काल के रुप में दर्शाया जाता है। दिल्ली व आगरा में लाल किला, जामा मस्जिद व अपनी पत्नी मुमताज के लिए प्यार की निशानी 'ताजमहल' (विवाद का विष्य कि ताजमहल एक हिंदू मंदिर था) का निर्माण उल्लेखनीय हैं।

बुद्दिजीवी यदि इतिहास खंगालेंगे तो पाऐंगे कि शाह जहाँ को राजपूतों के साथ राजस्थान में, बुन्देलखंड में ओरछा के राजा जुझारसिंह बुन्देला से, दक्षिण में मराठों से, उत्तर में गांधार पाने के लिए सफवीद शासकों से युद्ध करना पड़ा जिस कारण उसके राजस्व में निरंतर कमी हो रही थी। भवन-निर्माण के लिए भी धन अनिवार्य था अत: प्रजा पर उसके अत्याचार बढ़ने लगे। १६३०-३२ [1630-32] में दक्कन पठार (डेक्कन प्लैटू) में महा-अकाल था। आयरिश व डच इतिहासकारों अनुसार बुरहानपुर (मध्य-प्रदेश) में पढ़ाव डाली शाह जहाँ की सेना की १० [10] माह की आपूर्ति के लिए गुजरात में लगभग ४० [40] लाख लोगों की भोजन के अभाव में जान गई (कुल मृत्यु ७४ [74] लाख)।


अपने धार्मिक कट्टरवाद के कारण उसने पंजाब में सिख गुरु हरगोविंद जी पर आक्रमण किया व धार्मिक-स्थलों को हानि पहुँचायी। बंगाल के हुगली में ईसाईयों को उनकी व्यापारिक व धार्मिक गतिविधियों के लिए मारा। हिंदू माँ की संतान होने पर भी ‘बादशाहनामा’ के अनुसार शाह जहाँ ने अकेले बनारस में ही ७६ [76] मंदिर तुड़वाए। हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए उसने एक पृथक विभाग खोला।


मुमताज महल से शाह जहाँ के प्रेम का आंकलन पाठक स्वयं लगाए कि वह मुमताज को शादी का वचन देने के ५ [5] साल बाद उससे विवाह करता है। मुमताज से विवाह करने से पहले व विवाह के बाद भी वह अन्य शादियाँ करता है जिनसे उसे संतानें भी होतीं हैं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उसने कुल ११ विवाह किए। मुमताज़ केवल १९.०१.१६२८ से १७.०६.१६३१ (साढ़े तीन साल) [19.01.1628-17.06.1631] तक ही शाह जहाँ की मुख्य पत्नी के रूप में मुग़ल साम्राज्य की महारानी थी।


शाह जहाँ के भवन-निर्माण के जुनून व उसके सैन्य अभियानों ने साम्राज्य को दिवालियापन के कगार पर ला दिया था। सन १६५७ में शाह जहाँ बहुत बीमार हो गया और तब उसने अपने बड़े लड़के दारा को अपना विधिवत उत्तराधिकारी घोषित किया। महत्वाकांक्षी औरंगजेब (शासनकाल: १६५८-१७०७) [1658-1707] ने १६५८ में अपने बड़े भाई दारा को युद्ध में हराया और पिता को अयोग्य बता कैद कर लिया। वह एक कट्टर, अत्याचारी मुस्लिम शासक था जिसके बारे में सभी ने इतिहास में थोड़ा-बहुत पढ़ा है। इसने राजा बनते ही सिख गुरु तेगबहादुर जी को अपने भाई दारा का साथ देने के लिए मृत्यु-दंड दिया। ग़ैर-मुस्लिमों पर पुन: जजिया कर लगाया व पूरे साम्राज्य पर इस्लामी क़ानून लागू किया।


हम न भूलें कि


  • किन्ही कारणों से विद्यालय में पढ़ाया इतिहास विश्वविद्यालयों में पढ़ाए इतिहास से भिन्न था और आज भी विद्यालयों में सही इतिहास नहीं पढ़ाया जा रहा।

  • अधिकांश विद्यार्थी इतिहास को एक बोझ समझ कर पढ़ते है और अभिभावक भी इतिहास की शिक्षा के प्रति उदासीन है जिस कारण पाठ्यक्रम में छेड़छाड़ होने पर भी विद्यालय व अभिभावक मूक रहते है।

