हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen (07)

अहिंसा परमोधर्म: / Ahinsa Parmo Dharm


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हिंदू शास्त्रों की दृष्टि से "अहिंसा" का अर्थ बताते हुए ऋषि वेदव्यास जी योगसूत्र ग्रन्थ के २ (2) अध्याय के ३० (30) श्लोक में कहते हैं :-


अंहिसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोह (व्यासभाष्य, योगसूत्र २. ३०)


अर्थ: सर्वथा (मनसा, वाचा, कर्मणा अर्थात मन, वचन व वाणी से) तथा सर्वदा सब प्राणियों के साथ वैर या द्वेष (द्रोह) की भावना का न होना, अहिंसा है।


जैन मत के मूलमंत्र में ही ‘अहिंसा परमो धर्म:’ (अहिंसा सबसे बड़ा धर्म) कहा गया है। बौद्ध मत ने भी अहिंसा के सिद्धांत को महत्त्व दिया व आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिए अहिंसक आंदोलन पर बल दिया।


जैन व बौद्ध मत के सिद्धांतों में बहुत समानता है। विकारों पर विजय पाना, इंद्रियों का दमन करना और अपनी प्रवृत्तियों को संकुचित करने को ये सच्ची अहिंसा बताते हैं जिसके लिए सात्विक भोजन व ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। दोनों के अनुसार सभी जीवों को जीने का सामान अधिकार है अतएव किसी भी प्राणी का वध निषेध है। जैन तो अपने मुँह पर कपडा बाँध लेते है कि साँस लेते हुए कहीं कोई जीव भीतर न चला जाए जिससे उसकी हत्या न हो जावे। दोनों ही मतों के लिए ‘निर्वाण’ पाना जीवन का लक्ष्य है और हिंसा का त्याग किए बिना यह लक्ष्य नहीं पाया जा सकता।


हिंदू सनातन मत यहाँ भिन्नता रखता है। गीता के बाहरवेँ अध्याय मे मनुष्य को अपनी शक्ति व प्रवृति के अनुसार कर्म करते हुए प्रभु को पाने के चार मार्ग बताए हैं (श्लोक: ८ - ११ [8-11])। जैन व बौद्ध मत मुख्यत: श्लोक ८ (ध्यान-योग) को ही निर्वाण का मार्ग मानते है व श्लोक ९ (9) में कहे अभ्यास-योग को ध्यान-योग का ही अंग समझते हैं।


जैन व बौद्ध मतों के ‘अहिंसा परमोधर्म’ के सिद्धांत अनुसार किसी भी जीव को किसी भी परिस्थिति मे मारा नही जाना चाहिए। यदि सभी लोग इसे मानने लगेंगे तो खेती कौन करेगा? खेती करते समय तो अनेकों जीवों की हत्या हो जाती है। हल चलाते समय, खेत सींचते समय कितने ही कीट इत्यादि मरते हैं। बिमारी से बचने के लिए मच्छर, मक्खी आदि का नाश किया जाता है। यदि ऐसा नही करें तो अन्न नही होगा, हर ओर बिमारी फैलेगी। इन दोनों मतों का प्रचार करने वाले ये भूल रहे हैं कि जो अन्न वे खा कर उपदेश देते है वह अन्न अनेकों जीवों की हत्या के बाद ही उन्हे प्राप्त हुआ है।


इस संसार में भिन्न-भिन्न प्रवृतियों के मनुष्य हैं और यह संसार इतना बडा है कि हम सभी जनों को एक प्रवृति का नही बना सकते। जो व्यक्ति अपनी प्रवृति से ही क्रूर है, हिंसक है उसे हम एक दम या अल्प-काल मे अहिंसक नही बना सकते। ऐसा करने के लिए बहुत समय चाहिए। इन दोनो मतों ने ‘अहिंसा परमोधर्म’ का उपदेश देते हुए यह न सोचा कि हम तो अहिंसा के पुजारी हो गए और किसी को भी न मारने का व्रत ले लिया पर यदि दूसरों ने हम पर आक्रमण कर दिया तब हमे क्या करना होगा? हमारी रक्षा कैसे होगी? इस बात का उत्तर वे देते हैं कि जब लोग हिंसा का त्याग कर देंगे तब इन प्रश्नों का औचित्य ही नही रहेगा। यहाँ चिंतन करने की बात है कि यदि हिंसको के अहिंसक बनने से पहले ही हम पर आक्रमण कर दिया तब हम अपनी रक्षा कैसे करेंगे । इन दोनो ही मतों वालों ने इस पर विचार नही किया था जिसके परिणाम इतिहास में हमें मिलते हैं।


