हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (02)

शिक्षा व बुद्धिमत्ता / Education & Intelligence



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यदि आप समाज में किसी भी व्यक्ति से, जिसकी छोटी संतान हो, उसकी इच्छाओं के संबंध में पूछेंगे तो एक इच्छा जो सभी व्यक्त करते हैं, चाहे वे निर्धन हों या धनी, शिक्षित हों अथवा अशिक्षित, है कि:

बच्चे अच्छे से पढ़-लिख जाए और अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ


सभी अभिभावक अपनी संतानों के लिए शिक्षा की अभिलाषा रखते हैं व चाहते हैं कि उनकी संतान अच्छी शिक्षा प्राप्त करे।


समाज का प्रत्येक वर्ग यह चाहता है कि उसकी अगली पीढ़ी अपने पैरों पर खड़ी हो, उससे अधिक धनी, प्रतिभाशाली व सामर्थ्यवान हो जिसके लिए वह शिक्षा को इस लक्षयपूर्ति का साधन मनाता है।


वर्तमान में, जब हम शिक्षा के बारे में बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में स्कूल या कॉलेज का विचार आता है। हम आज स्कूलों में पढ़ाए जा रहे विषयों जैसे: भाषा, गणित, इतिहास, भूगोल, भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, वाणिज्य, कला आदि के बारे में सोचते हैं। शिक्षा प्राप्त करना हम इन विषयों का ज्ञान प्राप्त करना समझते हैं। विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद परीक्षा में भाग लेना और उसमें सफल होना। विद्यालय आदि समाप्त करने के बाद एक दिन हमें सर्टिफिकेट (डिग्री) मिलेगा और फिर हम कुछ व्यवसाय अपना सकते हैं और धन कमा सकते हैं। इसके अतिरिक्त संभवत: कोई अन्य विचार हमारे मस्तिष्क में नहीं आता है।


बहुत से लोग व्यवसायिक जीवन में होते हुए भी इस भावना के साथ और अधिक शिक्षा ग्रहण करते हैं कि इस अधिक शिक्षा से उनके लिए अधिक धन अर्जन के नए अवसर खुल सकते हैं। उन्हें अपनी नौकरी में पदोन्नति मिल सकती है या वर्तमान से अधिक आय वाला अच्छा व्यवसाय मिल सकता है।


शिक्षा हमारे लिए धन कमाने की सीढी है और हम मानते हैं कि धन होने से हम सुखी हो सकते हैं।


क्या आज वे लोग जिन्होंने शिक्षा ली और धन कमा अपने पैरों पर खड़े हैं, सुखी हैं?


संभवत: बहुत ही कम लोगों का उत्तर "हाँ" होगा।


'पर्याप्त धन का न होना' कुछ लोगों के सुखी न होने का कारण हो सकता है पर अधिकांशत: लोग शिक्षित होने पर भी और शिक्षानुसार व्यवसाय में धन मिलने पर भी अपने व्यवसायिक जीवन से सुखी नहीं दिखेंगे। विद्यार्थी भी विद्या अर्जन करते हुए संतुष्ट नहीं दिखेंगे। व्यवसायिक जीवन हो अथवा विद्यार्थी जीवन 'तनाव' दोनों को ग्रस्त किए हुए है। आप पाऐंगे कि पश्चिमी दुनिया में ऐसा नहीं है। ऐसा क्यों?


