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हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (28)

हिन्दुत्त्व व विज्ञान

Hinduism and Science


आज के समय में कई इतिहासकार और विज्ञान के दार्शनिक उन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं और घटनाओं की समीक्षा कर रहे है जिनके कारण 'यूरोपीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान' का उदय कहा जाता है। सभी प्रमुख धर्मों के समर्थकों का उद्देश्य विज्ञान के साथ अपने धर्म के तालमेल की घोषणा करके अपने विश्वास की स्थिति को मजबूत करना है। आधुनिक विज्ञान के निष्कर्ष प्रेक्षणों, अंतर्दृष्टियों, उपकरणों, दार्शनिक दृष्टिकोणों और ज्ञान से उत्पन्न होते हैं जो प्राचीन विश्व में अनुपस्थित थे। अब्रहमिक धर्मों के समर्थकों का तर्क है कि उनके दार्शनिकों और पैगम्बरों के पास तर्क, अंतर-समीकरणों और वैज्ञानिक उपकरणों के स्थान पर दैविक शक्तियाँ थीं।


विज्ञान और धार्मिक ग्रंथों के बीच वास्तविक सामंजस्य के क्षेत्रों की खोज सार्थक है। प्राचीन हिंदू विचारकों ने कभी भी 'विज्ञान' या 'धर्म' (जिसे हम वर्तमान में सिद्धांतों और प्रथाओं के रूप में देखते हैं) के संदर्भ में उस प्रकार बात नहीं करी है जिस प्रकार वर्तमान में हम इस शब्दों का उपयोग करते हैं। सनातन वैदिक हिंदू धर्म सदा से वैज्ञानिक खोजों के साथ सह-अस्तित्व में रहा है। कई आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक विचार जिन्हें प्रायः पूरी तरह से उपन्यास और आधुनिक विज्ञान की तत्कालीन खोजों के रूप में प्रचारित किया जाता है, वास्तव में प्राचीन हिंदू विचारकों के चर्चा के विषय थे। (देखें: हिन्दू होने पर गर्व करें)


जल व वायु के अभाव में इस पृथ्वी पर मानव व जीव-जंतुओं आदि का जीवन संभव नहीं है। किसी भी जीव के जीवन की गुणवत्ता अपरोक्ष अथवा परोक्ष रूप से जल व वायु की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। हम निसंकोच कह सकते हैं कि किसी भी जीव के जीवन पर वातावरण और विशेषकर क्षेत्रीय वातावरण का विशेष प्रभाव होता है। वातावरण की शुद्धि के लिए यज्ञ (हवन) वैदिक संस्कृति में दैनिक दिनचर्या का महत्त्वपूर्ण अंग था। यज्ञ को अग्नि का जलाना और मंत्रोचारण करना मात्र समझना भयानक भूल है।


अग्नि दुर्गंध का पूर्णत: नाश कर देती है। जो भी वस्तु अग्नि में जलाई जाती है, अग्नि उस पदार्थ को अति-सूक्ष्म कणों में परिवर्तित कर देती है। ये सूक्ष्म-कण वायु से भी हल्के होने से वायु में शीघ्र मिल जाते हैं और दूर तक फैलते हैं (व्यापन सिद्धांत)। यज्ञ के समय अग्नि में घी डालने का विशेष महत्त्व है। घी अग्नि के प्रज्वलन के साथ-साथ उसकी उष्णता में भी वृद्धि करता है जो जलाए जाने वाले पदार्थों के विघटन और उनकी सूक्ष्मता में सहायक होती है। यज्ञ में जलाई जाने वाली लकड़ी (समिधा) व अग्नि को अर्पित किए जाने वाले पदार्थों (सामग्री) का चयन सोच-समझ कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही होता था।


