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हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (26)

हिन्दुत्त्व - विज्ञान अथवा अंध-विश्वास

Hinduism - Science or Superstition


आज की हिन्दू युवा पीढ़ी अपने कई रीति-रिवाजों को भली प्रकार समझ न पाने के कारण उन्हें अंध-विश्वास मान लेती है चूँकि समाज में प्रचिलित ये प्रथाएं उनकी बुद्धि की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं। युवा पीढ़ी के मन में जिज्ञासा, शंका व प्रश्नों का समाधान नहीं होने से उसमें इन प्रथाओं के प्रति उदासीनता व अलगाव आने लगता है। उसे ऐसे में ये प्रथाएं ही नहीं अपितु इनसे जुड़ा पूरा तंत्र अंध-विश्वास, पाखंड, ढकोसला आदि सा लगने लगता है। जब हिन्दू धर्म 'कर्म-प्रधान'है (देखें: हम न भूलें- हिंदुत्व व अब्रहमिक धर्म) व मनुष्य को उसके द्वारा किए गए कर्म एवं उस कर्म के परोक्ष व अपरोक्ष परिणामों के लिए उत्तरदायी मानता है तो ऐसे में प्रत्येक हिन्दू को उसके द्वारा किए जाने वाले कर्मों का भली प्रकार बोध होना चाहिए जिससे कि कर्मों का परिणाम भला हो। यदि हमारी बुद्धि किसी कार्य के उद्देश्य को स्वीकार करती है तो हमारे भीतर उस कार्य को सम्पन्न करने हेतु उत्साह, प्रेरणा व ऊर्जा का संचार होता है। इसके विपरीत यदि बुद्धि उस कार्य के हेतु को समझ नहीं पाती परन्तु हमें किन्ही कारणों से फिर भी वह कार्य करना पड़ता है तो ऐसे में हमें वह कार्य बोझ समान प्रतीत होता है। हम निरुत्साहित से उस कार्य को करते हैं व हमारे भीतर सदा यह विचार चलता रहता है कि वह कार्य शीघ्र समाप्त होवे व हमें वह पुन: न करना पड़े।


हमें अपने वैदिक सनातन हिन्दू धर्म के मूल स्वरूप से परिचित होना होगा। तभी हम अपनी मान्यताओं के विज्ञान को भलीभाँति समझ पाएंगे और आने वाली पीढ़ी को उसके संबंध में बता पाएंगे। वैदिक धर्म प्राचीनतम है। यह किसी जाति अथवा समाज विशेष के लिए नहीं अपितु सम्पूर्ण मानवजाति के लिए है। इसका जन्म प्रकृति के भय अथवा सामाजिक परिस्थितियों के कारण नहीं हुआ है। वेदों, उपनिषदों व शास्त्रों में हमारे ऋषि-मुनियों का प्रकृति व ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों के गहन अध्ययन व शोध का अनुभव है। यह योगदान व अनुभव किसी एक व्यक्ति का नहीं अपितु पीढ़ी दर पीढ़ी अनेकों ऋषि-मुनियों के चिंतन-मनन का परिणाम है। भारत के मनीषियों ने केवल वनस्पति, पशु-पक्षी, जीव-जंतु, ग्रह-नक्षत्र, आत्मा-परमात्मा का सम्यक अध्ययन ही नहीं किया अपितु मनुष्य के जीवन पर इन सबके प्रभाव को भी जाना है। ज्ञान का इतना विस्तृत आधार हमें विश्व में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। मनुष्य को क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए, क्या खाना और क्या नहीं खाना चाहिए, क्या सोचना और क्या नहीं सोचना चाहिए, इन सभी छोटी-बड़ी बातों का हमारे ग्रंथों में विस्तार से वर्णन किया गया है। उदाहरणार्थ पशु-पक्षियों के गहन अध्ययन के पश्चात मनुष्य के स्वास्थ्य-लाभ के लिए हमारे ऋषि-मुनियों ने अनेक योगासन बनाए जिनका नाम उन्होंने पशु-पक्षी के नाम पर ही रखा; जैसे कुक्कुटासन, मयूरासन, सर्पासन आदि।


