हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (16)

भीख परोपकार नही है / Alms is not charity

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एक वर्ष समाप्त होने को आ रहा है और बहुत से लोग आने वाले नववर्ष में वे क्या-क्या करना चाहते है उस संबंध में अभी से विचार करने लगेंगे। कुछ लोग अपने अधूरे संकल्पों (किसी अच्छी बात को करने का दृढ निश्चय करना) को शीघ्र समाप्त करने का प्रयास कर रहे होंगे। कुछ व्यक्ति यह स्मरण करने का प्रयास कर रहें होंगे कि उन्होंने अपने लिए इस वर्तमान वर्ष के लिए क्या संकल्प लिए थे। तो कुछ व्यक्ति इन सब से अलग वर्ष के समापन और नववर्ष के आगमन को मौज-मस्ती से मनाने के लिए क्या होना चाहिए, कैसे होना चाहिए इन विचारों में व्यस्त होंगे।


वर्तमान वर्ष की समाप्ति व नए वर्ष के आरम्भ का समय अवश्य ही आकलन व भविष्य के लिए संकल्प लेने का समय है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की साधारणत: हमारे संकल्प ‘स्व-केंद्रित’ (मैं और मेरा परिवार) होते हैं। अपनी संकल्प पूर्ति हेतु जब व्यक्ति कार्य करता है तब उसके समक्ष उद्देश्य-पूर्ति के अतिरिक्त अन्य कोई विचार नहीं होता। वह इसका विचार नहीं करता कि उसके कार्यों का अन्य जनों पर जो उसके कार्य से प्रभावित होते हैं, क्या असर होगा। व्यक्ति अपने मन के भाव व अपनी सोच को प्राथमिकता देता है और चिंतन के बिना ही कार्य कर देता है।


हम निरंतर गरीब, बेसहारा-लाचार, बेघर असहाय, भिखारी लोगों को देखते हैं। ऐसे लोगों को देख कर हमारे ह्रदय में करुणा जाग्रत होती है और मन में आता है कि हमें इनकी मदद करनी चाहिए। मन कहता है की यदि हम इनकी मदद करेंगे तो इनका भला होगा और हमें भी पुण्य मिलेगा। यह पुण्य पाने की लालसा हमे कर्म के लिए प्रेरित करती है और हम व्यक्ति की अपनी दृष्टि अनुसार मदद कर देते हैं। अधिकांशत: यह सहायता आर्थिक-सहायता होती है। यह कहना असत्य नहीं होगा कि हम सहायता नहीं करते अपितु समझते हैं कि हमारी इस तथाकथित आर्थिक-सहायता (परन्तु वास्तविकता में भीख) से उस व्यक्ति की सहायता हो रही है। यह हमारा दृष्टिकोण है कि धन से व्यक्ति अपने कष्ट दूर कर सकता है और सुखी हो सकता है अत: हम भीख दे कर समझते हैं कि हमने व्यक्ति का भला कर दिया।


रोगी का उपचार, बे-घर के लिए आश्रय, बच्चों के लिए शिक्षा, शोषितों के लिए मुक्ति आदि सहायता के अन्य रुप हो सकते हैं। बहुत ही कम लोग हैं जो इस प्रकार की सहायता से दूसरों के कल्याण का प्रयास करते हैं।


क्या भीख देने से हम वास्तव में भिखारी का भला कर रहे है? यह प्रश्न हमें भीख देने से पहले अपने से सदैव करना चाहिए। कहीं पुण्य के लालच में न चाहते हुए भी हमसे पाप तो नहीं हो रहा। यदि कुछ भी अनुचित हो रहा है, चाहे वह अपरोक्ष रुप से हो अथवा परोक्ष (जो स्पष्ट दिखाई न देता हो; छिपा हुआ) रुप से, उस पाप का फल हमें अवश्य मिलेगा।


आर्थिक-सहायता उसी व्यक्ति के लिए उचित है जो उस धन से अपने जीवन-निर्वाह के लिए अथवा किसी अन्य श्रेष्ठ कार्य के लिए और अधिक धन अथवा जन-संसाधन का सृजन करे।


