हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (10)

भक्ति-मार्ग / Bhakti Movement

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भारत में बुद्ध और जैन मत के विस्तार और इन मतों में निहित "किसी जीव की हत्या नहीं करनी चाहिए" के सिद्धांत के कारण क्षत्रिय जिनका कर्म युद्ध करना था, शत्रु से रक्षा करना था उनकी युद्ध की प्रवृति ही समाप्त सी होने लगी थी। (देखें: हम न भूलें-07) इन मतों में निर्वाण प्राप्ति हेतु इस संसार के क्रिया-कलापों का त्याग अनिवार्य था व निर्वाण प्राप्ति के लिए शिक्षा उपलब्ध थी परन्तु जो निर्वाण नहीं पाना चाहते, वे समाज की उन्नति में क्या और कैसे योगदान दे सकते हैं, राजपाठ, प्रशासन, समाज, साधारण जन-मानस आदि के कर्त्तव्यों व दायित्त्वों का कहीं उल्लेख नहीं था। सही शिक्षा के आभाव में सही दिशा न होने के कारण हिंदू राजा विदेशी आक्रमणों का सफलता से सामना नहीं कर पा रहे थे। जहाँ एक ओर आक्रांताओं के अत्याचार बढ़ रहे थे वहीं दूसरी ओर हिंदू संस्कृति का नाश हो रहा था व समाज में भय और नपुंसकता का वातावरण छा रहा था। समाज में जीवन की असुरक्षा की भावना बढ़ रही थी जिस कारण व्यक्तियों में "मै" और "मेरा", "हम" और "हमारे" से प्रबल हो गए। स्वार्थपूर्ति ने 'वसुधैव कुटुंबकम्' (देखें: हम न भूलें-05) के सिद्धांत को निगलना आरम्भ कर दिया था।


स्वामी शंकराचार्य जी (७८८ – ८२० [788-820]; २० [20] वर्ष की आयु मे संयास) ने देश के होते पतन को भली प्रकार जाना, समझा और रोकने के लिए लोगों को पुन: उन वेदों पर आधारित धर्म का जो महाभारत के युद्ध के कारण नष्ट होना आरम्भ हो गया था, बोध कराना आरम्भ किया। वे बडे-बडे राजाओं के यहाँ जा कर बडी-बडी ख्याति प्राप्त जैन व बुद्ध मत के प्रचारकों से व इनके धर्म-गुरूओं से शास्त्रार्थ कर उन्हे निरुत्तर करने लगे, और उन्हे पुन: वेदों पर आधारित मार्ग पर लाने लगे। जब वे किसी राजा अथवा ऐसे ही किसी बडे व्यक्ति को वेद मार्ग पर वपिस लौटा लाते तो उस व्यक्ति के साथ उसके अनेकों अनुयायी भी वेद-मार्ग पर लौट आते। महाभारत के युग से पहले धर्म का कोई नाम न था। जो कुछ भी वेदों के अनुसार मनुष्य के लिए करना उचित था उसको ‘धर्म’ कहा जाता था (देखें: हम न भूलें-04) और जो कुछ भी उचित नही था उसे ‘अधर्म’ कहा जाता था। अब बौद्ध व जैन मत से पृथक धर्म-मार्ग को बताने के लिए लोग उसे पुराना धर्म जो चिरकाल से चला आ रहा है, जो सनातन है, "सनातन धर्म" कहने लगे। दुर्भाग्यवश स्वामी शंकराचार्य जी का देहावसान ३२ [32] वर्ष की आयु में हो गया। उनका अभियान अपेक्षित गति नहीं ले पाया और परिणाम वैसे न हुए जिनकी कल्पना उन्होंने की होगी।


स्वामी शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म के प्रचारार्थ भारत के चारों दिशाओं में चार मठों व संयासियों के दशनामी सम्प्रदाय की स्थापना की। दशनामी संयासियों का उद्देश्य धर्मप्रचार के अतिरिक्त धर्मरक्षा भी था। धर्मरक्षा की सिद्धि के लिए विभिन्न अखाड़ों का संगठन खड़ा किया गया (जैसे: जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा, आदि) जहां शस्त्राभ्यास होता था। मुगलों से युद्ध में इन अखाड़ों ने अपना योगदान दिया व नागा साधू इसमें विशेषकर आगे रहे। सेना के अनुरुप ही इन अखाड़ों के लिए नियम निर्दिष्ट है कि इनकी शोभायात्रा का क्रम क्या और किस रूप में रहा करे।