जैन व बुद्ध मत के प्रभाव से हर ओर अहिंसा की धारणा बनने लगी और क्षत्रिय जिनका कर्म युद्ध करना था, शत्रु से रक्षा करना था उनकी युद्ध की प्रवृति ही समाप्त होने लगी। हम रामायण मे पढते हैं कि बालि का वध होने पर वह श्री राम से पूछता है कि उन्होंने उसे क्यों मारा? उसकी तो श्री राम से कोई शत्रुता नहीं थी। इसके उत्तर में श्री रामचन्द्र जी ने कहा था कि जो कोई भी गौ, ब्राह्मण अथवा नारी पर अत्याचार करे वह वध करने योग्य है। इस कथन के स्थान पर अब अहिंसा की इस धारणा के कारण शत्रु, अधर्मी, दुराचारी, दुष्ट-जन, आक्रमणकारियों आदि पर बल प्रयोग से हिचकिचाहट होने लगी और किसी भी स्थिति मे प्राणी का वध पाप समझा जाने लगा, जिस कारण समाज में एक नपुंसकता सी छाने लगी और दुर्भाग्यवश यह प्रवृति हिन्दुओं मे आज भी देखी जा सकती है। इसी प्रवृति के कारण ही वे इस देश को विदेशी और मुस्लिम आक्रमणों (अन्य लेख में) से बचाने में विफल रहे। इस देश की संस्कृति व गौरव का पतन आरम्भ हो गया।


भारत के स्वतंत्रता समर में अपना योगदान देने वाले मोहनदास करमचंद गांधी जी जैन मत से प्रभावित थे और उन्होंने ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के सिद्धांत को अपने जीवन में अंगीकार किया और यह सिद्धांत सदैव उनके आंदोलनों के मूल में रहा।

गांधी जी का अहिंसा का उद्घोष पुन: भारत के हित में नहीं था। उनकी अहिंसा की परिभाषा विचित्र थी। उन्होंने भारत के क्रांतिकारियों का विरोध किया क्योंकि क्रांतिकारियों ने शस्त्र उठाए थे जिनसे हिंसा होती है पर प्रथम विश्व युद्ध में भारतियों से अंग्रेजी सेना में भर्ती होने का आह्वान किया और अंग्रेजों के लिए शास्त्र उठाना सही माना। गांधी जी की अहिंसा की समझ से उस समय के कांग्रेस के अनेक नेता जैसे, लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल), अरविन्द घोष (श्री अरबिंदो आश्रम, पुडुचेरी के संस्थापक) यहां तक कि जवाहरलाल नेहरु के पिता मोतीलाल नेहरु भी सहमत नहीं थे।

गांधी जी ने गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा कांड के बाद अपना असहयोग आंदोलन वापिस ले लिया क्योंकि यहाँ पोलिस के विरुद्ध हिंसा हुई थी पर जलियांवाला बाग हत्याकांड पर अंग्रेजों द्वारा की गई हिंसा पर कुछ नहीं कहा और दया का उदाहरण देते हुए जनरल डायर को क्षमा किया और लोगों से अपेक्षा की कि वे डायर को भूल जाएँ।



हम न भूलें कि

  • अहिंसा की मूल परिभाषा को भुला कर उसका अर्थ 'किसी का वध न करना, शारीरिक रूप से कष्ट, हानि न पहुँचाना' हो गया।

  • बाली वध पश्चात उससे संवाद में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम कहते हैं कि राजा से दंड मिलने के बाद अत्याचारी पाप-मुक्त हो जाता है। अहिंसा की परिभाषा अनुसार वे बाली से वैर-द्वेष न रखते हुए उसे सही ज्ञान देते हैं।

  • अंतिम सांसे लेते हुए भी रावण श्री राम के अनुज लक्ष्मण के प्रति वैर-द्वेष का भाव नही रखता और उन्हे शिक्षा देता है।

