हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (12)

करियर अथवा सक्षम / Career or Capable

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अंग्रेज भारत में ऐसी शिक्षा नीति लाए जिससे भारतीयों में हीनता की भावना आए और अंग्रेजों ने ऐसी कार्य-प्रणाली स्थापित की जिससे उनका अधिपत्य सदृढ़ हो सके। (देखे: हम न भूलें-11)


भारतीय व्यक्तियों के लिए अंग्रेजों के लिए काम करना उन्हें अंग्रेजों के पास आने का अवसर प्रदान करता था और उनका विश्वास पा, उनकी चापलूसी कर वह भारतीय अफसर बन कर अंग्रेजों की भाँति अन्य लोगों पर हुकूमत चला सकता था, अपना रौब दिखा सकता था जिससे उसकी हीन भावना नष्ट होती थी। अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए अंग्रेज भी योग्यता के स्थान पर अंगेजों के प्रति व्यक्ति की निष्ठा को अधिक महत्त्व देते थे। अंग्रेजों के लिए नौकरी करना प्रतिष्ठा की बात बन गई और 'बड़े-साहब', 'लाट-साहिब' आदि के लिए काम करना और "बड़े-बाबू" बन जाना व्यक्ति को हीन भावना से बचाता था। आज भी भारत में 'अंग्रेजी', 'गोरी-चमड़ी', 'पश्चिमी' की लालसा व उसका सम्मान एक भारतीय की मनोदशा को दर्शाता है कि वह अभी भी स्वयं को इन सब से स्वतंत्र नहीं कर पाया है (यह भाग्य कि विडंबना है कि हम आज भी उसी शिक्षा पद्धति का पालन कर रहे हैं जो अंग्रेजों ने निर्धारित की थी)।


दुर्भाग्यवश, आज भी भारतीय समाज की यह मानसिकता है कि लोग आजीविका कमाने के लिए व्यवसाय के भिन्न अवसरों की तलाश नहीं करते हैं। वे शासन से ऐसी व्यवस्था की मांग नहीं कर रहे हैं जिसमें वे अपने लिए नए अवसर पैदा कर सकें, आत्मनिर्भर बन सकें। समाज आज भी नौकरी की ही मांग करता है।


युवाओं की एक बड़ी महत्वाकांक्षा है कि वे 'करियर' बनाए। उनका 'करियर' अच्छा हो। उनके 'करियर' की अभिलाषा का एक मुख्य उद्देश्य होता है 'अधिक धन कमाना' पर साथ-साथ अपने नीचे कर्मचारियों का होना, उनका दायित्त्व लेना, यह उन्हें अपने परिचित समाज में प्रतिष्ठा भी दिलवाता है जो उनका एक और उद्देश्य होता है। जिसके नीचे जितने कर्मचारी, वह उतना ही बड़ा अफसर और उसकी उतनी ही अधिक प्रतिष्ठा। इन युवाओं में बहुत ही कम ऐसे होते हैं जो इस भावना से शिक्षा ग्रहण करते है कि वे स्वावलंबी व सक्षम बने तथा अन्य लोगों के लिए व्यवसाय के अवसर पैदा करें।


ऑक्सफ़ोर्ड व कैंब्रिज के अंग्रेजी शब्दकोष के अनुसार 'करियर' जीवन के एक लम्बे, सार्थक समय के लिए और प्रगति के अवसरों के साथ किया गया व्यवसाय है।


आज के परिपेक्ष में "करियर" को अधिकांशत: एक उद्योग या क्षेत्र के भीतर संबंधित नौकरियों के अनुक्रम के रूप में देखा जाता है जिसमें हर नौकरी के साथ वेतन व / अथवा दायित्त्व बढ़ता है।


व्यक्ति अधिक से अधिक धन अर्जन करना चाहता है क्योंकि वह मानता है कि धन से वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है और सभी सुख पा सकता है। (इच्छाएँ, धन व सुख: अन्य लेख में) अच्छे करियर के लिए कर्मचारियों का दायित्त्व लेना है यह भाव तो इस उद्देश्य से होने चाहिए कि दायित्त्व मिलने पर व्यक्ति ऐसी व्यवस्था करे कि उसके नीचे काम करने वाले कर्मचारी ऐसा अनुभव न करें कि उनका शोषण हो रहा है अपितु वे अपने को अधिक समर्थ, निर्णय लेने में अधिक स्वतंत्र होता अनुभव करें। परन्तु ऐसा हो नही पाता चूँकि 'करियर' की इच्छा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण होता है की उसके ऊपर का अधिकारी उससे सदैव प्रसन्न रहे जिससे उसे नए पद के लिए नए अवसर मिलते रहें एवं वेतन में भी वृद्धि होती रहे।