जब मुसलमानों ने इस देश पर अपना आधिपत्य जमा लिया और इस देश की धर्म-व्यवस्था को नष्ट करना आरम्भ कर दिया तब हिन्दुओं के लिए दुख और कष्ट के भरे इस समय मे इस देश मे कुछ ऐसे लोग हुए जिन्होने निराश व भयग्रस्त हृदयों में "भक्ति-मार्ग" से आशा व आंतरिक-शक्ति का संचार करने का प्रयास किया। (इस मार्ग को दिखाने वालों मे मुख्य: चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, तुकाराम, रामानंद, सूरदास, कबीर, मीराबाई व तुलसीदास थे।) उनके अनुसार प्रभु को भजन, कीर्तन और प्यार से प्रसन्न ही नहीं अपितु पाया भी जा सकता है। यह भक्ति का मार्ग ज्ञान (वेद, शास्त्र, उपनिषद आदि पढ़ना), अनुष्ठान, कर्म-कांड के मार्ग से सरल व श्रेष्ठ है और 'भक्त के लिए भगवान के' और 'भगवान के लिए भक्त के' आपसी गहन भावनात्मक लगाव और प्रेम पर जोर देता है। उस समय ज्ञान के आभाव में हिंदू समाज में कई बुरी प्रथाएं फैल चुकी थीं। जाति और वर्ग भेद भी बहुत था। भक्ति आंदोलन में इन विचारकों ने स्थानीय भाषाओं का उपयोग करते हुए प्रचार किया। इस आंदोलन (मुसलमानों में सूफी आंदोलन) के धार्मिक व सामाजिक प्रभाव दिखे। जहाँ एक ओर निम्न जातियों की सामाजिक स्थिति में सुधार आया, समाज-सेवा को बढ़ावा मिला वहीं दूसरी ओर ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा कम हुई, सिख संप्रदाय का उद्भव हुआ और हिंदू समाज पहले से अधिक विभाजित हुआ (उदाहरणार्थ: वैष्‍णव सम्‍प्रदाय के राम के अनुयायी तथा कृष्‍ण के अनुयायी और फिर कृष्‍ण के अनुयायियों में ही निंबर्क, चैतन्य, महानुभाव, वरकारी, रुद्र, राधा-बल्लभ आदि अनेक छोटे वर्ग और पंथ)। समूचा भक्ति-काल मुस्लिम चुनौती के समक्ष हिन्दुओं में अपनी संस्कृति, अपने स्वाभिमान के लिए जोश जगाने में असफल रहा। भक्त कवियों के गाये भजनों ने हिन्दुओं के पौरुष और बल को और अधिक क्षीण कर दिया।


आज आधिकांश हिन्दु इसी मार्ग पर चल रहे है। यदि हम इन सनातन-धर्म वालों को ध्यान से देखें तो पाऐंगे कि इनके बीच संत तुलसीदास-कृत 'रामचरितमानस' बहुत लोकप्रिय है और मंदिरों में सूरदास जी द्वारा रचित 'सूरसागर' में वर्णित भगवान श्री कृष्ण और उनकी बाल्य-सखी राधा के आकर्षण से भरपूर कथाओं का ये भजन, कीर्तन कर के ही तृप्त हो जाते है। वास्तविक ज्ञान की ओर या उन ग्रंथों की ओर जिनमे ज्ञान है ये बहुत ही कम ध्यान देते हैं। पर भजन-कीर्तन से मन शुद्ध तो नही होता। मन विकारों मे ही रमा रहता है और शांति नहीं मिलती। ऐसा क्यों? (अन्य लेख में)


