हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen

भारतीय नववर्ष / Indian New Year


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भारतीय नववर्ष का आरम्भ अपने परिजनों संग केवल मंगलकामनाओं के आदान-प्रदान का समय नहीं है अपितु सभी प्राणियों, वनस्पति आदि संग आनंद का समय है। भारतीय नववर्ष का समय आपको प्रकृति के समीप लाता है, आपको नए जीवन के दर्शन कराता है।


एक दिवस की अवधि और एक वर्ष की अवधि का निर्धारण करने के लिए मानव जाति ने सूर्य व चन्द्रमा की सहायता ली। ब्रह्मांड में सभी नक्षत्र चलायमान है और सूर्य व चन्द्रमा भी घूम रहे हैं। हम देखते है कि चाँद प्रत्येक रात अलग होता है। उसका घटने और बढ़ने का चक्र ३० [30] दिन का है जिसे एक माह माना गया है। भारत में ६ [6] ऋतुएँ है, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत व शीत। ये सभी ऋतुएँ २ [2] मास की हैं। इन ऋतुओं का चक्र १२ [12] माह में पूरा होता है। हिंदू वर्ष सूर्य व चन्द्रमा के चलन को अपनी गणना में सम्मिलित करता है। धार्मिक पर्व व अनुष्ठानों को निर्धारित करने के लिए चंद्र गणना का उपयोग किया जाता है व सौर-वर्ष (१२ राशियों द्वारा परिभाषित) से तालमेल बिठाने हेतु ‘अधिक मास’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ जोड़ दिया जाता है।


आज प्रचलित पश्चिमी कैलेंडर (कैलेंडर का हिंदी शब्द: पंचांग) सूर्य की चाल पर आधारित है। वह अवधि जिसमें सूर्य पृथ्वी से देखे जाने पर पुन: अपनी पहले वाली स्थिति में वापस आता है, जैसे मकर-संक्रांति से मकर-संक्रांति तक का समय, को एक वर्ष माना गया है।


इतिहास के उल्लेखों अनुसार आज से लगभग ४,००० [4,000]वर्ष पूर्व बेबीलोन (मेसोपोटामिया सभ्यता के समयकाल में भी वर्णित) में २१ [21] मार्च से नववर्ष का आरम्भ माना जाता था।


(२१ मार्च को सूर्य विषुव रेखा (एकविनोक्स) पर होने से १२ घंटे का दिन व १२ घंटे की रात होती है और इसी दिन से (पृथ्वी के उत्तरार्ध) में वसंत ऋतु का आरम्भ माना जाता है)


प्राचीन रोमन गणराज्य में भी दिन और माह की गणना चाँद के बढ़ने और घटने पर आधारित थी परन्तु नववर्ष का आरम्भ सूर्य की गति पर आधारित था। धार्मिक त्योहारों और अन्य मुख्य तिथियों को अपने उचित मौसम में बनाए रखने के लिए उन्हें निरंतर वर्ष के माह के दिनों में बदलाव करना पड़ता था। साल का पहला माह मार्च व अंतिम फरवरी होता था और वर्ष की अवधि समान रखने के लिए वर्ष के अंतिम माह में दिन जोड़ दिए जाते थे। एक बड़े धार्मिक पादरी (पोंटिफिक्स माक्सिमुस) को वर्ष की लम्बाई सही रखने का अधिकार था। इन ‘पोंटिफिक्स’ ने अपने राजनीतिक सहयोगियों द्वारा नियंत्रित वर्षों को लंबा कर और अपने प्रतिद्वंद्वियों के वर्षों को छोटा कर यदाकदा अपनी शक्ति का दुरुपयोग भी किया।


जूलियस सीज़र एक रोमन सेनापति था जिसने ४९-४५ [49-45] ईसा पूर्व गृह-युद्ध के बाद रोमन गणराज्य के स्थान पर रोमन साम्राज्य स्थापित किया और उसका सम्राट बना। अपनी सम्राट की शक्ति का उसने ‘पोंटिफिक्स माक्सिमुस’ के रुप में उपयोग किया और तत्कालीन कैलेंडर में सुधार कर अपने नाम से एक कैलेंडर आरम्भ किया। उसका यह ‘जूलियन कैलेंडर’ यूनान (ग्रीस) के गणितज्ञों की सहायता से बना था जो सूर्य की गति पर आधारित था। इसमें एक वर्ष की अवधि ३६५ .२५ [365.25] दिन की थी। दिन, माह और वर्ष की गणना को सरल बनाने के लिए वर्ष को ३६५ दिन का निर्धारित किया गया और चौथाई दिन को वर्ष की गणना में सम्मलित करने के लिए हर चौथे वर्ष एक अतिरिक्त दिन साल में जोड़ दिया गया। ३६६ [366] दिनों वाले वर्ष को हम ‘अधिवर्ष(लीप वर्ष) के नाम से जानते हैं।


