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हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (27)

हिन्दुत्त्व में विज्ञान को जाने

Know the Science in Hinduism


हम सभी ने 'पंचतंत्र' की कहानियों के सन्दर्भ में सुना हुआ है। 'पंचतंत्र' की कहानियों में मनुष्य-पात्रों के अतिरिक्त कई बार पशु-पक्षियों को भी कथा का पात्र बनाया गया है। ये नीतिकथाएँ मनोविज्ञान, व्यवहारिकता तथा राजकाज के विषयों को बड़े ही रोचक ढंग से प्रस्तुत करती हैं व उनके माध्यम से सीख एवं शिक्षा प्रदान कराती हैं। बहुत से लोग इस 'पंचतंत्र' पुस्तक को नेतृत्व क्षमता विकसित करने का एक सशक्त माध्यम भी मानते हैं। यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह इन कथाओं को मात्र कहानियाँ समझ कर सुनता है अथवा उनका मंथन कर अपने लिए उनमें से कुछ लाभप्रद ज्ञान पाने का प्रयास करता है। इसी प्रकार बहुत से लोगों के लिए रामायण, महाभारत, पुराण आदि कथा-कहानियाँ हो सकते है परन्तु जो कोई इन पर विचार, चिंतन-मंथन करेगा वह इनके ज्ञान-विज्ञान को समझ पाएगा। पिछले कुछ समय से मंदिरों में, कथा-सभाओं में कथाओं को अत्यधिक रोचक बना कर सुनाया जाता है कि वह कानों को आनन्द दे। हम समाज में लोगों को, 'अमुक कथावाचक बहुत अच्छी कथा करता है', 'आज तो पंडित जी की कथा में आनंद ही नहीं आया' जैसे वाक्य कहते हुए पाते है। कथावाचक, पंडित, पुरोहित भी अपनी कथा करने की कला व प्रसिद्धि के आधार पर सभाओं में बुलाए जाते है और इसी आधार पर उनका पारितोषिक (दक्षिणा) होता है। कथा के समय श्रोता आनंदभाव से उसमें लीन हो जाता है और कथा समाप्त होने पर प्रसाद, जलपान आदि ग्रहण कर अपने घर चला जाता है। दुर्भाग्यवश न कथावाचक कथा में छिपे गूढ़ ज्ञान-विज्ञान की बात करता है और न ही कथा समाप्त होने के पश्चात श्रोता ही कथा सुनने से मिलने वाले ज्ञान व लाभ की बात करता है। यह विचारणीय है कि समाज में भजन-कीर्तन, कथा आदि बढ़ रहा है परन्तु लोगों को शांति नहीं मिल रही, मन विकारों मे ही रमा रहता है एवं समाज में पाप, दुराचार बढ़ रहा है।


यहाँ हमें अपने दोष को स्वीकारना होगा कि हम कथा, प्रवचन आदि सुनने के उपरांत उस पर विचार, चिंतन-मनन आदि नहीं करते। हमारे मन में (प्रथम) चिंतन-मनन न होने के कारण कोई प्रश्न नहीं होते और (द्वितीय) प्रश्न-शंका आदि यदि हो तो हम उसके समाधान के लिए अधिक प्रयास भी नहीं करते।


आज हमारी अवस्था उस विद्यार्थी जैसी है जो कक्षा में अध्यापन को सुनना ही अपना कर्म समझता है और ऐसा मानता है कि मात्र सुनने से ही उसे सब ज्ञान हो जाएगा। संभवत: प्राथमिक शिक्षा तक तो विद्यार्थी को इसमें सफलता मिल जाए परन्तु माध्यमिक, उच्च, उच्चतर, स्नातक, स्नातकोत्तर के लिए जैसे-जैसे विषय की गूढ़ता में वृद्धि होती जाएगी वैसे-वैसे विद्यार्थी को स्वाध्याय, चिंतन-मनन अधिक करना पड़ेगा। उसे योग्य शिक्षक ढूँढना होगा कि शंका-समाधान हो सके। शिक्षक हमारे लिए योग्य है और वह हमें और अधिक शिक्षा दे सकता है अथवा नहीं इसका निर्धारण भी हमें अपने पूर्व-ज्ञान के आधार पर स्वयं ही करना होगा। यह विडंबना ही है कि ऐसा और इतना प्रयास तो हम मात्र व्यवसायिक शिक्षा हेतु ही सोचते है। जो विधार्थी ऐसा प्रयास करते हैं वे अवश्य सफल भी होते हैं। विद्यार्थी ग्रहण किए गए अध्यापन को अपने प्रयास, अपने स्वाध्याय, अपने चिंतन-मनन से ही अपने लिए शिक्षा एवं सफलता का मार्ग बनाता है। योग्य शिक्षक तो केवल विद्यार्थी का मार्ग-दर्शन करता है व लक्ष्य-प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करने में उसकी सहायता करता है। सफलता हेतु परिश्रम तो विद्यार्थी को ही करना होता है।