  • किसी के साथ, कभी भी वैर-द्वेष न करना और सदा उसके उत्थान के लिए सभी संभव कार्य करना हिंदू शास्त्रों की अहिंसा की परिभाषा है।

  • जैन व बुद्ध मत के अहिंसा के सिद्धांत का पालन कुछ लोग आंशिक रुप से कर सकते हैं यदि समाज के अन्य लोग ऐसा उनके लिए संभव करें। लेख में दिए उदहारण यह स्पष्ट करते हैं।

  • शिक्षकों ने विधार्थियों के उत्थान के लिए यदा-कदा जो दंड दिया, वह उनका शिक्षार्थियों से किसी वैर-द्वेष के कारण नहीं था, वह कोई हिंसा नहीं थी।

  • प्रथम विश्व-युद्ध में करीब १३ [13] लाख भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के लिए युद्ध किया जिसमें करीब ७४,००० [74,000] सैनिकों ने प्राण गवाँए।

  • दिल्ली के युद्ध-स्मारक इण्डिया गेट पर अंकित १३,००० [13,000] नाम केवल भारतियों के नहीं हैं। इन नामों में ब्रिटेन के सैनिकों और अधिकारियों के भी नाम हैं।

  • द्वितीय विश्व-युद्ध में करीब ८४,००० [84,000] भारतीय सैनिक मारे गए।

  • द्वितीय विश्व-युद्ध के समय १९४३ [1943] में बंगाल में भयानक अकाल के कारण भुखमरी व बीमारी के कारण लगभग ३० [30] लाख लोगों की मृत्यु हुई। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल के इस आपातकाल में भोजन व अन्य राहत सामग्री न देने के निर्णय के कारण ऐसा हुआ। भारत के अहिंसावादियों ने इस सुनियोजित हत्या को हिंसा नहीं कहा।

  • समाज में कोई भी सिद्धांत तभी तक सफल है जब तक सभी उसे स्वीकार कर, अपनावें व उसका पालन करें।

  • संतुलित समाज के लिए, उसके सभी वर्गों के लिए नियम सामान होने चाहिए।

  • इतिहास के गर्भ में बहुत से प्रश्नों के उत्तर छिपे हैं। इतिहास का ज्ञान आपको वर्तमान में सही निर्णय लेने में सहायक होगा। अपने अनुभवों से सीखना यही तो है।

  • हिंदू संस्कृति का इतिहास सबसे प्राचीन व विशाल है।

  • किसी भी बात को चूंकि वह कहने, सुनने अथवा पढ़ने में अच्छी लगती है,इसलिए स्वीकार न करें अपितु उसकी सत्यता व उसके अर्थ (परोक्ष व अपरोक्ष) के स्थापित होने पर ही उसे स्वीकार करें।

Ahinsa Parmo Dharm


ऊपर


While explaining the meaning of "Ahinsa" according to Hindu scriptures, the sage Ved Vyas ji writes in 30th shlok of chapter 2 of the Yogsutr text,: -


Ahinsa sarvatha sarvada sarvabhutaanaamanabhidroh


Meaning: Not having hatred or malice towards all living beings in any way (thought, speech and action) and always, is Ahinsa.


The doctrine of 'Ahinsa Parmo Dharm:' (non-violence is the greatest belief) is in the core of Jainism. Buddhism also gave importance to the principle of non-violence and in modern times Mahatma Gandhi emphasized on the non-violent movement for India's independence.


There is a lot of similarity between the principles of Jainism and Buddhism. As per their beliefs conquering one’s own desires, suppressing the senses and narrowing their tendencies, is true non-violence for them. To achieve this ‘Satvik food’ and celibacy are essential. According to both of them, all living creatures have an equal right to live, hence killing of any creature is prohibited. The Jains even cover their nose and mouth so that no insect gets inside their body while breathing and get killed. Achieving ‘Nirvana’ is the goal of life and this cannot be achieved without renouncing violence.


Hindu opinion differs here. In the 12th chapter of the Gita, four different ways depending on person’s instinct and capability to achieve God are mentioned (shlok: 8-11). Jainism and Buddhism believe in shlok 8 (Dhyan-yog) as the path to Nirvana and consider the Abhyas-yog (shlok 9) as part of Dhyan-yog.


