हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (11)

अंग्रेज व शिक्षा / Britain and Education

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रत पर विजय पाने के लिए, भारत की धन-सम्पदा लूटने के लिए, हिन्दुओं का धर्मान्तरण करने के लिए, इस देश पर सैंकड़ों वर्षों तक आक्रमण होते रहे और इस देश को आहात करते रहे। इस लूटपाट ने, विदेशियों के शासन ने जहाँ एक ओर भारत की समृद्धि का नाश किया वहीं दुसरी ओर हिन्दुओं को क्षीण व दीन-हीन बनाने का भी कार्य किया। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथ, मंदिर, मठ, शैक्षिक संस्थान, गुरुकुल आदि नष्ट किए गए। इन आक्रांताओं ने वह सब नष्ट किया व करने का प्रयास किया कि हिन्दू अपनी उपलब्धियों का ज्ञान न पा सकें और वैसी उपलब्धियां पुन: अर्जित न कर सकें। आक्रांताओं का मानना था कि ज्ञान के आभाव में, नई शोध भी संभव नहीं होगी और न ही कोई नई उपलब्धि हो पाऐंगी।


हमारे पूर्वजों के पास यदि ज्ञान न होता तो ये जो १००० [1000] वर्षों से भी पहले बने मंदिर, भवन आदि जो हम देखते है वे कैसे बन गए? यह शिल्प-कला, धातुकर्म, भवन-निर्माण कला जो हम आज भी देख पा रहे है वह इस लिए ही संभव है चूँकि वे उन पत्थरों, वस्तुओं, सामग्री आदि जो प्रयोग की गई उसकी दीर्घायु का ज्ञान रखते थे। हम आज भी अपनी उन पुरानी धरोहरों पर आश्चर्यचकित होते हैं। कैसे इतनी प्राकृतिक आपदाओं के पश्चात भी ये ऐसी खड़ी है जैसे इन्हे कुछ समय पहले ही बनाया हो। क्या हमारे पूर्वजों को भूकंप, तूफान आदि से अपने भवनों की सुरक्षा का ज्ञान था? आज भी अनेकों प्रश्नों के उत्तर हमें नहीं मिल पाए हैं।


आज धीरे-धीरे आयुर्वेद, योगासनों द्वारा रोगों के उपचार की क्षमता को भारत ही नहीं अपितु संसार के अनेक देश स्वीकार रहे हैं और विदेशों में अनेक आयुर्वेद व योग के केंद्र खुल रहे है। हम में से कितने लोगों ने महर्षि सुश्रुत का नाम सुना है और कितने लोगों ने एलेग्जेंडर फ्लेमिंग का? एलेग्जेंडर फ्लेमिंग ने "पेनिसिलिन" का अविष्कार

किया था और महर्षि सुश्रुत को शल्य-चिकित्सा का पितामह माना जाता है। इनका जन्म आज से २६०० [2600] वर्ष पूर्व काशी में हुआ था। इनके सम्मान में “रॉयल ऑस्ट्रलेशियन कॉलेज ऑफ़ सर्जेंस” ने अपने मेलबोर्न संस्थान में इनकी प्रतिमा लगाई है।


जर्मनी के कील-विश्वविद्यालय में छपे एक लेख में भारत के प्राचीन धातु-विज्ञान की चर्चा है और इस लेख मे जस्ता

धातु (जिंक) के उत्पादन का उल्लेख अत्यधिक विशेष है। जस्ता अयस्क से जस्ता को अलग करना एक अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। जस्ता लगभग १००० °से. पर पिघलता है और लगभग इसी तापमान पर इसका वाष्पिकरण भी हो जाता है जिस कारण इसके भट्टी में ही वायु के साथ मिल जाने से खो जाने की संभावना रहती है। राजस्थान के उदयपुर शहर से लगभग ४० की.मि. [40 km] दक्षिण में जावर (यहाँ आज भी जस्ता की खानें हैं) में नीचे की ओर आसवन (डिस्टिलेशन) की विधि विकसित की गई थी जिसके माध्यम से जस्ता धातु का उत्पादन होता था। भारत के अतिरिक्त विश्व वर्ष १७४० [1740] तक जस्ता उत्पादन से अनभिज्ञ था। १७४० में इंग्लैंड के ब्रिस्टल शहर में लगभग जावर प्रविधि (तकनीक) के अनुसार ही जस्ता-उत्पादन आरम्भ हुआ।