हमारे ऋषि-मुनियों ने सदैव इसका पूर्णतया ध्यान रखा कि धर्माचरण (देखे: हम न भूलें-धर्मो रक्षति रक्षित:) करते समय धर्मानुयायियों से कोई ऐसा कर्म न हो जाए जो प्रकृति के नियमों के विरुद्ध हो। उन्होंने सदैव प्रकृति और मनुष्य के समन्वय एवं धर्माचारण में दोनों की लयबद्धता पर बल दिया है। आज मनुष्य की समस्याओं का कारण उसका प्रकृति से लय तोड़ कर उसका शोषण करना है। हमारी वर्तमान में कितनी ही समस्याओं का मूल कारण यही है कि हमने विज्ञान व आधुनिकता के नाम पर कितने ही ऐसे आविष्कार किए हैं, जिन्होंने मनुष्य, प्रकृति व ब्रह्मांड के संतुलन को बिगाड़ दिया है।


वर्तमान में हमें अपने हर ओर मोटर-वाहन, वायुयान, अंतरिक्ष-राकेट, वातानुकूलन-यंत्र आदि दिखाई देते हैं। विज्ञान की इन उपलब्धियों ने मनुष्य को अवश्य ही सुख दिया परन्तु इनके साथ जुड़े प्रदूषण, 'ग्लोबल वार्मिग' के कारण विश्व में होने वाली प्राकृतिक क्रासदियों व वातावरण में बदलाव के कारण मानव-जाति को मिलने वाले दुःख-कष्ट के प्रति विश्व में चर्चा अवश्य हो रही है परन्तु उससे निदान का कार्य कम हो रहा है। आज की वैज्ञानिक प्रगति उपभोग एवं धन-अर्जन में वृद्धि को अपना केंद्र-बिंदु मानती है जिसके लिए वह प्रकृति से विरोध को भी स्वीकार करती है। आज का विज्ञान अहंकारी हो स्वयं को प्रकृति से भी बड़ा व बलशाली समझता है। वह दावा करता है कि चिकित्सा-क्षेत्र में उसकी उपलब्धियों के कारण ही पिछले १००-१५० वर्षों में मनुष्य की आयु में वृद्धि हुई है। आज का विज्ञान भूल जाता है कि जिसे वह मानव-जाति की प्रगति के रूप में दर्शाता है वे उपभोग एवं धन-अर्जन की लालसा के कारण यूरोप में आरम्भ हुई औद्योगिक-क्रांति के दुष्परिणामों के कारण उत्पन्न हुई कई वेदनाओं, बिमारियों, कष्टों आदि के निवारण हेतु कुछ उपलब्धियां हैं। कुपोषण, पर्यावरण-क्षति, तनावपूर्ण व असंतोषजनक जीवन-शैली, नित नए अस्तित्व में आ रहे असाध्य रोग आधुनिक विज्ञान को आज भी चुनौती दे रहे हैं।


भारत की वैदिक संस्कृति ने प्रकृति से अपने प्रेम, उसके सम्मान को बनाए रखा। उसने प्रकृति से अलगाव नहीं अपितु उसके साथ को अनिवार्य समझा। सौर-मंडल के ग्रह, उनका पृथ्वी व सूर्य से अंतर, नक्षत्रों की स्थिति व गति जैसे जटिल प्रश्नों के उत्तर हमारे सनातन ऋषि-मुनियों ने चिंतन-मनन, ध्यान-समाधि व वैदिक गणित के आधार पर जान लिए थे। हिन्दू पंचांग आज भी गणित के आधार पर ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति उनकी गति, सूर्य- व चंद्र-ग्रहण की तिथि एवं समय आधुनिक वैज्ञानिकों से पहले ही पता लगा लेता है।