करियर की अभिलाषा में कितने ही लोग तनाव का शिकार हो जाते है। वे ऊपर के अधिकारियों को प्रसन्न करने के लिए अपने नीचे कार्य करने वालों के 'अप्रिय' हो जाते हैं। धन व परिचित समाज में प्रतिष्ठा मिल जाने पर भी यह ‘करियर’ इन्हें बोझ लगने लगता है पर ये सदैव ऐसा समझते हैं कि जब ये अपने से ऊपर के अधिकारी समान हो जाऐंगे तो इनके पास अधिक ताकत होगी और ये अपनी इस कठिन स्थिति से बाहर आ जाऐंगे। परन्तु ऐसा होता नहीं क्योंकि इन्हें अपनी स्थिति से संतुष्टि नही होती चूँकि दूसरा व्यक्ति इन्हें अपने से सुखी दिखता है। अधिक, और-अधिक की मर्ग-तृष्णा में जीवन-व्यवसाय के समन्वय का संतुलन बिगड़ जाता है।


यदि आप सक्षम बनने के लिए प्रयास करते हैं, तो आप अपने भीतर कठिन परिस्थितियों में भी अवसर उपजाने के गुण विकसित करेंगे। आप अपने भीतर ऐसा आत्म-विश्वास (अति आत्म-विश्वास नही) उत्पन्न करेंगे कि समस्या समाधान में आपका नेतृत्व उदाहरणार्थ होगा। आपका आत्म-विश्वास आपको कभी ऐसा बोध नहीं होने देगा कि आप अकेले हैं। आत्म-विश्वास आपके भीतर कभी भी ईर्ष्या का भाव नहीं आने देगा। ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है और यह तभी होती है जब आप स्वयं को अपने ही मन द्वारा रची हुई प्रतिस्पर्धा में दूसरों से पिछड़ा हुआ पाते हैं। आपका ज्ञान, आपका आत्म-विश्वास आपको सक्षम बनाऐंगे, आपके भीतर उत्साह का सृजन करेंगे जो आपको सफल बनाऐगा।


उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।

सोत्साहस्य च लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥

वाल्मीकि रामायण (किष्किन्धा काण्ड, १ / १२१)


अर्थ: उत्साह श्रेष्ठ पुरुषों का बल है, उत्साह से बढ़कर और कोई बल नहीं है। उत्साहित व्यक्ति के लिए इस लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।


केवल किन्हीं विषयों की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर लेना ही आपको उन विषयों का ज्ञानी नहीं बना देता, आपको सक्षम नहीं बनाता। परीक्षा में सफल होना आपके सक्षम बनने के लक्ष्य की ओर मात्र एक कदम है।


आपकी सक्षमता आपकी प्रगति का मार्ग स्वयं बनाएगी। आप समस्या-निवारक बनना चाहते है न कि मात्र अपने उच्च-अधिकारीयों के आदेशों, उनकी नीतियों का पालन करवाने वाले। सक्षम बनने के लिए आपको उद्यम तो करना ही होगा परन्तु इस उद्यम का उद्देश्य, समस्या-समाधान हेतु, कार्य-पूर्ति हेतु नेतृत्व व दायित्व लेना होगा। आपका आत्म-विश्वास आपको कदाचित ऐसा वाहन नहीं बनने देगा जिस पर दूसरे सवार हो अपनी प्रगति प्रशस्त कर लें।


हम न भूलें कि


  • योग्यता के लिए विषय-विशेष का ज्ञान आवश्यक है।

  • किसी विषय का ज्ञान उस विषय की सिद्धि व विषय के पूरा होने के पश्चात उसके संभव परिणामों को अपने में निहित करता है।

  • सक्षमता आपकी रचनात्मकता को बढ़ाएगी।

  • सक्षमता आपको धन, प्रतिष्ठा के साथ-साथ संतोष व अपनी पहचान देगी।

  • ईर्ष्या तन, मन, धन सभी को जलाती है।

ऊपर

Career or Capable


The British introduced an education policy in India that should implant a sense of inferiority among Indians and established such a methodology that their hegemony could be strengthened. (see: Hum Naa Bhooleen-11)