अंग्रेजों ने इस देश पर अधिकार जमाते हुए हिन्दुओं पर एक नए प्रकार का आक्रमण किया। मुस्लमानों ने तो हिन्दुओं का नाश करने के लिए हिन्दु ग्रन्थों का नाश किया, मंदिर तोडे, पूजा-पद्धति को नष्ट करने का भरसक प्रयास किया, जिस कारण हिन्दुओं का एक बहुत बडा वर्ग मुसलमान बन गया था और उनका अनुयाई हो गया था पर इन ईसाई प्रचारकों ने हिन्दुओं को नष्ट करने के लिए हिन्दु धर्म-ग्रन्थों मे गल्त बाते जोड़ कर प्रचलित करना आरम्भ कर दिया, जिससे हमारे उन पूर्वजों का जिन्हें हम भगवान तक कहने लग गए थे, चरित्र हनन होता हो। जैसे भगवान श्री कृष्ण गोपियों के कपडे उठा ले जाते थे, उन संग अश्लील व्यवहार करते थे, स्वयं को भक्तिभाव से मंदिर की सेवा में समर्पित महिलाओं (देवदासी) को ‘वैश्या’ कह संबोधित किया। वेदों के अंदर उन्होने ऐसे अनुवाद प्रकाशित किए जिससे कि हिन्दुओं के मन मे यह भरा जा सके कि वे वेद जिस पर हिन्दू इतना गर्व करते है मात्र गडरियों के गीत हैं। उदाहरण हेतु यहाँ जर्मनी के मैक्स म्यूलर का नाम लेना होगा जिसने वेदों का अनुवाद किया पर कभी भी भारत नही आया। (किसी देश की सभ्यता व संस्कृति जाने बिना उसके इतने बड़े धार्मिक ग्रन्थ का अनुवाद कितना सही होगा इसका अनुमान पाठक स्वयं लगाएँ)।ईसाइयों ने हिंदू नामों के साथ छेड़छाड़ की और अंग्रजी में राम को रामा, अर्जुन को अर्जुना, वेद को वेदा, ब्राह्मण को ब्रह्मिन, शूद्र को शूद्रा आदि कर दिया जबकि ऐसी छेड़छाड़, मुस्लिम या सिख समुदाय के ग्रंथों में नहीं की गई। इब्राहिम, जोज़फ, जॉन, मोहम्मद, हसन, नानक आदि इब्रहिमा, जोज़फ़ा, जॉना, मोहम्मदा, हसना नानका अदि नहीं हो गए। यह हिन्दुओं की अपने प्रति उदासीनता, उनके विभाजित होने से उनके क्षीण होने का परिणाम ही था कि उन्होंने इसका विरोध नहीं किया और सब सहन किया जिसका परिणाम आज यह है की स्वयं को हिंदू कहने वालों का एक बहुत बड़ा वर्ग अंग्रेजी में बिगाड़े हुए शब्दों को ही सही मानता है और सुधार की आवश्यकता ही नहीं समझता। तनिक सोचें कि यदि हमारे परिवार के किसी सदस्य का नाम कोई व्यक्ति थोड़ा बिगाड़ कर पुकारे तो क्या हम उस व्यक्ति को सुधारेंगे अथवा नहीं। यदि हम अपने परिवार के इस सदस्य को प्यार करते हैं, उसका आदर करते है तब हम अवश्य ही सुधार करना चाहेंगे। आज हम यह सुधार करने में सक्षम हैं और हमें यह सुधार करना चाहिए।


इन ईसाई प्रचारकों ने अपने विद्यालय खोले जिनमे विद्यार्थियों को सामान्य शिक्षा के साथ-साथ बहुत ही योजना-बद्ध तरीके से ईसाई मत की शिक्षा दी जा सके। इन्होने सरकारी तंत्र भी ऐसा बनाया कि जिसमें लोग आध्यात्मवाद को छोड भोगी-विलासी बने और जीवन मे सरकारी पदों व अन्य क्षेत्रों मे केवल वही लोग उन्नति कर सकें जिन्होने इनके विद्यालयों से शिक्षा पाई हो। इस प्रकार अंग्रेज भी अपने शासनकाल मे हिन्दुओं की सभ्यता व संस्कृति का नाश करते रहे। अब हिन्दुओं के पास गर्व करने के लिए कुछ भी नही था। न हमारे पास सत्य-ज्ञान था, न ही अपनी वेश-भूषा रही। न हमे अपने पूर्वजों पर गर्व रहा और न ही अपनी सही सभ्यता हमारे पास थी। हम हिन्दु होने का किस बात पर गर्व करते? हम हिन्दुओं मे हीनता की भावना पनपने लगी और हम अंग्रेजी वस्तु, भाषा, चाल-चलन अपनाने में गर्व अनुभव करने लगे।


हम न भूलें कि

  • आप जिस विषय पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे और उसके हेतु कर्म करेंगे उसके परिणाम भी वैसे निकलेंगे।

  • यदि कथा सुनना ही कर्म मान लिया कि कान में अच्छे शब्द पड गए और उस कथा से कोई शिक्षा नहीं ली कि उसे जीवन में ढाला जाए तो परिणाम उस बीज की भांति ही होगा जिसे धरती में फसल के लिए बिया तो गया है परन्तु उसे खाद, जल आदि से न तो सींचा गया है और न ही अन्य संकटों से उसकी रक्षा की गई है।