जूलियस सीज़र के आदेश पर उसके नाम का कैलेंडर १. जनवरी ४५ [45] ईसा पूर्व लागू हुआ और तब से नव वर्ष का आरम्भ १. जनवरी हुआ। सीज़र ने रोमन देवता 'जानूस' को सम्मान देने के लिए १. जनवरी का चुनाव किया था। (रोमन लोग ‘जानूस’ को ‘शुभारंभ का देवता’ मानते थे। उनके अनुसार इस देवता के दो चेहरे थे, एक चेहरा भूतकाल में देखता था तो दूसरा भविष्य में। जनवरी माह के नाम में भी आंशिक रुप से जानूस देवता का नाम है।)

चूँकि पहले वर्ष का अंतिम माह फरवरी होता था और वर्ष की अवधि सही करने के लिए साल के अंतिम माह में दिन जोड़े जाते थे इसलिए इसी प्रथा को चलाते हुए हर चौथे वर्ष अतिरिक्त दिन को आज भी फरवरी मास में ही जोड़ा जाता है।

लगभग १,६०० [1,600] वर्षों तक यह कैलेंडर चलता रहा और फिर २४ फरवरी १५८२ [24.02.1582] को रोमन कैथोलिक चर्च के पोप ग्रेगोरी (तेहरवें) ने कैलेंडर में पुन: सुधार किया। आज विश्व में उन्ही के नाम का ‘ग्रेगोरी कैलेंडर’ प्रचलन में है। ग्रेगोरी कैलेंडर मूलत: जूलियन कैलेंडर पर आधारित है पर इसमें सटीक खगौलिक गणना होने से वर्ष की अवधि ३६५ .२४२५ [365.2425] दिन निर्धारित की गई व ईसा मसीह का जन्म चंद्र गणना से हटा कर सदा के लिए २५ [25] दिसम्बर निश्चित किया गया।


(गुड़ फ्राइडे व ईस्टर की तिथियां आज भी चंद्र गणना के कारण हर वर्ष बदलती रहतीं हैं)


जब यूरोप में रोमन कैथोलिक चर्च का प्रभाव बढ़ रहा था तब ईसाई धर्मगुरुओं ने रोमन देवता ‘जानूस के सम्मान के स्थान पर ‘ईसा मसीह’ के जन्मदिवस व ‘घोषणा दिवस’ (फीस्ट ऑफ अनन्सीएशन; वह दिन जब फरिश्ते जिब्रील ने कुवाँरी मैरी को बताया कि लैंगिक संबंध के बिना ही उसके गर्भ में ईश्वर का पुत्र आएगा) को हर्षोल्लास के पर्व के रुप में मानना आरम्भ किया था। पोप ग्रेगोरी ने कैलेंडर के सुधार के साथ ही १. जनवरी को भी पुन: हर्षोल्लास के दिवस के रूप में मनाने की अनुमति दे दी और तब से ईसाई जगत में भी १. जनवरी को हर्षोल्लास के दिवस के रूप में मनाने का चलन आरम्भ हुआ।


भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष (वैसाखी, गुड़ी पढ़वा, पोयला बोयशाख, उगादी, पुथांडु, नवरेह आदि) का आरम्भ चैत्र माह (मार्च - अप्रैल) की भिन्न तिथियों से है। अंग्रेजों के शासनकाल में भारत के कुछ क्षेत्रों में समाज ने इसे सौर्य-गणना से जोड़ते हुए १४ [14] अप्रैल को निश्चित कर दिया।


हिन्दू नव वर्ष का आरम्भ चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा (प्रथम दिन) से मानते है। इस दिन का चुनाव हिन्दुओं के प्रकृति से जुड़े होने को दर्शाता है। बसंत ऋतु का आरम्भ तो फाल्गुन (फरवरी-मार्च) माह से हो जाता है परन्तु जो पेड़ पौधे अपने पुराने पत्ते छोड़ चुके होते हैं उन पर फाल्गुन में नए कोंपल ही फूटते हैं। चैत्र मास में वनस्पति तरुणाई से यौवन में आती है। हर ओर हरियाली, वायु में फूलों की सुगंध, खेतों में फसल कटने का समय, पूरे वातावरण में स्फूर्ति व उमंग होती है।