रसरत्नाकर लेखों में आज से लगभग १००० वर्ष पूर्व जन्मे नागार्जुन जी इस जावर प्रविधि का उल्लेख करते है। भारतीय संस्कृति में बहुत से लेख (भिन्न विषयों पर) लेखक नागार्जुन के नाम से संग्रहित है और यदा-कदा लेखकों में अंतर करना अत्यंत कठिन है।


हिन्दुओं के लिए शिक्षा का अत्यधिक महत्त्व रहा हैं। सार्वभौमिक शिक्षा (देखे: हम न भूलें-01, 02) जो व्यक्ति, समाज व राष्ट्र का निर्माण कर सके, सर्वोपरि थी। हिन्दुओं का यह मानना था कि उचित शिक्षा होने से ही प्रत्येक व्यक्ति समाज में अपना सही योगदान दे सकेगा और अपने धर्म (कर्त्तव्य) का निर्वाह कर सकेगा।


पहले विदेशी लुटेरों ने समाज को अपनी लूटपाट, मार-काट और विध्वंस से आर्थिक, समाजिक व शैक्षिक हानि पहुँचाई और तत्पश्चात मुस्लिम आक्रांताओं ने तो इस सबके अतिरिक्त हिन्दुओं पर अत्याचार व बलात उनका धर्मपरिवर्तन भी आरम्भ कर दिया। मुसलमानों का एक ही सिद्धांत था कि पृथ्वी पर जीने का हक़ केवल मुसलमानों को हैं। गैर-मुस्लिम को मुसलमान बना कर कोई भी मुसलमान अपने लिए "जन्नत" में स्थान सुनिश्चित कर सकता है। इस्लाम के विस्तार के लिए मुसलमानों का एक सिद्धांत था कि कोई भी पुस्तक जो उनकी धार्मिक पुस्तक कुरान के विरुद्ध है, वह जायज़ (सही) नहीं है और कोई भी पुस्तक जो कुरान के समर्थन में है, उसकी कुरान के होते कोई आवश्यकता नहीं है। अपने इसी सिद्धांत के कारण उन्होंने कितने की पुस्तकालय, पांडुलिपियां, ताम्रपत्र, शिलालेख, आदि नष्ट कर दिए।


१५ . वी. [15] शताब्दी के अंत होते-होते यूरोप के देशों ने आर्थिक समृद्धि के लिए विस्तार आरम्भ किया व उनमे उपनिवेश बनाने की होड़ लग गई (पुर्तगाल व स्पेन प्रमुख)। कैथोलिक चर्च का उस समय यूरोप में बहुत दबदबा था और प्रत्येक राज्य को चर्च (ईसाइयत) के विस्तार के लिए धन देना होता था (ऐसा आज भी है)। सभी यूरोपीय शक्तियों ने तब चर्च को कम धन देने की इच्छा रखते हुए यह दावा किया कि वे उपनिवेशों के "मूल" और "जंगली" निवासियों को "सभ्य" बनाने (ईसाई बनाना) की इच्छा से अपने उपनिवेश बना रहे हैं। अंग्रेज भी भारत में अपने इसी "सभ्यता" के उद्देश्य से आऐ थे।


१७९२ [1792] में चार्ल्स ग्रांट (ब्रिटेन का एक प्रभावशाली सांसद) ने कहा कि "ईस्ट इंडिया कंपनी" को भारत के लोगों के सामाजिक व नैतिक विकास के लिए ईसाई मिशनरियों को भारत आने की अनुमति देनी चाहिए। १८०६ [1806] में लंदन के समीप "ईस्ट इंडिया कंपनी कॉलेज" की स्थापना मे भी चार्ल्स ग्रांट की मुख्य भूमिका रही। यहाँ चुनिंदा युवाओं को भारत में काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। इनका पाठ्यक्रम विस्तृत होता था जिसमें भारतीय भाषाओँ (संस्कृत भी) व विषयों के ज्ञान के साथ राजनीतिक अर्थव्यवस्था, इतिहास, गणित, प्राकृतिक दर्शन, कानून और मानवता आदि विषय भी शामिल थे।