भारत की वनस्पति सम्पदा विविध एवं विशाल है। यज्ञ हेतु किसी भी प्रकार की लकड़ी नही अपितु आम्र (आम) वृक्ष की समिधा को ही प्राथमिकता दी जाती है। आम्र-लकड़ी का नमी के प्रति अधिक प्रतिरोध है जिस कारण यह जल्दी सूख जाती है, इसे दीमक आसानी से नहीं लगती। पराबैंगनी विकिरण (यू. वी रेडिएशन) का इस लकड़ी पर अधिक प्रभाव होने से आम की लकड़ी में जीवाणु भी कम होते हैं जिससे इस लकड़ी को स्वास्थ्य व पर्यावरण पर दुष्प्रभाव रहित कहा जा सकता है। वर्तमान में भिन्न-भिन्न रोग-कीटाणुओं, मच्छर आदि हानिकारक जंतुओं के नाश के लिए 'फॉगिंग मशीन' द्वारा भिन्न रसायनों का छिड़काव किया जाता है कि वातावरण शुद्ध हो सके। पुरातन काल में भिन्न-भिन्न जड़ी-बूटियों, पदार्थीं आदि का उनके औषधिक गुणों के कारण समिधा में प्रयोग होता था। वर्षा के लिए यज्ञ में भिन्न खनिज-रसायनों से बनी समिधा की आहुति दी जाती थी जिससे की वातावरण की नमी को बादलों में सिंचित किया जा सके। 'क्लाउड सीडिंग' इसी विज्ञान का आधुनिक रूप है। औषधियों, जड़ी-बूटियों, खनिज-रसायनों, आदि के ये सूक्ष्म कण वायु को शुद्ध करते थे, वर्षा की बूंदों के साथ मिल कर धरती पर जलाशयों, सरोवरों, वनस्पति, कृषि, आदि पर अपना प्रभाव छोड़ते थे।


हमारे ऋषि-मुनियों ने सुखमय मानव-जीवन के लिए मनुष्य व प्रकृति के संतुलन को अत्यधिक महत्त्व दिया है। "वसुधैव कुटुम्बकम्" के सिद्धांत द्वारा उन्होंने जीव-जंतुओं के संरक्षण की बात कही है। मानव जाति के लिए गाय की उपयोगिता (गाय का मल-मूत्र भी उपयोगी है) के कारण उसे अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया गया है। गाय का दूध सरलता से पचता ही नहीं अपितु भैंस, बकरी, भेड़, ऊंट के दूध की अपेक्षा इसी दूध में 'बीटा-कैरोटीन' पाया जाता है जो एक 'एंटीऑक्सिडेंट' हैं और मनुष्य की प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ता है व कैंसर, ह्रदय-रोग से भी सुरक्षा प्रदान करता है। गाय के दूध का पीला रंग भी इसी के कारण है। गौ मूत्र की औषधिक गुणवत्ता है। घरों में गोबर का लेप (इसमें गौ-मूत्र मिलाया जाता है) किया जाता था कि घर केवल ठंडा ही न रहे अपितु लेप की गंध (मनुष्य इसे अनुभव भी नहीं करता) कई कीट-पतंगों को दूर रखती थी। गोबर से खाद, ईंधन आदि के उपयोग हम सभी जानते हैं।


पीपल व बरगद के वृक्ष घर के बाहर प्राणवायु (ऑक्सीजन) के अच्छे स्रोत हैं। घर पर भी प्राणवायु के स्रोत के रूप में तुलसी का पौधा लगाने को कहा गया है। घरेलु औषधि के रूप में सभी इससे परिचित हैं। इसके पत्तों में कुछ मात्रा में पारा (मर्करी) होता है। पारा दांतों पर लगने से दांतों के लिए हानिकारक हो सकता है अत: तुलसी के पत्तों को चबाया नहीं जाता अपितु पूरा निगला जाता है।


पारा की भस्में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में उपचार के लिए प्रयोग की जाती हैं। आयुर्वेद सोना, चाँदी, मोती आदि की भस्मों को औषधि के रूप में प्रयोग करता है। भारत में सोना व चाँदी के वर्क वाले मिष्ठान आज भी प्रचलित हैं। ऐलोपैथी चिकित्सा पद्धति अभी भी ऐसी कितनी ही वस्तुओं के उपयोग की गुणवत्ता को स्वीकार नहीं करती।