तनिक चिंतन करेंगे तो आप पाऐंगे की यह सब सही शिक्षा न मिलने के कारण है। जब हमने शिक्षा धन कमाने के उद्देश्य से ली, धन कमाना ही अपने पैरों पर खड़ा होना समझा, तो हमने इसके अतिरिक्त जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना कैसे करना है, यह सीखा ही नहीं। जब शिक्षा पाकर उससे धन कामना ही उद्देश्य था तब शिक्षा स्वयं एक व्यवसाय बन गई।


आज शिक्षा सार्वभौमिक न हो कर ‘व्यवसायिक शिक्षा’ तक ही सिमट कर रह गई है। परीक्षा में अधिक से अधिक अंक पाना कुशलता का मापदंड है। जिस छात्र के अधिक अंक हैं वह अधिक बुद्धिमान है ऐसा माना जाता है। हमारे शैक्षिक संस्थान की पढाई छात्र की बुद्धिमत्ता बढाती है और उसे व्यवसायिक स्पर्धा में दूसरों से आगे ले जाती है ऐसा दिखाने के लिए ये शैक्षिक संस्थान बौद्धिक भाव (आइ क्यू) के विकास पर जोर देते हैं। अधिक आइ क्यू अर्थात अधिक बुद्धिमत्ता। अधिक आइ क्यू के लिए अभिभावक अधिक शुल्क भी देने को तैयार रहते हैं जिससे इन संस्थानों की आय में अवश्य वृद्धि होती है।


मनोवैज्ञानिकों अनुसार बुद्धिमत्ता (ईन्टेलिजैंस) के चार भाग है:-

१) बौद्धिक भाव (आइ क्यू)

२) भावनात्मक भाव (इ क्यू)

३) समाजिक भाव (एस क्यू)

४) प्रतिकूल भाव (ए क्यू)


बौद्धिक भाव (ईन्टेलिजैंस कोषियेंट) आपके समझने की क्षमता का माप है। जैसे की आप गणित के प्रश्नों को कैसे हल कर सकते हैं, आप कैसे विषयों को याद कर सकते है, कितना स्मरण कर सकते है, यह आइ क्यू बताता है।


भावनात्मक भाव (ईमोश्नल कोषियेंट) आपके कौशल, कि आप अन्य लोगों के साथ कैसे समन्व्य बनाते है, कैसे शान्ति बनाए रखते है, आप जीवन मे समय को कितना महत्त्व देते है, आपके लिए दायित्त्व का अर्थ क्या है, उसका कितना महत्त्व है, को दर्शाता है। आपकी सत्यता, ईमानदारी, सीमाओं व नियमों का सम्मान, विनम्रता, वास्तविकता (दिखावा नही), विचारशील होने की क्षमता का माप है यह भावनात्मक भाव।


समाजिक भाव (सोशल कोषियेंट) आपके मित्र बनाने कि कुशलता और उस मित्रता को लम्बे समय तक बनाए रखने की क्षमता का माप है।


जिन लोगों के पास भावनात्मक भाव व समाजिक भाव अधिक होता है वे उन लोगों की अपेक्षा जिनके पास बौद्धिक भाव अधिक परन्तु भावनात्मक भाव व समाजिक भाव कम होता है, जीवन मे नए अवसर बनाते है, नए शिखरों को प्राप्त करते हैं। आज विद्यालय बौद्धिक भाव के विकास पर केन्द्रित है और भावनात्मक भाव व समाजिक भाव को विकसित करने का, बढाने का प्रयास ही नही किया जाता। परिक्षा मे मिले अंक बौद्धिक भाव को दर्शाते है और आज बस अधिक से अधिक अंक पाने की होड है।


कितने प्रतिशत अधिक बौद्धिक भाव वाले विद्यार्थी अपना स्वयं का व्यवसाय आरम्भ करते है? अपनी कम्पनी, उद्योग आरम्भ करते है, बडे विचारक, शोधकर्ता, वैज्ञानिक बनते है? बहुत कम।


चौथी प्रकार की बुद्धिमत्ता है: प्रतिकूल भाव (ऐढवर्सिटी कोषियेंट)। यह आपके प्रतिकूल परिस्तिथियों मे से अपना संतुलन खोए बिना बाहिर निकलने की, प्रतिकूल परिस्तिथियों पर विजय पाने की क्षमता का द्योतक है। यह प्रतिकूल भाव मनोवैज्ञानिकों को यह जानने मे मदद करता है कि कौन विष्म परिस्तिथियों के आगे घुटने टेक देगा, कौन अपने शुभचिंतकों, मित्रों, परिजनों का, यहाँ तक कि परिवार का साथ छोड देगा।