यह एक कटु सत्य है कि हिन्दू-धर्म का जो आधुनिक रूप हमें दिखाई देता है वह पाखंड व ढकोसलों से भरा हुआ है। आजकल जो स्वयं को धर्म का ठेकेदार, धर्मगुरु और प्रवचनकर्ता कहने का दम भरते हैं उनमें से अधिकांश वैदिक सनातन-धर्म के मर्म व मूल को जानते ही नहीं हैं, जिस कारण वे अपने अनुयायियों को 'सत्य-मार्ग' नहीं दिखा पाते हैं। इन्हें रामायण, महाभारत, पुराणों, श्रीमद्भागवत की कथाएं व प्रसंग याद हैं जिन्हें ये चटपटी, रसीली भाषा में जनता को सुना कर वाहवाही लूटते हैं। कुछ माह की अवधि वाले पाठ्य-क्रम करने के पश्चात ये ज्योतिषी बन जाते हैं, प्रवचनकर्ता हो जाते हैं और अपने अत्यंत अल्प ज्ञान व चिंतन-मनन के अभाव के कारण शिक्षित, विचारशील, जिज्ञासु समाज में भारत के वैदिक धर्म व उसके विज्ञान की खिल्ली उड़वाते हैं। आज भारत में कितने ही राजनेता, व्यापारी, उच्च-अधिकारी, व्यवसायी ज्योतिषियों के चंगुल में फस कर उँगलियों में रत्न-जड़ित अँगूठियाँ पहनते हैं। दूरदर्शन (टी. वी.) पर ३० सैकेंड में जन्मतिथि पूछ कर जो ज्योतिषी व्यक्ति को अमुक रत्न पहनने का सुझाव देते हैं, वे रत्न-विज्ञान को उपहास का पात्र ही बनाते हैं। रत्नों को धारण करने की परिपाटी है, विधान है जिसका पालन होना चाहिए। रत्नों के विज्ञान को जाने बिना रत्न एक पत्थर ही है और यदि कोई कहे कि पत्थर पहनना 'अंध-विश्वास' है तो इसमें कोई अचरज नहीं होना चाहिए।


ऊँचे भव्य आसनों, व्यासपीठों पर बैठ कर, टी. वी. पर 'धर्म बेचने वाले' धर्मगुरु जनता को भ्रांत, पथभ्रष्ट और अंध-विश्वासी बना रहे हैं। शरीर को तोड़-मरोड़ कर योगासन करवा देना पतंजलि का योग नहीं है। उसके लिए मन-शरीर की शुद्धि, आहार व बुद्धि पर नियंत्रण आदि भी जो ऋषि पतंजलि द्वारा बताए गए हैं वे ये योगाचार्य नहीं बता पाते। आज दुर्भाग्यवश यज्ञ, हवन आदि के लिए शुद्ध सामग्री, गाय का शुद्ध घी, सही समिधा, मंत्रो का शुद्ध उच्चारण करने वाले कर्मकांडी ब्राह्मण हमें नहीं मिलते। ऐसे में यदि हमें कर्मकांड का उचित परिणाम नहीं दिखता तो यह लोगों को ढकोसला, अंध-विश्वास ही प्रतीत होता है। प्राकृतिक विज्ञान के ज्ञाता इसकी पुष्टि करेंगे कि किसी भी प्रयोग का परिणाम प्रयोग में प्रयोग (इस्तेमाल) की गई वस्तुओं की शुद्धता व मात्रा, प्रयोग की विधि एवं प्रयोग-स्थल की पर्यावरण सीमा परिस्थितियों पर निर्भर करता है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हमारी धारणाएँ किसी वैज्ञानिक आधार के बिना नहीं है। हमें उनके वैज्ञानिक आधार को समझना है और भावी पीढ़ियों को समझाना हैं।


हमारे गावों में आज भी फसल आने पर फसल की बाली का निचला हिस्सा पशु को चारे के रूप में दिया जाता है, बालियों से निकले दानों में पक्षियों का भी अंश निकाला जाता है। फसल के दानों से बने आटा को चींटी आदि अन्य कीटों के लिए निकला जाता है। रोटी बनाने के लिए गूंथे आटे का अंश मछली व अन्य जल-जीवों के लिए होता है। पहली रोटी गाय के लिए और एक रोटी कुत्ते के लिए भी होती है। ऐसा करना किसी अंध-विश्वास के कारण नहीं अपितु प्रकृति के साथ मनुष्य के समन्वय व लय बिठाने के उद्देश्य से हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा हमारे पूर्वजों को बताया गया था। यह केवल हमारी वैदिक संस्कृति ही है जहाँ किसी भी पूजा, अनुष्ठान, प्रवचन, हवन आदि के पश्चात यजुर्वेद के 'शांति मंत्र' का उच्चारण होता है (इसे शांति पाठ भी कहा जाता है)। हम प्रार्थना करते हैं कि मानव व प्रकृति के बीच लय, संतुलन व समन्वय बना रहे जिससे इस धरती पर मानव जीवन सरल हो सके। :-


ओ३म् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॥


अर्थ: हे प्रभु इस ब्रह्मांड में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हों, जल में शांति हो, औषध में शांति हो। वनस्पतियों में शांति हो, विश्व में शांति हो, सभी देवतागणों में शांति हो, ब्रह्म में शांति हो, सब में शांति हो, सर्वत्र शांति हो। इस शांति की सदैव वृद्धि हो। प्रभु शांति हो, शांति हो, शांति हो।

(क्रमश …..)