एक विद्यार्थी के लिए शिक्षक, अध्यापन, शिक्षा, ज्ञान, पुस्तकें, साहित्य आदि सब कुछ उपलब्ध हैं परन्तु इनका लाभ तो जिज्ञासु विद्यार्थी ही उठा सकता है। शिक्षा ग्रहण करने की जिज्ञासा के अभाव में विद्यार्थी के लिए "काला अक्षर भैंस बराबर" है। ऐसा विद्यार्थी कभी भी शब्दों, वाक्यों में छिपे ज्ञान व उनके रहस्यों को नहीं जान पाएगा। वह प्रकृति व उसके नियमों को समझ नहीं पाएगा। ऐसा व्यक्ति इस संसार को, प्रकृति को, इनके कार्य-कलापों को इनमें हो रहे निरंतर परिवर्तनों को अनुभव तो करेगा परन्तु ज्ञान के अभाव में मिथ्या-माया ही समझता रहेगा। कुछ ऐसा ही वर्तमान में हमारे हिन्दू समाज के साथ हो रहा है कि सब कुछ उपलब्ध होते हुए भी जिज्ञासा व सही मार्ग-दर्शन के अभाव में हम या तो अपनी वैदिक संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं या फिर अपनी प्रथाओं का बिना सोचे-समझे एक अंध-विश्वासी व्यक्ति की भाँति पालन करते जा रहे है। ज्ञान व चिंतन की कमी के कारण हम 'प्रथा' के उद्देश्य एवं उसके निजी व सामाजिक लाभ की ओर ध्यान न देकर 'प्रथा' की भव्यता पर अपने प्रयास केंद्रित कर रहे हैं। भव्यता जन-मानस को आकृष्ट करने का माध्य्म है, उद्देश्य नहीं। हमारे ऋषि-मुनि यह जानते थे, समझते थे जिस कारण उन्होंने, त्यौहारों, समारोह, अनुष्ठान आदि सामूहिक आयोजनों की भव्यता पर बल दिया परन्तु आत्म-उत्थान के लिए अनिवार्य स्वाध्याय, साधना, भोजन, आचरण, वस्त्रादि व निवास की भव्यता नहीं अपितु उनकी मात्रा, उपयोगिता व गुणवत्ता पर बल दिया। वर्तमान समय में हम पाते हैं कि समाज में प्रथा, समारोह आदि की भव्यता को और अधिक भव्य बनाने की होड़ सी लग गई है जिसका परिणाम है कि हमारी प्रथाओं में ऐसे व्यवधान, व्यवस्थाएं, प्रणालियाँ जुड़ गए हैं जो उद्देश्य-पूर्ति के लिए आवश्यक नहीं हैं और विचारशील व्यक्ति को दिखावा व आडंबर लगते हैं।


हमारे ग्रंथों में ईश्वर के १०० से अधिक नाम बताए गए हैं। इन सभी नामों में "ओ३म" प्रभु का निज नाम बताया गया है। शेष सभी नाम गौणिक (गुणों को दर्शाने वाले) हैं। चूँकि ईश्वर का निज नाम "ओ३म" है इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने ईश्वर के सम्बोधन हेतु "ओ३म" शब्द (लघु रूप: ॐ) का प्रयोग किया है और ईश्वर के गुणों को दर्शाने हेतु उनके गौणिक नाम का प्रयोग किया गया है। हम पाते हैं कि ईश्वर के आह्वान हेतु मंत्रों के आरम्भ में "ओ३म" शब्द का ही प्रयोग होता है, ईश्वर के किसी अन्य नाम का नहीं।


ओ३म शब्द के उच्चारण में हमे 'ओम' ध्वनि सुनाई पड़ती है। '' व '' वर्ण के बीच संख्या '३' उच्चारण संकेत (प्लुत स्वर) है कि '' ध्वनि का उच्चारण '' ध्वनि की तुलना में ३ गुना अधिक समय तक किया जाएगा।


विज्ञान के अनुसार गोलाकार (वृत्त, बेलन) किसी भी अन्य आकृति की तुलना में सबसे अधिक स्थिर होता है। यही कारण है कि हम प्रकृति में आकाशीय पिंडों से लेकर कोषाणुओं और परमाणु-तत्वों तक में गोल आकृति ही पाते है। हम ब्रह्मांड के आयामों को नहीं जानते हैं परन्तु विज्ञान द्वारा भी इसे गोलाकार ही माना जाता है।