  • संतानों की शिक्षा का आर्थिक वहन ही अभिभावक अपना दायित्त्व न समझें अपितु सदैव यह ध्यान दें कि शिक्षा सही दिशा में हो।

  • गलत शिक्षा विद्यार्थी को गलत दिशा में ले जावेगी और इतिहास की गलत शिक्षा तो संस्कृति पर मूक आघात है।

  • इतिहास की घटनाओं से मिली सीख आपके संस्कारों को प्रेरित करती है।

  • जो इतिहास का महत्त्व नहीं समझता, वह अनुभवों का महत्त्व नहीं समझता और संभवत: एक ही गल्ती बार-बार कर सकता है।

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Mughal Empire


Babur was a descendant of Taimur and Genghis Khan and came to India to conquer it. He was inspired by the adventures of Taimur, who invaded India in 1398. Historians believe that the Mughal empire was founded by him in 1527 although the Mughal empire is believed to have started from 1600 onwards, during the rule of Akbar (Babur's grandson). This Mughal royal structure lasted for some time after the death of the last major emperor, Aurangzeb. After 1720, the Mughal empire gradually weakened under the influence of the East India Company and was formally dissolved in 1858.


Babur's brief time of rule (Death: 1530) was spent in wars with the Afghans and the Rajputs (under the leadership of Rana Sanga of Mewar). The period of his son Humayun (reign: 1530-54) also started with the invasion of Kalinjar, the Hindu princely state of Bundelkhand, and from 1532 onwards he was constantly at war with Sher Shah Suri (Sher Shah died in the battle of Kalinjar in 1545). Humayun's brother Hindal was not helping him against Sher Shah thus feeling unsafe in India, he took refuge in Persia (Iran) in 1543 (the Sur Empire, founded by Sher Shah Suri, ruled from 1540–1555). In 1555, Humayun triumphed over Sher Shah and restarted Mughal rule. The following year he died in an accident in Delhi which was kept secret for a fortnight so that his 13-year-old son Akbar, who was then in Punjab, could be proclaimed king. Bairam Khan, the brother-in-law of Humayun, was made the patron of Akbar (reign: 1556-1605) who, in the 2nd Battle of Panipat (1556), defeated the emperor Hemachandra Vikramaditya or Hemu (he was earlier the prime minister of Adil Shah Suri, who was an unfit king and constantly pushed his responsibilities on Hemu). Till 1560, the administration was in the hands of Bairam Khan, who expanded the Mughal empire and established the Mughal dynasty in India.


During that period, the Russian Empire, the Qing Dynasty of China, and other powers were gaining control in central Asia, and there were no invasions on India from this region. During 1564-74, the old friends of Mughal (Uzbek, Mirza, Qaqshals (basically Turks) and Khails) united in the name of Islam and attacked Akbar to gain wealth under the leadership of Mirza Hakim (Akbar's half-brother) but were brutally crushed by him.

The Rajputs had suffered a lot in the wars with Babur. Other Muslim kings Bahadur Shah (Gujarat) and Sher Shah Suri (Delhi) were also trying to gain power over Rajasthan. In such a situation, King Pooranmal (1527–34) of Amer (near Jaipur) found it appropriate to support the Mughals. His younger brother Bharmal became king at the age of 50 in 1548 and strengthened the friendship with the Mughals by marrying his daughter (name: Heera Kumari or Harka Bai also made famous as Jodha Bai by Hindi cinema) to Akbar. Man Singh was the king of Amer at that time. Amer's friendship with the Mughals was not accepted by other Rajput houses. Rajputs kept fighting with Mughals under the leadership of Rana Udai Singh, his son Rana Pratap, and then his son Rana Amar Singh. After the conquest of Ranthambore in 1569, Akbar's suzerainty was established over almost the whole of Rajasthan. In 1573 he conquered Gujarat and his boundaries reached the sea where he came in contact with the Portuguese. He was not interested in what was happening abroad, but for the international trade of his empire, he understood the political and commercial importance of the second sea gate of India, 'Bengal' and merged it in his kingdom in 1576.


Revenue from international trade was increasing. Akbar had already crushed the rebellion of Muslim warlords, but the society was predominantly non-Muslim. To avoid any rebellion in the Hindu society that could threaten his empire, he started being soft towards the Hindus and stopped the Jaziya (see: Hum Naa Bhooleen-08) in 1579. In order to show that he is not a fundamentalist like other Muslim rulers and respects all faiths, he started a new religion "Din-i-Ilahi" in which Parsi, Jain and Christian views along with the prominence of Islam and Hindutva were also included.