अपने विस्तार के प्रारंभिक-काल में ही अंग्रेजों ने पाया की चाहे मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार, उनका नर-संहार, धर्मांतरण किया है, फिर भी वे हिन्दुओं का दमन नहीं कर पाऐ हैं। हिन्दू सदैव "स्वराज" के लिए यत्न करते रहते है और जहाँ भी वे "स्वराज" स्थापित कर लेते हैं वहाँ समृद्धि आने लगती है। छत्रपति शिवाजी का मराठा राज्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अंग्रेजों को यह समझते देर नहीं लगी कि इस स्वराज की तड़प और समृद्धि के लिए, समाज के हर वर्ग, हर जाति के व्यक्ति के द्वारा दिए योगदान के पीछे, हिन्दू-संस्कृति में निहित सार्वभौमिक शिक्षा ही है।


हिन्दुओं को पूर्ण रुप से क्षीण व असक्षम बनाने के लिए उनकी रीढ़ अर्थात उनकी सार्वभौमिक शिक्षा को नष्ट करना अनिवार्य था और अंग्रेज "इंग्लिश एजुकेशन एक्ट १८३५" के माध्यम से सफल भी हुए। लार्ड मैकॉले का नाम यहाँ उल्लेखनीय है जो कहता था कि हमें शिक्षित भारतियों का ऐसा वर्ग चाहिए जो रंग-रुप में तो भारतीय जैसा हो परन्तु अपनी सोच, नैतिकता, विचारधारा से अंग्रेज हो। उसका मत था कि भारतीय शिक्षा (विशेषकर हिन्दू शिक्षा) हीन है व पश्चिमी संस्कृति व ज्ञान ही सही व श्रेष्ठ है। अंग्रेजी भाषा संस्कृत या किसी अन्य क्षेत्रीय भाषा से श्रेष्ठ है और शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी भाषा ही होनी चाहिए।


यह अंग्रेजों द्वारा बनाई गई शिक्षा नीति व शैक्षिक पद्धति का ही परिणाम है कि अंग्रेजी आज भारत में ही भारतीय भाषाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्व रखती है। जो अंग्रेजी बोलता है उसे भारत में शिक्षित समझा जाता है। श्वेत त्वचा के लोगों को भारत में सभ्य, शिक्षित व उच्च समझा जाता है। यह मान लिया जाता है कि जो बात श्वेत त्वचा वाला व्यक्ति कह रहा है वह सही ही होगी। दुर्भाग्यवश भारत आज भी अंग्रेजों की बनाई शिक्षा नीति को पूर्णत: छोड़ नहीं पाया है और आज भी वैचारिक दृष्टि से अंग्रेजी दासता से मुक्त नहीं हो पाया है। इस मुक्ति हेतु व सक्षम बनने के लिए व्यवसायिक-शिक्षा के साथ व्यवहारिक-शिक्षा, चरित्र-निर्माण, सांस्कृतिक-शिक्षा, अध्यात्म, आदि का होना नितांत आवश्यक है।


हम न भूलें कि


  • भारत का व्यापार अपने पश्चिम में समुद्री-मार्ग व थल-मार्ग से यूरोप के देशों के साथ था। १४५३ में तुर्की के ओटोमन शासकों की विजय के बाद पूर्व और पश्चिम के बीच पुराने व्यापारिक मार्ग उनके नियंत्रण में आ गए। यूरोप को इससे व्यापार में बहुत आर्थिक हानि होने लगी।

  • वास्को दे गामा, मार्को पोलो व कोलंबस भारत का मार्ग क्यों खोजने के लिए निकले थे? वे भारत को कुछ देने नहीं अपितु अपनी समृद्धि के लिए उससे कुछ लेना चाहते थे।

  • उपनिवेशों के दौर के समय से द्वितीय विश्व-युद्ध के समय तक यूरोप समृद्धि व शक्ति का केंद्र बना। आज जब उपनिवेश नहीं है और उनका शोषण ये पहले की भाँति नहीं कर पा रहे इनकी समृद्धि भी पहले जैसी नहीं है। यहां की शिक्षा में निरंतर चरित्र-निर्माण, सांस्कृतिक-शिक्षा व अध्यात्म की कमी आ रही है।