यदि आप किसी भी भाषा के किसी भी अक्षर को बोलने का प्रयास करते हुए अपने होंठों को गोलाकार में खोलें (आपके होंठ आरम्भ में चिपके हुए नहीं हैं; होंठों द्वारा बनाया गया चक्र व्यास में बढ़ता है) और होंठों को गोलाकार बनाए रखते हुए बंद करें तो एकमात्र संभव ध्वनि 'ओम' है। इसीलिए संभवत: 'ओम' ब्रह्मांड के निर्माता का निज नाम है। 'ओम' ब्रह्मांड की ध्वनि है।


होंठों को खोलते व बंद करते समय आप ध्यान देवें कि स्वभाविक रूप में होंठों को गोलाकार के अधिकतम व्यास तक खोलने में होंठों को बंद करने की तुलना में अधिक समय लगता है।

इस ब्रह्मांड व प्रकृति की ओर वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हुए 'वाक-तत्त्व' के आधार पर ही संस्कृत भाषा का निर्माण हुआ है। संस्कृत ही एकमात्र ऐसी भाषा है कि जिसमें मनुष्य के कंठ, दंत, जिह्वा, होंठ व तालु से निकलने वाली सभी ध्वनियों को ज्यों का त्यों शब्दों में लिखा गया है। संस्कृत भाषा की वर्णमाला इसी वैज्ञानिक आधार पर बनी है और संस्कृत का व्याकरण (ऋषि पाणिनि द्वारा रचित) भी अपवाद-रहित है। केवल संस्कृत भाषा में ही यह क्षमता है कि इसमें जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है। यह संस्कृत भाषा ही है कि जिसका शुद्ध उच्चारण होने पर श्रोता को बोलने वाले की वाणी से उसके क्षेत्र, प्रांत, प्रदेश, देश का अनुमान नहीं हो सकता।

(क्रमश …..)


हम न भूलें कि

  • जब तक मनुष्य मे अपनी त्रुटियाँ जानने की ईच्छा उत्पन्न नही होती उस मनुष्य का उद्धार नही हो सकता।

  • सफलता सदा उसी को मिलती है जो कल क्या था और कल क्या होगा को भूल कर सदा यह सोचता है कि अभी क्या है और कैसा होना चाहिए और अपने वर्तमान को अनुकूल बनाने का प्रयास करता है।

  • हमें कभी भी इस बात पर संतुष्ट हो कर नही बैठना चाहिए कि मैने 'इतना सब' कर लिया है। सदा यह सोचो कि 'कितना करना' अभी भी शेष है।

  • जिसका मन शंकाओं से भरा हुआ है वह एक दूषित भूमि के समान है जहाँ कोई पौधा उपज नही सकता। सर्वप्रथम उसके मन से शंकाओं का निवारण करना होगा तभी ज्ञान का बीज बोने पर विकसित होगा।

  • श्रेष्ठ व्यक्ति कभी भी अपने ॠण, प्रतिज्ञा और लक्ष्य को नही भूलते। इन्हे भूलने वाला व्यक्ति सदा दुख को ही प्राप्त होता है।

Know the Science in Hinduism

We all have heard about the stories of 'Panchtantr'. In the stories of Panchtantr, apart from the human characters, sometimes animals and birds have also been made characters of the story. These stories narrate the subjects of psychology, practicality and governance in a very interesting way and provide learning and education through them. Many people consider this 'Panchtantr' book as a powerful medium to develop leadership potential. It depends on a person whether he listens to these stories simply as mere stories or churns them and tries to get some beneficial knowledge for himself. Similarly, Rāmāyan, Mahābhārat, Purāns etc. may be stories for many people, but whoever will do deep thinking and analysis on them will be able to understand their meaning and science behind them. Since some time, sermons are held in temples and in other gatherings where the priest or the preacher tries to make these very interesting so that they give pleasure and are like music to the ears. We often find people in the society saying, 'that preacher is very good as he/she has a nice way of holding discourse', 'today there was no joy in the preacher's discourse'. The priests and preachers are also invited to gatherings based on their popularity and their art of holding discourse. Their reward (Dakshinā) is also based on them. During the discourse the listeners get engrossed in it. On its completion they take prasād and refreshments and leave. Unfortunately, neither the preacher talks about the hidden knowledge and science in the narrated texts nor the listener talks about the knowledge and benefits gained by listening to the narration. It is worth a thought that on one side the practice of bhajan- kīrtan, kathā etc. are increasing in the society, but on the other side the people are not getting peace of mind but rather the mind remains engrossed in vices leading to the rise of misconduct and sins in the society.