हम न भूलें कि


  • बौद्धिक भाव (आइ क्यू) आपको जब तक आप किसी शैक्षिक संस्थान मे शिक्षा ग्रहण कर रहे है अग्रिम पंक्ति मे रख सकता है परन्तु जीवन मे अग्रिम पंक्ति मे रहने के लिए बौद्धिक भाव के साथ-साथ भावनात्मक भाव (इ क्यू) व समाजिक भाव (एस क्यू) का होना अनिवार्य है।

  • आपको अधिक बौद्धिक भाव वाले व्यक्ति उन लोगों के पास काम करते मिल जावेंगे जिनके पास बौद्धिक भाव तो कम है परन्तु भावनात्मक भाव व समाजिक भाव अधिक है।

  • आपका भावनात्मक भाव आपके चरित्र को दर्शाता है और समाजिक भाव आपकी प्रतिभा का सूचक है। हमें इन तीनों भावों को विकसित करना है और विशेषकर भावनात्मक भाव व समाजिक भाव को।

  • भावनात्मक भाव व समाजिक भाव व्यक्ति को दूसरों की अपेक्षा कार्यों को भली प्रकार प्रबंधित (मैनेज) करने योग्य बनाते है, श्रेष्ठ बनाते है।

  • बच्चों की शिक्षा मे माता-पिता को बौद्धिक भाव के विकास पर ही जोर नही देना चाहिए अपितु भावनात्मक भाव व समाजिक भाव के विकास पर अधिक ध्यान देना चाहिए। उनका अपने बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार, ऐसा आचरण होना चाहिए कि इन तीनों भावों का विकास हो।

  • हमारे जीवन मे सदा अनुकूल परिस्तिथियाँ नही होती अत: हमारा प्रतिकूल भाव (ए क्यू) भी उच्च श्रेणी का हो यह हमारा संकल्प व उद्देश्य होना चाहिए। आपका अच्छा भावनात्मक भाव व समाजिक भाव अवश्य ही आपके प्रतिकूल भाव को अच्छा रखेगा।

  • बच्चे बहु-प्रतिभावान बनें, स्वतंत्र बनें, अपने निर्णय लेने मे सक्षम बनें।

  • अभिभावक अपनी संतानों के लिए एक सुगम मार्ग न तैयार करें अपितु अपनी संतानों को मार्ग के लिए तैयार करें। संतान विद्यालय की, विश्व-विद्यालय की शिक्षा तो घर के सुरक्षित वातावरण मे ले सकती है परन्तु व्यवसाय के लिए, जीवन-यापन के लिए संतान को बाहिर जाना होगा और तब उस मार्ग पर अनेकों कठिनाइयाँ होंगी जिन्हें उनकी संतानों को अकेले ही पार करना है।

  • जिन व्यक्तियों में बौद्धिक-, भावनात्मक-, समाजिक- व प्रतिकूल-भाव उन्नत होगा उनमें हर परिस्थिति का सामना करने का आत्म-विश्वास होगा और उनका सफल होना निश्चित है।


Education & Intelligence

ऊपर


If you ask any person in the society who has small children, about his wishes, then a wish that everyone will express whether the person is poor or rich, educated or uneducated is:

the children should get good education and be able to stand on their own feet


All parents desire best education for their children.


Every section of the society wants its next generation to stand on its feet, to be wealthier, talented and capable. They believe education is the tool to achieve this goal.


Presently, when we talk about education, the thought of school or college comes in our mind. We think about the subjects being taught in schools today like: language, mathematics, history, geography, physics, chemistry, biology, commerce, arts etc. With getting education we understand getting knowledge of these subjects. After gaining knowledge, to go through an exam and be successful in it. After finishing school, college one day we will get a certificate (degree) and then we can pursue some profession and earn money. Apart from this, there is probably no other thought that comes in our mind.