प्रकृति जननी है व उसके बिना जीवन संभव नहीं है। प्रकृति को सम्मान देने के लिए व उसे सदा स्मरण में रखने के लिए नव-वर्ष के आरम्भ के लिए हमारे पूर्वजों द्वारा यह दिवस निर्धारित किया गया। हिंदू संस्कृति में चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा का महत्त्व अन्य कारणों से भी है।


  • मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ।

  • धर्मराज युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।

  • सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया और ‘विक्रमी-संवत्’ का पहला दिन प्रारंभ हुआ।

  • राजा विक्रमादित्य की भांति राजा शालिवाहन ने दक्षिण भारत में श्रेष्ठ राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना और ‘शक-संवत्’ आरम्भ हुआ।

  • स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन ‘आर्य समाज’ की स्थापना की।


हम न भूलें कि


  • विश्व में आज भी बहुत से समुदाय व देश प्रचलित ग्रेगोरी कैलेंडर को स्वीकार करते है और नववर्ष अपने सांस्कृतिक कैलेंडर अनुसार मानते हैं

  • यहूदी: रोश हशाना (सितम्बर माह)

  • चीन: चीनी नववर्ष (फरवरी - मार्च)

  • मुस्लमान: हिजरी कैलेंडर

  • भारत में ग्रेगोरी कैलेंडर के अतिरिक्त २ अन्य कैलेंडर प्रचलित हैं

  • विक्रमी संवत

  • शक संवत (भारत सरकार इसे काम में लेती है)

  • भारत में जन्मे महापुरुषों ने हिंदू नववर्ष के आरम्भ के हर्षोल्लास की वृद्धि हेतु अपने द्वारा किए शुभकार्यों के लिए इस दिन का चुनाव किया। उन्होंने प्रकृति की, जीवन के लिए आवश्यक व उसकीदेन को अपनी उपलब्धियों से बहुत बड़ा आंका। इन महापुरुषों ने अपनी कीर्ति के लिए किसी अन्य तिथि का चयन कर कार्य का शुभारंभ नहीं किया अपितु उनके कार्यों द्वारा ही उनकी कीर्ति हुई।

  • हर्षोल्लास बुरा नहीं है, किसी की अच्छाई का गुणगान करना बुरा नहीं है परन्तु बिना सोचे-समझे अंधे अनुकरण में हर्षोल्लास चिंतन का विष्य है।

  • अपनी संस्कृति को जानने, पहचानने व समझने की चेष्टा न करना और अज्ञान में दूसरों का अनुकरण कदाचित शोभनीय नहीं है।


Indian New Year

ऊपर


The beginning of the Indian New Year is not just a time to exchange good wishes with your family and friends, but the time to have joy with all living beings, flora and fauna. The Indian New Year brings you closer to nature, makes you experience and enjoy new life.


To determine the duration of a day and a year mankind has taken help of the motion of the sun and the moon. We observe that the moon appears different every night. Its cycle of waxing and waning is 30 days which is considered as one month. There are 6 seasons in India, Spring, Summer, Rain, Autumn, Cold and Winter. All these seasons are of 2 months each. The cycle of these seasons is completed in 12 months. The Hindu year considers the movement of the sun and the moon in its calculation. Lunar enumeration is used to determine religious festivals and rituals, and 'Adhik Maas' or 'Purushottam Maas' is added to align with the solar year (defined by 12 zodiac signs).


The western calendar (Hindi word for calendar is: Panchang) prevalent today is based on the movement of the Sun. The period in which the Sun returns to its former position when viewed from Earth, such as the time from Makar-Sankranti to Makar-Sankranti, has been considered as a year.


According to the historical records, about 4,000 years ago, in Babylonia (also mentioned during the period of Mesopotamia civilization), the new year used to begin from 21st March.


(On 21st March, when the Sun is on the equinox, the day and night have equal duration of 12 hours each (in northern hemisphere) and this is also the start of spring season.)


Even in the ancient Roman Republic, the calculation of day and month was based on the moon, but the beginning of the new year was based on the movement of the sun. In order to keep the religious festivals and other main dates in their proper season the romans had to constantly change the days of the month of the year. The first month of the year was March and days were added in the last month of the year, February, to maintain the constant duration of the year. A religious priest of high rank (Pontifex Maximus) had the responsibility to maintain the correct length of the year. These ‘Pontifex’ sometimes misused their power by lengthening the years when their political allies were in power and by shortening the years of their rivals.