  • अपनी धरोहर की रक्षा करना और उसकी प्रगति के लिए कार्यशील रहना हर उस व्यक्ति का कर्त्तव्य है जो उस धरोहर वसंस्कृति को अपना समझता है। कोई अन्य उसकी इस पूँजी की रक्षा नहीं करेगा।

  • इस धरोहर का सही ज्ञान व मूल्यांकन इसे भली प्रकार समझ कर, अपनी जीवनशैली में अंगीकार कर के ही हो सकता है।

  • आपकी कोई भी ईच्छा बिना कर्म किए पूरी नहीं हो सकती।

  • आप जैसा सोचते हैं, वैसे बन जाते हैं। आप जैसा अनुभव करते हैं, वैसा आकर्षित करते हैं और आप जैसी कल्पना करते हैं, वैसी संरचना करते हैं।

  • आत्म-सम्मान सफलता के मूल में निहित है। यह विश्वास कि आप सक्षम हैं, आप योग्य हैं और आप इसे प्राप्त कर सकते हैं, आपको सफल बनता है।

  • दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने की अपेक्षा योग्य पात्र (अलग लेख में) की मदद के लिए हाथ बढ़ाना अधिक महत्त्वपूर्ण व मूल्यवान है।

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Bhakti Movement


Due to the expansion of Buddhism and Jainism in India and the principle of "one should not kill any creature" embedded in their views, the willingness of Kshatriyas whose responsibility was to fight and protect, was diminishing (see: Hum Naa Bhooleen -07). For both these views, renunciation of the worldly activities was necessary to attain Nirvan and necessary education to attain it was available. For those who did not want to attain Nirvan, nothing about how they could contribute to the progress of society, administration, politics, etc. was mentioned. The duties and responsibilities of an ordinary person were nowhere mentioned in the scriptures of Buddhism and Jainism. In absence of proper education and right focus, the Hindu kings were not able to successfully withstand foreign invasions. While atrocities of invaders were increasing on one side, the Hindu culture was being destroyed on the other. An atmosphere of fear and social-impotence was rising. The feeling of insecurity was increasing in the society due to which individuals became dominant with "I" and "mine", instead of "we" and "our". Self-interest had begun to swallow the principle of 'Vasudaiv Kutumbakam' (see: Hum Naa Bhooleen-05).


Swami Shankarachary (788 - 820; sainthood at the age of 20) understood the downfall of the country. To prevent people from further downfall he began to make people understand the old Dharm based on the Veds, which was diminishing after the war of Mahabharat. He would go to the courts of big kings and challenge Jain and Buddhist preachers and their religious leaders. He would convince them to follow the path based on Veds. When a king or any such preacher or leader accepted the Veds, their subjects or followers would also embrace Veds. Prior to the era of Mahabharat there was no name given to religion. According to the Veds, whatever was appropriate for man to do was called 'Dharm' (see: Hum Naa Bhooleen-04)and whatever was not, was called 'Adharm'. To differentiate the path of Dharm from Buddhism and Jainism people started calling it the "Sanatan Dharm" (Sanatan: which is existing since time immemorial). Unfortunately Swami Shankaracharya died at the age of 32. His campaign did not pick up the desired pace and the results were not what he would have expected.


Swami Shankaracharya established the Dasnami community of four monasteries and ascetics in the four directions of India for the promotion of Sanatan Dharm. In addition to preaching, the aim of the Dasnami ascetics was also Dharm-Raksha. Organization of various akharas (eg: Juna Akhada, Niranjani Akhada, Mahanirvani Akhada, etc.) was organized for the accomplishment of Dharm-Raksha. These akharas contributed to the war against the Mughals and Naga Sadhus were especially prominent in it. Similar to the army, rules for these akharas are specific as to what should be the process of their procession and in what form.