आज विश्व भर में भीख मांगना एक व्यवसाय जैसा बनता जा रहा है। भीख मांगने वाले अपनी दयनीय स्थिति दिखा कर हमारी करुणा को झकझोर कर हमसे धन की अभिलाषा रखते हैं। हमारी भावनाओं का अनुचित लाभ उठाने के लिए ये नित-नए उपाय भी खोजते रहते हैं।


विश्व में लगभग सभी समाज 'पुरुष-प्रधान' है और इनमें वृद्ध, स्त्री व बच्चों को कमजोर एवं क्षिथिल माना जाता है। प्राणियों में भूख एक ऐसी प्राकृतिक अग्नि या पीड़ा है जिसे समृद्ध व्यक्ति ने भी अवश्य अनुभव किया है। यही कारण है कि करुणा को जागृत करने की उद्देश्य-पूर्ति हेतु हमें मुख्यत: भिखारी के रुप में भूख से विचलित अति-दीन, मैले-कुचैले फटे वस्त्र पहने, लाचार दिखने वाले वृद्ध, स्त्री व बच्चे ही दिखाई देते हैं। विकलांग पुरुष के लिए हमारे ह्रदय में करुणा उत्पन्न हो सकती है परन्तु शारीरिक रूप से सही दिखने वाले पुरुष के लिए नही। ऐसे में ये शारीरिक रूप से पूर्ण दिखने वाले पुरुष धार्मिक आस्थाओं का सहारा ले कर भीख मांगने का प्रयास करते हैं।


हमारे ग्रंथों में कहा गया है:

आत्मार्थं जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानवः ।

परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति ॥


अर्थात: इस जीवलोक में स्वयं के लिए कौन नहीं जीता! परंतु, जो परोपकार के लिए जीता है, वही वास्तव में जीता है।


परोपकारशून्यस्य धिक् मनुष्यस्य जीवितम् ।

जीवन्तु पशवो येषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥


अर्थात: परोपकार रहित मानव के जीवन को धिक्कार है। वे पशु धन्य है, मरने के बाद जिनका चमडा भी उपयोग में आता है।


अध्ययन करने पर हम पाएंगे कि हमारे पूर्वजों ने सदा परोपकार की बात कही है। "दान" भी सदा परोपकार के उद्देश्य से ही देने को बताया है। कहीं पर भी हमें 'भीख' का उल्लेख नहीं मिलेगा अपितु हम 'भिक्षा' का वर्णन अवश्य पाएंगे। 'भिक्षा' शब्द में 'शिक्षा' निहित है। 'भिक्षा', वह अनुदान है जो शिक्षा देने पर मिलता है। साधु-संयासी, ऋषि-मुनि, ब्रह्मचारी आदि समाज में 'भिक्षा' पाते थे, 'भीख' नही। यह हमारा दुर्भाग्य है कि अपने अधूरे ज्ञान के कारण बहुत से लोग भीख और भिक्षा को एक दूसरे का पर्याय समझते हैं।


परोपकार शब्द 'पर' व 'उपकार' की संधि है अर्थात किसी दूसरे पर उपकार जिसका तात्पर्य है किसी दूसरे का कल्याण इसी लिए "परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्" अर्थात परोपकार पुण्यकारक है, और दूसरे को पीडा देना पापकारक है, ऐसा कहा गया है। किसी दूसरे का कल्याण हम तभी मान सकते है जब उसकी वर्तमान स्थिति शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से उसकी पहले की स्थिति से अच्छी हो। भीख में धन के रूप में दी गई सहायता किसी भी प्रकार से भिखारी का कल्याण नहीं करती। हमारे मस्तिष्क में विचार उठ सकता है कि भीख में धन देने से भिखारी का बौद्धिक, सामाजिक अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से कल्याण न हो परन्तु प्राप्त हुए धन से वह भोजन खरीद कर पेट भर सकता है जिससे उसकी शारीरिक अवस्था पहले से अच्छी होगी। भीख के पैसों से वह पुराने पर सही दिखने वाले वस्त्र खरीद भिन्न ऋतुओं से अपना बचाव कर सकता है। हमारा यह विचार आंशिक रूप से ही सही है। उत्तर के लिए हम स्वयं से ही प्रश्न करें कि हम शारीरिक रूप से स्वस्थ दिखने वाले की अथवा शारीरिक रूप से दुर्बल दिखने वाले की सहायता करेंगे। यही प्रश्न हम वस्त्रों के संदर्भ में स्वयं से करें। हमें अपने प्रश्नों के उत्तर स्वयं ही मिल जाएंगे कि क्यों इतनी भीख मिलने के पश्चात भी भिखारियों की स्थिति अच्छी नहीं होती अपितु इनकी संख्या अधिक हो जाती है।