Julius Caesar was a Roman general who established the Roman Empire in place of the Roman Republic and declared himself as emperor after the Civil War (49 – 45 BC). He used his emperor's power as 'Pontifex Maximus' and reformed the existing calendar and started a calendar in his name. His 'Julian calendar' was made with the help of Greek mathematicians and was based on the motion of the Sun. The duration of one year was 365.25 days. To simplify the calculation of day, month and year, the year was set to be 365 days, and every 4th year a day was added to the year. We know the year of 366 days as ‘Leap Year’.


Julian calendar came into force on 1st January 45 BC and since then the beginning of New Year is 1st January. Caesar chose the date 1st January to honor the Roman god 'Janus'. (For Romans 'Janus' is the 'God of beginning'. According to them, this God had two faces, one face looks in the past and the other face in the future. It is believed that the month January may be named after the God Janus.)


Since the last month of the year was February and to correct the duration of the year, days were added in the last month of the year, the same practice is continued even today and the day is added in February for the leap year.


Julian calendar continued for about 1,600 years, and then on 24th February 1582, Pope Gregory (13th) of the Roman Catholic Church reformed the calendar. Today, the calendar in use is named after him and is called Gregorian calendar. The ‘Gregorian calendar is basically based on the Julian calendar but with more accurate astronomical calculations the duration of the year was set to be 365.2425 days and secondly the birth date of Christ was fixed as 25th December.


(The dates of Good Friday and Easter keep changing every year as they are still based on lunar calendar)


As the influence of the Roman Catholic Church in Europe was increasing, Christian leaders replaced celebrations of 1st January (in honour of the Roman god 'Janus') with the celebrations on birthday of 'Jesus Christ' and the celebration of 'Annunciation Day' (Feast of Annunciation; the day when the angel Gabriel informed virgin Mary that without sexual intercourse, the son of God will come in her womb). With the reform of the calendar Pope Gregory allowed 1st January to be celebrated again and since then 1st January is celebrated in the Christian world.


The beginning of the new year (Vaisakhi, Gudi Padhwa, Poila Boisaakh, Ugadi, Puthandu, Navreh, etc.) in different parts of India is on different dates of Chaitr month (March - April). During the British rule in India societies in certain areas fixed it on 14th April (solar calendar).


The Hindu new year starts from the “Shukla Pratipada” (first day) of the “Chaitr” month. The selection of this day shows the connection of Hindus to nature. The spring season starts from the month of Phalgun (February-March), and in this month the buds start appearing on the trees and new plants show up on earth’s surface. It is in Chaitr month that vegetation comes in its full glory and the Hindu new year is observed. There is greenery everywhere, the fragrance of flowers fills the air and it is the time of harvesting the fields. There is excitement in the environment and life takes a new start.


For Hindus nature is mother and life is not possible without her. To honor nature and to keep it in perpetual remembrance, our ancestors set this day as the beginning of the new year. In Hindu culture, Shukla Pratipada of Chaitr month is also important for other reasons.


  • The coronation of Maryada Purushottam Shri Ram was on this day.

  • The coronation of Dharmaraj Yudhishthir was also on this day.

  • Emperor Vikramaditya established the kingdom on this day and the first day of ‘Vikrami-samvat’ began.

  • King Shalivahan also chose this day to establish an ideal kingdom in South India and ‘Shak-savant’ started.

  • Swami Dayanand Saraswati ji established 'Arya Samaj' on this day.


Let us not forget that


  • Even today, many communities and countries in the world accept the prevailing Gregorian calendar but celebrate New Year according to their cultural calendar.

  • Jews: Rosh Hashanah (September month)

  • China: Chinese New Year (February - March)

  • Muslims: Hijri calendar

  • Apart from Gregorian calendar, 2 other calendars are popular in India

  • Vikram Samvat

  • Saka Samvat (Government of India follows it)

  • Great people of India chose Hindu New Year’s Day as auspicious and important for a new beginning. They respected nature and valued its necessity and contribution to life, much bigger than their own achievements. These great men did not select any other date for a new start to glorify them, rather they became famous and were glorified by their actions.

  • Celebrations are not bad, it is also not bad to praise someone's achievements, but celebrations without any thought, and copying others should be well considered.

  • Not trying to know, recognize and understand own culture and imitating others in ignorance is probably not worth it.

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