It is up to the readers to decide if removal of Jaziya tax (23 years after he became king), starting a new religion, not persecuting the society, made him eligible for the title of "The Great". A comparison of palaces of his Muslim, Christian and Hindu queen in "Fatehpur Sikri" built by him as his capital will help readers to decide if Akbar really respected all faiths equally. The exact number of women he had in his harem may never be known, but in ‘Jahangirnama’ names of more than 30 wives are mentioned. Just in one year, in 1592, he married 12 Rajput girls whereas more than 4 wives at one time are not even accepted in Islam.


Jahangir (born Salim, reign: 1605-27) was the son of Akbar and his wife Maryam-uz-Zamani (Princess Harka Bai; why did the king who respected all religions had to change the name of his Hindu queen). He was addicted to "opium" and was not interested in the stately affairs. As soon as he became king in 1605 his eldest son Khusro revolted whom he defeated in Punjab. After the war, Jahangir hanged Guru Arjun Dev Ji (5th Sikh Guru) for helping Khusro. In 1623, Jahangir's second son Khurram (Shah Jahan) revolted. A treaty between father and son in 1625 ended the revolt. Jahangir became ill due to heavy consumption of opium and alcohol and died in 1726 (his younger brothers Murad and Daniyal had also died due to excessive drinking during Akbar's lifetime).


As soon as Shah Jahan (reign: 1628-58), was crowned, with the help of his father-in-law, Aaf Khan, he killed all the royal princes who could be rivals for the throne. He blinded and imprisoned his younger brother Shahrir. His reign is mentioned as the golden era of art and architecture of the Mughal rule. The construction of the Red Forts in Delhi and Agra, the Jama Masjid and the symbol of love for his wife Mumtaz, the 'Taj Mahal' (is a subject of controversy if the Taj Mahal was a Hindu temple) are notable.


Readers will find that Shah Jahan had to fight with the Rajputs in Rajasthan, king Jujhar Singh Bundela of Orchha in Bundelkhand, Marathas in the south and Safavid rulers in the north to get Gandhar. Due to these wars, there was a continuous decrease in his revenue. Money was necessary for the construction of the buildings hence his atrocities on public started increasing. There was a great famine in the Deccan Plateau during 1630–32. According to Irish and Dutch historians, to feed Shah Jahan's army for 10 months in Burhanpur (Madhya Pradesh) during this time, about 4 million people died due to lack of food in Gujarat (total death 7.4 million).


Due to his religious fundamentalism, he attacked Sikh Guru Hargobind Ji in Punjab and damaged religious monuments. In Hooghly, Bengal, Christians were killed for their business and religious activities. Even on being a child of a Hindu mother, according to the ‘Badshahnama’, Shah Jahan demolished 76 temples alone in Benares. He formed a separate department to convert Hindus to Islam.


Shah Jahan's love from Mumtaz Mahal should be assessed by the reader himself, that he marries Mumtaz after 5 years of pledging his marriage. Before and after the marriage with Mumtaz, he marries other women from whom he bears children. According to some historians, he married 11 times. Mumtaz was the Empress of the Mughal Empire only as the chief consort of Shah Jahan from 19.01.1628 to 17.06.1631 (three and a half years).


Shah Jahan's passion for building and his military campaigns brought the empire to the brink of bankruptcy. In 1657, Shah Jahan became extremely ill and then declared his elder son Dara his legitimate heir. The ambitious Aurangzeb (reign: 1658-1707) defeated his elder brother Dara in a battle in 1658 and imprisoned his father declaring him unfit to reign. He was a staunch, tyrannical Muslim ruler about whom everyone has read in history. As soon as he became king, he ordered death penalty for Sikh Guru Tegh Bahadur ji for supporting his brother Dara. He again imposed Jaziya tax on non-Muslims and established Islamic law for the entire kingdom.


Let us not forget that


  • For some reasons, the history taught in school was different from the history taught in universities and even today the correct history is not being taught in schools.

  • For most of the school students history is a burden and the parent are also indifferent towards it. The schools and parents remain silent even if the curriculum is manipulated.

  • Parents should not consider financing the education of their children as their only responsibility but must also pay attention and check that education is in the right direction.

  • Incorrect education will lead the student in the wrong direction and wrong education of history is a silent attack on the culture.

  • Learning from the events of history inspires and enriches your virtues.

  • One who does not understand the importance of history, does not understand the importance of experiences, and may possibly repeat the same mistake.

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