चातुर्मास के समय (श्रावण, भाद्रपद, आश्‍विन और कार्तिक के चार महीनों की अवधि) मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है परन्तु धर्म-कर्म और दान-पुण्य के लिए चातुर्मास का समय अनुकूल माना जाता है। इसके पीछे इन मासों की ऋतुजनित परिस्थितियाँ हैं। सावन और भादों माह (श्रावण वभाद्रपद) में बारिश अधिक होती है जिस कारण कहीं आना-जाना कठिन हो जाता है। साधु-सन्यासी, महात्मा, ब्राह्मण, आदि ज्ञान-प्रचार के लिए बाहर नहीं जाते थे अपितु मंदिरों, आश्रमों व शिविरों में ही रहते थे। ऋतुपरिवर्तन के कारण पाचनशक्ति कमजोर होती है तथा भोजन और जल में जीवाणुओं की संख्या बढ़ जाती है। इन महिनों में आहारशुद्धि रखने की बाध्यता उत्पन्न हो जाती है। इस समय फलाहार अधिक परन्तु पत्तेदार सब्जियां, दूध, शक्कर, दही, तेल, बैंगन, नमकीन या मसालेदार भोजन, मिष्ठान का सेवन न्यून रखना उचित रहता है। श्रावण-भाद्रपद समाप्त होते ही शरद् ऋतु आरंभ हो जाती है। अब आवागमन सुगम हो जाता है तथा इस ऋतु में भूख अधिक लगती है और भोजन शीघ्र पच जाता है। आश्विन में भोजन पर श्रावण मास जैसा प्रतिबंध नहीं होता। इसलिए भादो माह के तुरन्त पश्चात आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक पंद्रह दिन पितृपक्ष का विधान किया गया है। सनातन परंपरा के व्यक्ति केवल अपने रक्त संबंधियों को अपना पूर्वज नहीं कहते अपितु श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि को जिस प्रकार वे अपना पूर्वज मानते हैं उसी प्रकार संत-महात्माओं में भी अपने पूर्वजों की छवि के दर्शन करते हैं। पितृपक्ष में मर चुके व्यक्तियों की स्मृति में अपने पितर तुल्य साधु-सन्यासी, ब्राह्मण व्यक्तियों की सेवा के पुण्य कर्म का आयोजन किया जाता है व उन्हें भोजनादि द्वारा तृप्ति प्रदान कर पितृ ऋण और ऋषि ऋण का अल्पांश उतारने का प्रयास किया जाता हैं। (देखें: हिन्दुओं के १६ संस्कार - भाग (६/९))


हमारी हिन्दू जीवन शैली में प्राचीन काल से ही बहुत सी प्रथाएं हैं जो वर्तमान में भी अपने पुरातन अथवा अपभ्रंश रूप में हिन्दुओं द्वारा जी जा रही हैं। यह दुःख की बात है कि बहुत सी प्रथाओं के उद्देश्य आज समाज को पता नहीं हैं और समाज का एक वर्ग उन्हें जानने की इच्छा भी नहीं रखता। वह वर्ग जो वैदिक प्रथाओं, हिन्दू मान्यताओं के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जानने की इच्छा रखता है वह उनकी जिज्ञासा को शांत करने वाले उत्तर न पाकर हताश हो जाता है। यह चिंता का विषय है कि वर्तमान में समाज में प्रथाओं को उनके मूल कारण व उद्देश्य हेतु जीने के स्थान पर प्रथाओं से जुड़े समारोहों के भव्य आयोजनों पर बल दिया जा रहा है। यह दिखावे की नई परिपाटी और इसके कारण परिवारों, समाजों, संस्थानों, आदि के बीच की होड़ त्याग, समर्पण, परोपकार जैसे संस्कारों के स्थान पर अहंकार, ईर्ष्या, निम्न-श्रेष्ठ जैसी भावनाओं को स्थापित कर रही है।


आज समाज में ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो जिज्ञासुओं के प्रश्नों के उत्तर दे उन्हें संतुष्ट करें न कि रसीली बातें सुना कर अपना अनुयायी बना कर धन लेने की सोचे।