Many people although in profession try to educate themselves further with the feeling that this may open new opportunities for them to earn more, they may get promoted in their job or may get a better job than today.


We believe that education is the ladder for earning money and by getting wealthy we can be happy.


Are those people who got educated, earn money today and are on their feet, happy?


Probably a very few will answer "yes".


'Lack of sufficient funds' may be the reason for some people for not being happy, but majority will not be happy with their professional life even if they are educated and earn money as per their educational qualification. Students also seem to be unsatisfied while taking education. Be it professional life or student life, both suffer from ‘STRESS’. You will find that this is not the case in the Western world. Why so?


On taking a deeper look you will find that this is due to lack of proper education. When our purpose of taking education is to earn money and earning money is understood as standing on own feet, then we do not learn other skills to overcome the difficulties in life. When the aim is to earn money by getting education, education itself becomes a business.


Today education is not universal but is confined to 'vocational education'. Achieving maximum marks in the exam is a criteria of efficiency. The student with higher marks is considered more intelligent. The educational institutions emphasise the development of intelligence quotient (IQ) to highlight that the education of a student in their institution will increase the student’s intelligence and will place him ahead of others in professional competition. Higher the IQ, higher the intelligence. Parents are also willing to pay more fees for higher IQ, which surely increases the income of these institutions.


According to psychologists, intelligence has four parts: -


1) Intelligence quotient (IQ)

2) Emotional quotient (EQ)

3) Social quotient (SQ)

4) Adverse quotient (AQ)


Intelligence quotient (IQ) is the measure of your ability to understand. How you can solve mathematical problems, how you can memorize subjects, how much you can remember.


Emotional quotient (EQ) is the measure of your ability to be in harmony with other people, to maintain peace, how much importance you give to time in life, what is the meaning of obligation to you and how much does it matter. This is the measure of your truth, honesty, boundaries, respect for rules, humility, genuineness (not showing off) and the ability to be thoughtful.


Social quotient (SQ) is a measure of your skill to make friends and the ability to maintain that friendship over a long period.


People who have higher emotional- and social-quotient than those who have higher intellectual quotient but less emotional- and social-quotient, create new opportunities in life, achieve new peaks. Today, the schools are focused on the development of intelligence quotient and there is hardly any attempt to develop emotional- and social-quotient. The marks obtained in the examination reflect IQ and today there is a race to get maximum marks.


What percentage of students with higher IQ start their own business? Start own company, industry, become big thinkers, researchers, scientists? A very small.


Adversity Quotient (AQ) is the measure of your ability to go through a rough patch in life and come out without losing your mind. AQ determines who will give up in face of troubles and may abandon well-wishers, friends and even their families.


Let us not forget that


  • IQ can keep you in the front line as long as you are taking education in any educational institution, but to be in the front line in life, it is necessary to have social- and emotional-quotient as well.

  • You will find people with higher IQ working for those who may have lower IQ but have higher EQ and SQ.

  • Your emotional quotient reflects your character and your social quotient is an indicator of your talent. We have to develop all three and especially the emotional- and social-quotient.

  • EQ and SQ make a person manage tasks better than others and thus make him superior.

  • During the education of children, parents should not only insist on the development of IQ but should focus more on the development of emotional sentiment and social sentiment. They should behave in such a way with their children, that children become emotionally strong and socially competent.

  • In course of our life there are not always favorable conditions, hence our adversity quotient, our ability to get out of adverse situations should also be of high order. Your good emotional sentiment and social sentiment will definitely keep your adversity quotient high.

  • Children should become multi-talented, independent and must be able to make their own decisions.

  • Parents should not prepare a smooth road for their children, but should prepare their children for the path. The children can take school or university education in a safe environment at home, but for profession and for living, the children will have to go out of this safe environment and then there will be many difficulties on the path which they will have to overcome alone.

  • Individuals who have high intellectual-, emotional-, social- and adversity quotient will have the self-confidence to face any situation and they are sure to succeed.


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