  • इस्राईल, जापान, दक्षिण-कोरियाव चीन ने स्वयं पर विश्वास रखते हुए अपने शैक्षिक-माध्यम से विश्व पटल पर स्थान बनाया है और आगे कार्य-रत हैं। इन सभी देशों (गैर-यूरोपीय देश) में शिक्षा उनकी अपनी भाषा में है, अंग्रेजी में नहीं।

  • शिक्षा व विशेषकर उच्च-शिक्षा अंग्रेजी में ही उपलब्ध हो इसके पीछे अंग्रेजों का उद्देश्य था कि बड़े वर्ग के लिए शिक्षा उपलब्ध न हो और वे शिक्षा भी ऐसी उपलब्ध कराएं जो उनके अनुकूल हो पाए परिणामस्वरुप स्वतंत्र भारत में भी दुर्भाग्यवश क्षेत्रीय भाषाओं में ही नहीं अपितु हिंदी में भी अच्छी शैक्षिक पुस्तकों का आभाव है।

  • अंग्रेजों ने ऐसी शिक्षा-पद्धति बनाई जो उनके लिए काम करने वाले तैयार कर सके, अंग्रेजों के लिए नौकरी कर सके। दुर्भाग्यवश आज भी एक शिक्षार्थी अपने लिए एक नौकरी की कामना रखते हुए शिक्षा ग्रहण करता है (आज अच्छी नौकरी वह है जिसमें व्यक्ति "कैरियर" बना सके)। बहुत ही कम शिक्षार्थी है जो सक्षम, स्वावलंबी होने की भावना से शिक्षा ग्रहण करते है। (अन्य लेख में)

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Britain and Education


In order to conquer India, to loot India's wealth, to convert Hindus to their religion, this country has been under attack for hundreds of years and is bleeding even today. The lootings, the foreign rule not only destroyed India's prosperity but also made the Hindus weak and oppressed. Hindu religious texts, temples, monasteries, educational institutions, gurukuls etc. were destroyed. These invaders either destroyed or tried to destroy everything so that Hindus may not get the knowledge about their marvelous achievements of the past to achieve them again. These invaders had a strong belief that in the absence of knowledge, new research will not be possible hence there will be no new achievements.


If our ancestors did not have any knowledge, then how were these temples, buildings etc., built so many years ago? The craftsmanship, metallurgy, architecture that we are able to see and praise even today is possible only because our ancestors knew the longevity of the stones, objects, materials etc. that they used. We still marvel at those old heritage of ours. How, even after facing many natural disasters, these monuments still stand as if they were built only some time ago. Did our ancestors know how to protect their buildings from earthquakes, hurricanes etc.? Even today, we have not been able to get answers to many of our questions.



Today gradually, not only India but many countries of the world are accepting Ayurved, the ability of treatment of diseases by Yogasans and Ayurved is also acclaimed. Many Ayurved and Yog-centers are opening up abroad. How many of us have heard the name of Maharishi Sushrut and how many people have of Alexander Fleming? Alexander Fleming invented "penicillin" and Maharishi Sushrut is considered the father of surgery. He was born in Kashi 2400 years ago. In honor of him, the Royal Australasian College of Surgeons (RACS) has installed his statue in Melbourne.


An article printed at the University of Kiel, Germany, discusses the Metallurgical Heritage of India and the mention of the production of zinc in this article is very special. Separating zinc

from zinc ore is an extremely difficult process. Zinc ore melts at about 1000°C, but it melting and evaporating temperatures are very close, due to which it is likely to get lost by mixing with air in the furnace itself. It was about 40 km in the south of Udaipur city of Rajasthan, at Jawar (even today there are zinc mines), the method of downward distillation was developed through which zinc metal was produced. Apart from India, the world was not aware of zinc production till the year 1740. In 1740 in the city of Bristol, England, production of zinc started almost with the same technique as at Jawar.


The Rasaratnakar, a text ascribed to the great Indian scientist, Nagarjun ji who was born about 1000 years ago, mentions this Jawar method. Many articles (on different subjects) in Indian culture are stored under the name Nagarjun and sometimes it is very difficult to differentiate between authors.