When the Muslims gained their suzerainty over this country and started destroying its religious system, then during this time of grief and pain for the Hindus, there were some people in this country who tried to communicate hope and inner strength in the disheartened and fearful hearts of people through devotion –“Bhakti-Marg". (The main ones who showed this path were: Chaitanya Mahaprabhu, Namdev, Tukaram, Ramanand, Surdas, Kabir, Meerabai and Tulsidas.). According to them, hymns, kirtans and love can not only please the Lord but can also lead to salvation. This path of devotion is simple and better than the path of knowledge (reading Veds, scriptures, Upanishads etc.) and rituals. It emphasizes on the intense emotional attachment and love of 'God for the devotee' and 'of the devotee for God'. At that time many bad practices had spread in Hindu society due to lack of knowledge. Caste and class distinction was also widespread. These thinkers preached in local languages. Religious and social effects of this Bhakti movement (Sufi movement among Muslims) were seen. While the social status of the lower castes improved and social service was encouraged, the prestige of the Brahmins diminished, and Hindu society became more divided than before (for example: among Vaishnavs, Ram's and Krishn’s followers and then among Krishn’s followers many small classes and creeds like Nimbarka, Chaitanya, Mahanubhav, Varkari, Rudra, Radha-Ballabh etc.). The Sikh sect also emerged during this period. In the face of the Muslim challenge, the entire Bhakti-Movement period failed to awaken the Hindus to their culture, their self-respect. The hymns sung by devout poets further undermined the fighting spirit and force of the Hindus.


Today most Hindus are following this Bhakti path. If we look closely at the Sanatan-Dharm followers, we find that among them, Sant Tulsidas’s 'Ramcharitmanas' is very popular. In temples, they feel satisfied by kirtans based on stories of Shri Krishn and his childhood friend Radha mentioned in 'Sursagar' composed by Surdas ji. They pay very little attention to gain the actual knowledge or to the texts from scriptures which have knowledge. Unfortunately the mind does not become pure and get in peace just with bhajan-kirtan. Why so? (In another article)


The British, gained control over this country and launched a new type of attack on the Hindus. The Muslims destroyed the Hindu texts, demolished temples, tried their best to hinder and obstruct worship, killed Hindus, due to which a large section of the Hindus become Muslims. The Christians started manipulating the Hindu scriptures by adding improper and false things to them, which would depict a false image of our ancestors whom we even prayed as God. As Shri Krishn used to take away the clothes of the gopis, behaved indecently with them, the female devotees who spent their lives in the service of the temple (devadasi) were termed prostitutes by them. The Ved translations were such that it could be filled in the minds of Hindus that the Veds on which Hindus are so proud are only songs of the shepherds. For example, a name worth mentioning is that of Max Müller of Germany, who translated the Veds but never came to India. (Without knowing the heritage and culture of a country, how correct and appropriate the translation of the most important scriptures of that society would be, is to be judged by readers themselves). Christians tampered with Hindu names and changed, Ram to Rama, Arjun to Arjuna, Ved to Veda, Brahman to Brahmin, Shudr to Shudra, etc. in English. Such tampering was not done with Muslim or Sikh community texts. Ibrahim, Josef, John, Mohammad, Hasan, Nanak etc. did not become Ibrahima, Jozafa, Jonha, Mohammada, Hasna, Nanaka etc. It was the result of the Hindu’s indifference towards themselves, their weakness due to division, that they did not resist it. The result of which is that today a very large section of people who call themselves Hindus have to distort the words in English. They accept it as correct and do not understand the need for improvement. Just think that if someone tampers with the name of a family member and pronounces the name in a wrong way, will we correct that person or not. If we love and respect this member of our family, then we would definitely like to correct. Today we are able to make this correction and we should make it.


The Christian missionaries opened their own schools to teach students Christianity along with general education. The British (Christians) also made the government system such that people give up spiritualism and become luxuriant. Only those who were educated in their schools can progress in government positions and other areas in life. In this way, the British continued to destroy the civilization and culture of the Hindus during their reign. Now Hindus had nothing to be proud of. We did not have our true knowledge and even our attire got changed. Neither were we proud of our ancestors nor were we left with our rightful heritage and civilization. Why would we be proud of being a Hindu? We Hindus began to develop a sense of inferiority and we began to take pride in adopting English language, and the English way of life.


Let us not forget that


  • The subject you focus and put you efforts on will also bring you desirable results.

  • If you consider listening to a spiritual story as your karm and believe that you heard only good words and do not take any lesson from that story to modify your life, then the result would be like the seed which although has been sown in the soil for harvest but has neither been watered, manured nor protected from other hazards.

  • It is the duty of every person who considers the heritage and culture as his own to safeguard it and contribute towards its progress. No other person will protect his legacy.

  • The right knowledge and evaluation of this heritage can only be understood by adopting it in your lifestyle.

  • None of your desires can be fulfilled without actions.

  • What you think you become, what you feel you attract, what you imagine you create

  • The strongest factor for success is self-esteem. Believing that you can do it, believing you deserve it and believing you will get it, makes you successful.

  • It is more important and valuable to extend a helping hand to the eligible candidate (in another article) than to pray with folded hands.

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