हम न भूलें कि

  • ऐसा व्यक्ति जो आपकी जिज्ञासाओं को शांत कर सके, आपको स्वयं खोजना होगा।

  • जिज्ञासा-शांति हेतु मिले उत्तरों को आप अपने पूर्व-ज्ञान की कसौटी पर ही परख सकते हैं।

  • विषय का ज्ञान न रखने वाले लोग आपकी जिज्ञासा को शांत करने के स्थान पर अपनी मिथ्या बातों से आपको भ्रमित करने का प्रयास करेंगे।

  • जिज्ञासा-शांति के लिए हम सार्थक प्रश्न करें व विवाद अथवा कुतर्कों में न पड़ें।

  • शांत मन ही एकाग्रता से लक्ष्य-प्राप्ति के लिए बढ़ता है।

Hinduism and Science

Today, many historians and philosophers of science are reviewing the historical processes and events that led to what is called the rise of the 'European Enlightenment and Modern Science'. Proponents of all major religions aim to strengthen the position of their faith by proclaiming their religion's harmony with science. The findings of modern science arise from instruments, insights, observations, philosophical attitudes and knowledge that were absent in the ancient world. Proponents of the Abrahamic religions argue that their philosophers and prophets had divine powers instead of logic, reasoning, and scientific instruments.


The search for areas of genuine harmony between science and religious texts is worthwhile. Ancient Hindu thinkers never spoke in terms of 'science' or 'dharm' (what we currently see as doctrines and practices) in the way we currently use these words. Sanātan Vedic Hinduism has always co-existed with scientific discoveries. Many spiritual, philosophical and scientific ideas which are often promoted as completely novel and recent discoveries of modern science were actually the topics of discussion of ancient Hindu thinkers. (See: Be proud to be a Hindu)


In the absence of water and air, the life of humans and animals etc. is not possible on this earth. The quality of life of any living being directly or indirectly depends on the quality of water and air. We can say without hesitation that the environment and especially the regional environment has a special effect on the life of any living being. Fire ritual (Yagy or Havan) was an important part of the daily routine in Vedic culture for the purification of the atmosphere. It is a big mistake to consider 'Yagy' only as lighting fire and chanting mantras.


Fire destroys the bad smell completely. Whatever object is burnt in the fire, the fire converts that substance into ultra-fine particles. These micro-particles, being lighter than air, mix quickly in the air and spread far and wide (diffusion principle). Pouring clarified butter (Ghee) in the fire at the time of 'Yagy' has special significance. Along with the ignition of the fire, 'Ghee' also increases its heat, which helps in the disintegration and subtlety of the substances being burnt. The wood (Samidhā) to be burnt in the 'Yagy' and the materials (Sāmagrī) offered to the fire were carefully selected from a scientific point of view.


The flora of India is diverse and vast. Not any kind of wood is given priority for 'Yagy', but only the 'Samidhā' of Mango tree. Mango-wood has high resistance to moisture due to which it dries quickly and furthermore it is not easily attacked by termites. Due to the high effect of ultraviolet (UV) radiation on this wood, bacteria in mango wood are also reduced, due to which this wood has no negative side effects on health and environment. At present, chemicals are sprayed through 'fogging machines' to kill off harmful bacteria, germs, mosquitoes and different insects, causing different diseases, so that the environment can be purified. In ancient times, different herbs, substances etc. were used in 'Samidhā' because of their medicinal properties. In 'Yagy' for rain, 'Samidhā' made of different mineral and chemicals was used so that the moisture of the atmosphere could be aggregated in the clouds. 'Cloud seeding' is the modern form of this science. These microscopic particles of medicines, herbs, mineral, chemicals, etc. used to purify the air, together with the raindrops and used to leave their impact on the reservoirs, lakes, vegetation, agriculture, etc. on the earth.