Here we have to accept our fault that after listening to the narration, discourse etc., we do not think over it and contemplate. Due to the absence of contemplation, there are no questions and if there are questions and doubts, we hardly make an effort to get them answered.


Our condition is like that of a student who considers it as his duty to listen to the teacher in the class and thinks that he will get all the knowledge just by listening. The student may be able to succeed until primary education, but as the depth of the subject increases in secondary, higher secondary, graduation, post-graduation level, more and more of self-study and contemplation becomes necessary. Qualified teachers must be found so that doubts can be resolved. On the basis of our prior knowledge, we have to decide on our own if the teacher is appropriate for us and can give us more education or not. It is ironical that only for vocational education we think like this and make such efforts to be successful. The student takes the teachings and makes his path for success by his efforts, his self-study and his contemplation. A qualified teacher just guides the student and helps him paving the way to achieve the goal. It is the student who has to put efforts and work hard for success.


Teachers, teachings, education, knowledge, books, literature etc. are available to every student. Only a curious student who wants to succeed can take advantage of them, but in the absence of curiosity to learn, all these are nearly useless. A student without curiosity will not be able to get the knowledge and secrets hidden in the words and sentences of a text. He will not be able to understand the nature and its laws. He will certainly experience this world, nature, its activities and the continuous changes taking place in them, but in the absence of knowledge, he will continue to consider them as myth or illusion. Something similar is also happening with our Hindu society at present. Any information one needs to educate himself and attain knowledge is available, but due to lack of curiosity and proper guidance, we are either moving away from our Vedic culture or blindly following our practices without thinking. Due to lack of knowledge and thinking, we are focusing our efforts on the grandeur of the customs and their practice without paying attention to the purpose of the practice and its personal and social benefits. Grandeur attracts people but it is never the objective of any custom or practice and our sages were aware of this. They emphasized on the grandeur of festivals, ceremonies, rituals etc., but for self-upliftment, they did not emphasize on the grandeur of self-study, spiritual practice, food, conduct, clothing and residence, but stressed on their quantity, utility and quality. In the present times, we observe a competition in the society to make the celebrations more and more grandeur. It is one of the reasons that arrangements and practices have been added to our customs which are not necessary for the purpose. A thoughtful person finds them pretentious and pompous.


There are more than 100 names of God mentioned in our scriptures. Among all these names "Om" (ओ३म) is the personal name of the God. All other names denote God’s qualities. Since the personal name of God is "Om", our sages have used this word only while calling him. We find that the word "Om" and not any other name of God, is used at the beginning of mantras to invoke God.


In the pronunciation of the word Om, we hear the sound of the letters 'o' and 'm'. The number '3' between the letter 'o' and 'm' is a hint for the pronunciation (for plut vowel in Sanskrit) that the 'o' sound will be pronounced 3 times longer than the 'm' sound.


According to science, a sphere (circle, cylinder) is the most stable shape. This is the reason that we find round shapes in nature from celestial bodies to cells and atomic elements. We do not know the dimensions of the universe, but it is also believed to be spherical.


Starting with your mouth slightly open and your lips forming a circle, try to speak any syllable of any language while opening your mouth (until its maximum) and then closing it while maintaining the circle. The only possible sound is 'Om'. That is probably why 'Om' is the personal name of the creator of the universe. 'Om' is the sound of the universe.


Sanskrit language has been created on the basis of 'Phonetic principles' while keeping a scientific approach towards the universe and nature. Sanskrit is the only language in which all the sounds emanating from the human throat, teeth, tongue, lips and palate have been written in alphabets as they are. The alphabets of Sanskrit language are built on this scientific basis and the grammar of Sanskrit (composed by sage Pānini) is also exception-free. Only Sanskrit language has the ability to be written as it is spoken. It is Sanskrit language that when pronounced correctly, the listener cannot guess the region, province, state or country from the speech of the speaker. You will not hear any accent.

(To continue ….. )


Let us not forget that

  • As long as the desire to know one's faults does not arise in a person, you will not notice any improvement in him.

  • Success always comes to those who, forgetting what was yesterday and what will happen tomorrow, always think about what is now, how it should be and try to make the present favorable.

  • We should never sit complacent on the fact that I have done 'so much'. Always think of 'how much to do' is still left.

  • One whose mind is full of doubts is like a contaminated soil where no plant can grow. Firstly, doubts must be removed from his mind, only then the seed of knowledge will grow when sown.

  • A good person never forgets his debts, pledges and goals. The person who forgets them always gets sorrow.

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