हम न भूलें कि

  • किसी भी विषय को जानने व समझने की जिज्ञासा ही मनुष्य को उस विषय पर शोध करने हेतु प्रेरित करती है।

  • किसी विषय पर ज्ञान व शोध के अभाव में उसके उद्देश्य के निष्कर्ष पर पहुँचना त्रुटिपूर्ण हो सकता है। विषय के कारण, उद्देश्य व परिपाटी का ज्ञान होने पर विषय का आंकलन उचित होगा।

  • किसी उद्देश्य-प्राप्ति हेतु की गई प्रार्थना का महत्त्व उद्देश्य-प्राप्ति के लिए किए गए संभव प्रयत्नों के साथ-साथ है। प्रयत्नों के अभाव में की गई प्रार्थना धरती में बीज बोए बिना फसल की कामना करने के समान हीहै। (देखे: हम न भूलें-प्रार्थना व सुख)

Hinduism - Science or Superstition

Today's Hindu young generation does not understand many of their customs properly and considers them as superstitions because these practices prevalent in the society seem to be illogical, unreasonable and do not satisfy the intelligence of the young generation. As the curiosity, doubts and questions in the minds of the young generation do not get answered, a feeling of indifference and rejection towards the customs and practices starts arising in them. In such a situation, not only these practices, but the whole system associated with them seems like superstition, fraud, hypocrisy, etc. When Hindu religion is 'karm-oriented'(see: Hum Naa Bhooleen- Hindutv and Abrahamic religions) and considers the person responsible for his/her deeds and also for the direct and indirect consequences of those deeds, then every Hindu should have a good understanding of the deeds done by him so that they lead to good results. If our intelligence accepts the reason and purpose of an action, then there is enthusiasm, inspiration and energy within us to complete that work. On the contrary, if the intellect does not understand the purpose of that work, but we still have to do that work due to some reasons, then in such a situation, that work seems like a burden to us. We do that work without interest, wish that the work is done soon and we do not have to do it again.


We have to be familiar with the original form of our Vedic Sanātan Hindu religion. Only then we will be able to understand the science of our beliefs and will be able to tell about it to the coming generations. Vedic religion is the oldest. It is not for any particular caste or society but for the entire human race and is not born due to fear of nature or social conditions. The Veds, Upanishads and Shāstrs contain the experiences of extensive study and research of the deep secrets of nature and the universe done by our sages. This contribution and experience is not the result of a single person, but is the result of contemplation and meditation of many sages, generation after generation. The sages of India did not only study plants, living creatures, the soul, divinity, planets and their constellations, but also knew the effect of all these on human life. We do not get to see such a wide base of knowledge anywhere else in the world. What a person should do and what not, what to eat and what not to eat, what to think and what not to think, all these small and big things have been described in detail in our scriptures. As an example, it was only after a deep study of animals and birds that our sages could introduce many yogāsans for the health benefits of humans, which they named after the respective animal or bird like Kukkutāsan, Mayurāsan, Sarpāsan etc.


Our sages have always taken care that while practicing 'Dharm', the followers of 'Dharm' (see: Hum Naa Bhooleen - Dharmo Rakshati Rakshita) should not do anything which is against the laws of nature. They always emphasized on the coordination and harmony between nature and human in the conduct during every practice following one’s 'Dharm'. Today the reason of the problems of human beings is the breaking off of the chord and harmony with nature and its exploitation. The root cause of many of our current problems is that we have made so many inventions in the name of science and modernity, which have disturbed the balance between human, nature and the universe.


At present, we see motor-vehicles, airplanes, space-rockets, air conditioning devices etc. everywhere. These achievements of science have certainly given happiness to humans, but the sufferings due to the pollution associated with them, the natural disasters occurring in the world due to 'Global Warming' and due to climate changes are also the by-products of these achievements. The human race is talking about the ill-effects of these but very little is done for diagnosis. Today's scientific progress has consumption and wealth-earning increase as its center-point, for which it is even ready to accept opposition from nature. Science today is arrogant and considers itself bigger and more powerful than nature. It claims that it is because of the achievements in the medical field that the life span of humans has increased in the last 100-150 years. Today's science forgets that what it shows as the progress of mankind, is the outcome of the efforts to overcome the pains, diseases, sufferings and other bad effects of the industrial revolution that started in Europe in the 18th century. Malnutrition, environmental damage, stressful and unsatisfactory lifestyle, emerging incurable diseases are challenging modern science even today.