Our sages have given utmost importance to the balance of humans and nature for a happy human life. By the principle of "Vasudhaiv Kutumbakam" our sages have talked about the protection of living beings. Due to the usefulness of cows for mankind (cow's excreta and urine is also useful), it has been given more importance than other living beings. Cow's milk is not only digested easily, but in comparison to the milk of buffalos, goats, sheep and camels, 'ß-Carotene' is only found in this milk. 'ß-Carotene' is an 'antioxidant' and increases the immunity power of humans and provides protection against cancer and heart-diseases. The yellow color of cow's milk is also due to it. Cow urine has medicinal qualities. Cow dung coating (cow urine is mixed in it) was done in the houses so that the house not only remained cool but also the smell of the coating, which humans do not even smell, used to keep away many insects and moths. We all know about the use of manure, fuel etc. from cow dung.


Pēpal and Banyan trees are good sources of oxygen (Pranavayu) outside the house. Tulsi plant has also been asked to be planted at home as a source of vital air. Everyone is familiar with it as a home medicine. Its leaves contain some amount of mercury. Contact of mercury with the teeth can be harmful to them hence Tulsi leaves are not chewed but are swallowed whole.


Mercury ashes are used for treatment in Ayurved medicine. Ayurved uses ashes of gold, silver, pearls etc. as medicine. Fine gold and silver foils (Vark) on sweets are still popular in India. Allopathy medical system still does not accept the use of many such substances.


At the time of 'Chaturmās' (the period of four months of Shrāvan, Bhādrapad, Ashwin and Kārtik) auspicious works are avoided, but this period of 'Chaturmās' is considered favorable for religious work and charity. The reason behind this are the seasonal conditions during these months. It rains more in the months of Shrāvan and Bhādrapad (also called as Sāwan and Bhādō), due to which it becomes difficult to travel anywhere. Sādhus-Sanyāsis, Mahātmās, Brāhmins, etc. did not go out for spreading knowledge, but stayed in temples, āshrams and camps. Due to the change of season, the digestive power becomes weak and the number of bacteria in food and water increases. In these months, compulsion arises to keep diet clean. At this time, it is appropriate to keep a high intake of fruits whereas the consumption of leafy vegetables, milk, sugar, curd, oil, salty or spicy food and sweets should be kept as low as possible.


Autumn starts as soon as Bhādrapad month ends. Now the movement becomes easy. The appetite is high in this season and the food gets digested quickly. There is no restriction on food in the month of Ashwin as during Shrāvan. That's why, immediately after the month of Bhādō (from Ashwin month’ Krishn-Paksh Pratipadā to Amāvasyā (fortnight)), there is a ritual of 'Pitrupaksh' for fifteen days. The people of 'Sanātan' tradition do not only call their blood relatives their ancestors, but like Shri Ram, Shri Krishna etc. they also call their saints and mahātmās their ancestors. During the period of 'Pitrupaksh', the serving of Brahmins and ascetics is organized. This is done because people believe to reach their dead ancestors through this way and pay off a small part of ancestral debt and sage debt. (See: 16 Sanskars of Hindus - Part (6/9))


There are many practices in our Hindu lifestyle since ancient times, which are still being followed by Hindus in their old or deformed way. It is a matter of sadness that today the purpose of many practices is not known to the society and a section of the society does not even wish to know them. The section of society which wishes to know the scientific approach to Vedic practices and Hindu beliefs, gets frustrated by not getting answers that satisfy their curiosity. It is a matter of concern that instead of following the practices for their original reason and purpose, in the present society emphasis is being laid on the grand events of the ceremonies related to these practices. This new pattern of show-off has given birth to competition between families, societies, institutions, etc. and therefore is generating feelings like ego, jealousy, inferior-superior instead of sacrifice, dedication and altruism.


Today there is a need of people in the society, who can answer the questions of the curious and satisfy them, instead of making them their followers to gain fame and wealth by telling them sweet stories.


Let us not forget that

  • You have to find yourself the person who can satisfy your curiosity.

  • Only on the basis of your prior knowledge you can judge the correctness of answers given to your curiosity.

  • People without knowledge of the subject will try to mislead you with their lies instead of calming your curiosity.

  • We should ask meaningful questions to satisfy our curiosity and not get into disputes or arguments.

  • Only a calm mind moves with concentration to achieve the goals.

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