हम सभी ने कितने ही व्याख्यान सुने है कि कैसे गिरोह भिखारियों का शोषण करते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को विकलांग बना दिया जाता है। कुपोषित महिलाओं से संताने पैदा की जाती है कि भीख में और अधिक धन मिल सके (क्या आप सोच सकते हैं कि एक दीन, असहाय, कुपोषित, लाचार स्त्री, जिसके स्वयं के जीवन की कोई आस नहीं है, किसी संतान को जन्म देना चाहेगी?)। यह सब इन भिखारियों के गिरोह चलाने वाले धन के लिए करते हैं। यदि इन भिखारियों को धन नही मिलेगा तो ये गिरोह वाले इनसे धन नहीं छीन पायेंगे और संभवत: यह शोषण यदि समाप्त नहीं होगा तदापि इसमें कमी अवश्य आऐगी।


मेरा आपसे अनुरोध है कि अपने नववर्ष के संकल्पों में आप एक संकल्प और लें कि अब से आप कभी भी भीख में धनराशि नहीं देंगे। आप पके-पकाए भोजन, वस्त्र, खाद्य-पदार्थों का दान ऐसे करेंगे कि गिरोह वाले इन वस्तुओं को भिखारियों से छीन, उन्हें बेच कर धन न पा सकें।


हम न भूलें कि

  • हमारे द्वारा किसी की सहायता उसके स्वयं के लिए उसके शोषण का कारण न बने।

  • सहायता सदैव परोपकार के उद्देश्य से होनी चाहिए।

  • आपके द्वारा की गई सहायता व्यक्ति के स्वाभिमान को किसी भी प्रकार से कम न करे।

  • भीख व्यक्ति के स्वाभिमान को खा जाती है और उसे दासता की ओर धकेलती है।

  • आर्थिक-सहायता का सरलता से दुरुपयोग हो सकता है। अत: आर्थिक-सहायता गहन चिंतन के पश्चात ही करें।

  • यथा-शक्ति व पूर्ण सामर्थ्य अनुसार की गई सहायता कापरिणाम मधुर होता है।


Alms is not charity

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The year is coming to an end and many people will start thinking about their resolutions for the coming new year. Some people may be looking into their resolutions for the current year and try to finish their unfinished tasks. Others may be trying to remember the resolutions they made for themselves for this current year. Few people might be thinking about the new year celebrations, where to party and with whom to party, and how to make the party more colourful and interesting.


The time between the end of the year and beginning of the new year is definitely the time for assessment and making resolutions for the future. It will not be an exaggeration to say that our resolutions are generally self-centered (me and my family). While achieving ones resolution (goal) a person does not consider the effects his actions may have on others. The person gives priority to his thoughts and resolutions and acts without much thinking.


We constantly see poor, destitute, helpless, homeless people begging for alms. When we see such people, our heart gets filled with compassion and we feel that we should help them. We think that our help will be good for them and we will be blessed and rewarded by God. This thought motivates us and we help such people accordingly. Most of the time this help is financial by nature. It would not be wrong to say that actually we are not helping, but thinking that our so-called financial-help (but in reality alms) is helping that person. It is our point of view that with money, a person can get rid of his suffering and become happy, hence by giving alms we think that we have done good to the person.