Working for the British would bring an Indian close to them, by gaining their trust, by flattering them, he would become an officer and then be able to show his superiority by governing over other people like the British. This would abate his inferiority complex. The British gave more importance to the loyalty of a person towards them than to their merit. Serving the British became a matter of prestige and working for 'Bade-sahib', 'Laat-sahib' etc. and later becoming "Bade-Babu" saved a person from inferiority complex. Even today in India the longing and respect for 'English', 'White-skin', 'West' shows the mood of an Indian that he has still not been able to free himself from that complex (It is the irony of fate that we are still following the same educational pattern as set by the British).


Unfortunately, even today, it is the mindset of the Indian society that people do not search for professional opportunities to earn a livelihood. They are not demanding a model support system from the government in which they can create new opportunities for themselves, become self-reliant and maximize an opportunity. Society is still asking for jobs.


One big ambition of the youth is to make a 'career'. They strive for a ‘good career’. One of the main objectives of their ambition of having 'career' is 'earning more money' but at the same time having employees under them, taking their responsibility which gives them prestige in the society, is also another objective. Higher the number of employees working under one, higher is the officer rank and greater is his prestige in the known circle. There are very few ambitious youth who get an education in order to become capable, self-reliant and create professional opportunities for others.


According to the Oxford and Cambridge English Dictionary, 'career' is a profession undertaken for a long, meaningful period of life and with opportunities for growth.


In today's context, a "career" is mostly seen as a

sequence of related jobs within an industry or sector in which salary and/or responsibility increases with each job.


A person wants to earn money because he believes that with money he can fulfill his desires and get all the happiness. (Desires, wealth and happiness: in another article) For a good career, one has to take the responsibility of the employees, this commitment should be with the motivation that on getting this responsibility, the person would make such arrangements that the employees working under him do not feel that they are being exploited, rather they feel themselves more able, more independent in taking decisions. This does not happen because for every person who wants to make 'career' it becomes important that the officer above him should always be happy with him so that the person can get new opportunities for new responsibilities and salary also keeps increasing.


Many people become victims of stress in the pursuit of career. To please the officers above them, they may be disliked by those working below them. Even after gaining wealth and prestige in the known circle, this career seems to be a burden to them. They always think that when they become equal to the officers above them, they will get more power and will be able to get out of their present difficult situation. But this does not happen, because one is not always satisfied with his position as others always seem happier than himself. As the craving for more increases, the work-life balance gets disturbed.


If you strive to be capable, you will develop the ability to create opportunities even in difficult situations. You will develop such self-confidence (not over-confidence) in yourself that while solving a problem you will lead by example. Your self-confidence will never let you feel that you are alone. Self-confidence will never allow you to become jealous of someone. Jealousy is another name for failure, and it appears only when you find yourself falling behind others in the competition created by your own mind. Your knowledge, your self-confidence will enable you and create enthusiasm within you, which will make you successful.


utsāho balvānāry nāstyutsāhātparam balam |

sotsāhasy cha lokeshu na kinchidapi durlabham ||

Valmiki Ramayan (Kishkindha Kand, 1/121)


Meaning: Enthusiasm is the power of best men, there is no greater force than enthusiasm. Nothing is unachievable in this world for an enthusiastic person.


Merely passing the examinations of any subjects does not make you knowledgeable in those subjects, does not make you capable. Being successful in the exam is just a step towards your goal of becoming competent.


Your capability will guide your progress. You want to be a problem-solver (troubleshooter) and not one who just implements the orders and policies of his superiors (If an officer having higher authority should be called superior, would it mean that others with less authority are inferior? Do we still have to carry this mindset where British as higher officer were superior and Indian subordinates were inferior). In order to become capable, you will have to work hard and be like an entrepreneur. The purpose of this enterprise will be to take the leadership and responsibility for problem-solving and bring things to their conclusion. Your self-confidence will not let someone else ride on your shoulders and progress.


Let us not forget that


  • To be ‘qualified’ subject-specific knowledge is must.

  • The knowledge of a subject not only inherits the accomplishment of that subject, but also implies the possible outcomes and effects on and after the completion of the subject.

  • Capability will enhance your creativity.

  • Capability will give you not only wealth and prestige but also satisfaction and recognition.

  • Jealousy harms not only your body and mind but also depletes your wealth.

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