Education has been very important for Hindus. Universal education (see: Hum Naa Bhooleen-01, 02) that could build the individual, society and nation was paramount. Hindus believed that only by having proper education, every person will be able to make his right contribution in the society and will be able to carry out his religion (duty).


Initially foreign plunderers caused economic, social and educational harm to the society by their looting, killing and destruction, and then the Muslim invaders started their conversion and atrocities and persecution of the Hindus. Muslims had the same principle that only the Muslims have the right to live on earth. By making a non-Muslim a Muslim, any Muslim can ensure a place in "Jannat" for himself. For the spread of Islam, Muslims had a theory that any book against their religious book Quran is not justified and any book that is in support of Quran is not needed as Quran already exists. Due to this principle, they destroyed many libraries, manuscripts, copper sheets, inscriptions, etc.


By the end of the 15th century, to achieve higher economic prosperity the European countries started with their geographical expansion. There was a competition among them to colonize the world (predominantly Portugal and Spain). The Catholic Church was very dominant in Europe at that time and each state had to pay to church for the expansion of the Church (Christianity) (this is even today). All European powers did not want to pay huge amounts to church hence started claiming that they were building their colonies with the desire to "civilize" (Christianize) the "native" and "wild" inhabitants of the colonies. The British also came to India for the purpose of this "civilization".


In 1792, Charles Grant (an influential British MP) said that the "East India Company" should allow Christian missionaries to come to India for the social and moral development of the people of India. Charles Grant also played a key role in the establishment of the "East India Company College" near London in 1806. In this college selected youth were trained to work in India. Their syllabus was broad and included subjects of political economy, history, mathematics, natural philosophy, law and humanity etc. along with knowledge of Indian subjects and languages (Sanskrit also).


In the beginning of its expansion itself, the British found that even though the Muslims have committed extreme atrocities, genocide, conversion of Hindus, they have not been able to suppress the Hindus. The Hindu always tries for "Swaraj". Wherever the Hindus are able to establish "Swaraj" they begin to prosper. The biggest example of this is the Maratha kingdom of Chhatrapati Shivaji.


To make the Hindus completely weak and incapable, it was necessary to destroy their backbone i.e. their universal education and the British were also successful through "English Education Act 1835". The name of Lord Macaulay's is notable here, who used to say that we need a class of educated Indians who are Indian in color but British in their thinking, morality and ideology. He believed that Indian education (especially Hindu education) is inferior and western culture and knowledge is right and best. The English language is superior to Sanskrit or any other regional language and the medium of instruction should be the English language itself.


It is a result of the education policy and educational system made by the British that English today has more importance in India than the Indian languages. One who speaks English is considered educated in India. White skinned people are considered civilized and highly educated in India. It is assumed that what the white skinned person is saying will be correct. Unfortunately, even today India has not been able to completely abandon the education policy made by the British and has not been able to get rid of the English squad from ideological point of view. For this liberation and to become capable, it is absolutely necessary to have practical education along with vocational education, character building, cultural education, spirituality, etc.


Let us not forget that


  • India was trading with European countries by sea and land routes. After the conquest of the Ottoman rulers of Turkey in 1453, the old trade routes between East and West came under their control. Europe started to suffer a lot of economic loss in trade.

  • Why did Vasco de Gama, Marco Polo and Columbus set out to find a route to India? They did not owe anything to India but wanted to take something from it for their prosperity.

  • From the time of the colonies to the time of World War II, Europe became a center of prosperity and power. Today, when there is no colonization and they are not able to exploit the colonies as before, their prosperity is not the same. There is a continuous lack of character-building, cultural education and self-analysis in education in Europe also.

  • Israel, Japan, South Korea and China have achieved their place on the world stage by believing in themselves and are working further for it. Education in all these countries (non-European countries) is in their own language, not in English.

  • The aim of the British was that education may not be available for a large section, and if available, it should be in a way that suits them. This is the reason why British insisted that education and especially higher education should be available only in English. As a result, unfortunately in independent India, there is a lack of good educational books not only in regional languages but also in Hindi.

  • The British created an education system that could prepare people who work for the British, do jobs for the British. Unfortunately, even today, a student pursues education in order to get a job (A good job today is one in which a person can make a "career"). There are very few students today who do so to become competent, self-reliant. (In another article)

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