Treatment of the sick, shelter for homeless, education for children, freedom for the oppressed etc. are other forms of help. There are very few people who try to provide this kind of help for the welfare of the needy.


Are we really doing good to the beggar by giving alms? We should always question ourselves before doing so. While thinking that we are doing some good, unknowingly we might commit a sin. Whether knowingly or unknowingly if anything inappropriate happens, we will definitely have to bear the consequences.


Financial assistance is appropriate for that person who will generate more money or resource from this assistance, for his subsistence or for any other noble cause.


Today begging is becoming a business all over the world. The beggars, show their pathetic condition, shun our compassion, and desire money from us. They are constantly looking for new ways to take undue advantage of our feelings and emotions.


Almost all societies in the world are 'male-dominated' where elderly, women and children are considered fragile and weak. Hunger is such a natural pain that even the rich have experienced it. For the purpose of awakening compassion in us, we mostly see only the poorest of the poor, wearing dirty torn clothes, helpless looking aged, women and children as beggars. Compassion can arise in our hearts for a man with a disability, but not for a man who looks physically fit. In such a situation, these physically perfect looking men try to beg by taking advantage of religious beliefs.


In our scriptures it is said:


ātmārth jīvalokesmin ko na jīvati mānavah ।

param paropkārārth yo jīvati sa jīvati ॥


Meaning: Who does not live for himself in this world! But, one who lives for charity, lives in realty.


paropkārshunyasy dhik manushyasy jīvitam ।

jīvantu pashvo yeshām charmāpyupkarishyati ॥


Meaning:The life of a human without benevolence is damned. Blessed are those animals, whose skin is useful even after death.


Our ancestors have always talked about benevolence. "Donation" must always be intended for welfare. Begging is not mentioned anywhere. We will definitely find description of 'Bhiksha' in our scriptures. Shiksha (teaching) resonates in the word 'Bhiksha'. 'Bhiksha' is the grant given for teachings. ‘Sadhus-Sanyasis’, ‘Rishi-Muni’, ‘Brahmachari’ etc used to get 'Bhiksha' in the society, not 'alms'. It is unfortunate that due to ignorance and incomplete knowledge, many people consider begging and ‘Bhiksha’ to be synonymous.


The word 'Paropkār' is a conjugation of 'par' and 'upkār', which means benevolence to others or welfare of others. It is said, "paropakārah punyāy, pāpāya parpidanam" meaning charity is virtuous, and causing pain to others is sinful. We can say the welfare of a person is, if his present condition gets better than his earlier condition either physically, intellectually, socially or spiritually. The help given in the form of money as alms does not benefit the beggar in any way. A thought may arise in our mind that with the alms received the beggar may not benefit intellectually, socially or spiritually but, he can at least buy food to fill his stomach, which will make his physical condition better than before. With these alms, he can buy old suitable looking clothes and protect himself from different seasons. Our view is only partially correct. Let us ask ourselves whether we will help the physically healthy person or the physically weak person. The same question should be asked in the context of clothes. We will get the answers to our questions ourselves that even after getting so much alms, the condition of beggars does not improve, rather their numbers increase.


We all have heard many stories about how gangs exploit beggars. Small children are made physically handicapped. Malnourished women are made pregnant to produce children so that these gangs can get more money from begging (can you imagine a poor, helpless, malnourished woman, who has no hope for her own life, would like to give birth to a child?). All this is done for the money by the goons who operate these gangs of beggars. If these beggars do not get money, then these gangsters will not be able to snatch money from them. This will definitely decrease the exploitation albeit not bring an end to it.


I request you to consider one more resolution in your New Year's resolutions that from now on you will never give money as alms. You will donate cooked food, clothes, food items in such a way that the gangsters will not be able to snatch these things from the beggars and get money by selling these items.


Let us not forget that

  • Our helping someone should not become the cause of his exploitation by others.

  • Help should always be for the welfare of the needy person

  • The help given by you should not hurt the self-esteem of the person receiving it.

  • Begging consumes a person's self-respect

  • Financial assistance can be easily misused, therefore, should be given only after thorough consideration.

  • The result of the help provided according to the strength and full capability is satisfying.

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