The Vedic culture of India maintained its love and respect for nature. It did not detach itself from nature but considered its bond with it as essential. The planets of the solar system, their distance from the Earth and the Sun, the position and movement of the constellations, our sages found the answers to these complex questions on the basis of contemplation, meditation, samādhi and Vedicmathematics. Even today, the Hindu Panchāng provides information on the motion and positions of planets, constellations, the date and time of solar and lunar eclipses before modern scientists.


It is a bitter truth that the modern form of Hinduism that we see today is full of hypocrisy and deceit. Nowadays, most of those who dare to call themselves religious-gurus, -teachers and -preachers do not know the quintessence and root of Vedic Sanātan-Dharm, due to which they are unable to show the 'true path' to their followers. They know the stories and incidents of Rāmāyan, Mahābhārat, Purāṇs, Shrimadbhāgwat which they narrate to the public in spicy, juicy language to gain applause. After doing a course of a few months duration, they claim to be astrologers, preachers etc. Due to their very little knowledge and lack of contemplation, they ridicule India's Vedic Dharm and its science in the educated, thoughtful, inquisitive society. Today, many politicians, business-people, high-ranking officials and professionals in India are falling in the clutches of such astrologers and wear gemstone-studded rings. An astrologer who asks the date of birth on TV and suggest a person to wear a certain gem within 30 seconds, makes a mockery of gemology. There is a procedure for wearing gems which must be followed. Without knowing the science of gems, a gem is just a stone and if someone says that wearing a stone is 'superstition', then there should be no surprise in it.


Sitting on high grand thrones like seats or pulpits, these 'religion selling' religious leaders on TV are making the public delusional, misguided and superstitious. Making some postures by twisting and tilting the body is not Pātanjali's yog. For that, the needed purification of mind and body, control over diet and intellect, etc. which has been emphasised by Rishi Pātanjali is not told by these Yog teachers. Unfortunately, today we do not find pure material for Yagya, Havan etc., pure cow's ghee, right samidhā and ritualistic priests who recite mantr in pure manner. In such a situation, if we do not see the proper result of a ritual, then it seems to be a gag or superstition to the people. Experts of science will confirm that the result of any experiment depends on the purity and quantity of the substances used in the experiment, the method of the experiment and the environmental boundary conditions of the place of experiment. We need to understand that our beliefs are not without any scientific basis. We have to understand their scientific basis and explain it to future generations.


Even today in our villages, when the crop arrives, the lower part of the stem is given as fodder to the animals and a portion of grain is taken out for birds. A portion of the flour is used to feed ants and other insects. A part of the dough kneaded for making bread is for fish and other water creatures. The first roti is for the cow and one roti is also for the dog. Our forefathers were told to do all this by our sages not because of any superstition but to establish harmony and bond between humans and nature. It is only in our Vedic culture where 'Shānti Mantr' from Yajurved is chanted after any worship, ritual, discourse, havan etc. (this is also called as Shānti Pāth). We pray that there should be harmony and balance between humans and nature for an easy human life on this earth. :-


om dhayu shāntirantrikśhan shāntih, prithvī shāntirāph shāntiroshadhayh shāntih।

vanspatayh shāntirvishve devāh shāntirbrahm shāntih, sarvam shāntih, shāntirev shāntih, sā mā shāntiredhi

om shāntih shāntih shāntih ॥


Meaning: Oh God, may there be peace in this universe, may there be peace in space, may there be peace on earth, may there be peace in water, may there be peace in medicine. May there be peace in the plants, may there be peace in the world, may there be peace in all the devs, may there be peace in the Brahm, may there be peace in all, may there be peace everywhere. May this peace always increase. Oh God let there be peace, peace, peace.


(To continue ….. )

Let us not forget that

  • The curiosity to know and understand any subject motivates a person to research on that subject.

  • In the absence of knowledge and research on any subject, the purpose of the task could be wrongly concluded. Only after knowing the reason, purpose and practices of the subject, the assessment of the subject will be appropriate.

  • The prayers made for achieving an objective can only be effective if there are efforts made to achieve the objective. Prayers done in the absence of efforts are, like wishing for a crop without sowing seeds in the earth. (See: Hum Naa Bhooleen - Prayer and Happiness)

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