According to the principle of 'Ahinsa Parmo Dharm' of Jain and Buddhist beliefs, under no circumstances should no living-being be killed. If everyone starts following this principle then who will do the farming? Ploughing and irrigation of fields to get food is not possible without insects and small animals getting killed. Mosquitoes, flies, etc. are eradicated to prevent disease. If it is not done, disease will spread everywhere.


People of different nature having different tendencies live in this world and this world is so big that we cannot convince all of them to follow same principles and have similar behavior. We cannot make a person who is cruel or violent by nature, a non-violent person in a short span of time. A lot of time may be needed for this change. While preaching 'Ahimsa Parmo Dharm', both of these sects did not think that we have become followers of non-violence and have taken vow to not to kill anyone, but what shall we do if someone attacks us? How will we protect ourselves? They answer that when people will give up violence these questions will not be relevant. The question remains how would we protect ourselves if violent people attack us before they became non-violent. Neither of these two sects gave any thought to it before they preached this principle. History has proved it.


Due to the influence of Jainism and Buddhism, the notion of non-violence started to build up everywhere. As a consequence the Kshatriyas, whose duty was to fight and protect when attacked, were moving away from war. We read in Ramayan that when Bali is injured and dying, he asks Shri Ram why did he kill him? He had no enmity with Shri Ram. In response to this, Shri Ram said that whoever persecutes a cow, a brahmin or a woman must be killed. In contradiction to this, due to the notion of non-violence of the two beliefs, people were hesitant to use force on enemy, vicious, evil people, invaders etc. The killing of living being was considered as a sin, which spread a type of impotency in the society. Unfortunately this can be seen even today among Hindus. Due to this attitude, they failed to protect the country from foreign and Muslim invasions (in other articles). The glory and culture of this country started to decline.


Mohandas Karamchand Gandhi, who has contributed to India's independence struggle, was influenced by Jainism. He adopted the principle of 'Ahinsa Paramo Dharm' in his life and this principle was always at the core of his movements.


Gandhi's proclamation of non-violence was again not in India's interest. His definition of non-violence was strange. He opposed the revolutionaries of India because they had taken up arms against the British which meant violence for him. On the contrary, during World War I he called upon the Indians to enlist in the British Army. It was right for him if Indians picked up arms in favour of the British. Many Congress leaders of that time, like Lal-Bal-Pal (Lala Lajpat Rai, Bal Gangadhar Tilak, Vipin Chandra Pal), Arvind Ghosh (Founder of Sri Aurobindo Ashram, Puducherry), even Jawaharlal Nehru's father Motilal Nehru did not agree with Gandhi's understanding of non-violence.



Gandhiji withdrew his non-cooperation movement after the Chauri-Chaura incident in Gorakhpur district because there was violence against the police, but he did not say anything about the violence committed by the British during the Jallianwala Bagh massacre. Gandhiji even pardoned General Dyer (ordered the massacre), to set an example of mercy and expected the same from fellow Indians.


Let us not forget that

  • The original meaning of “Ahinsa” got lost and to not to harm anyone physically or kill anyone became the meaning.

  • During the dialogue with Bali, Shri Ram says that the tyrant becomes sin-free after getting punished by the king. Shri Ram did not show enmity but imparts the right knowledge to Bali and acts in-line with the definition of non-violence as per Yogsutr.

  • Even on his death bed, Ravan does not have enmity towards Shri Ram's brother Laxman and preaches to him.

  • The definition of non-violence in Hindu scriptures is not to have enmity towards anyone and always do the needful for the betterment of all.

  • Some people can follow the principle of non-violence of Jainism and Buddhism if others in the society make it possible for them. (Examples in the article make it clear)

  • Occasionally, the punishment that the teachers gave for the good of the students was not due to any animosity towards them. It was not violence.

  • In the 1st World War, about 13 lakh Indian soldiers fought for the British and about 74,000 soldiers lost their lives.

  • The 13,000 names inscribed on Delhi's war memorial India Gate are not of Indians only but also include the names of British soldiers and officers.

  • Around 84,000 Indian soldiers got killed in World War II.

  • Around 30 lakh people died of starvation and disease due to terrible famine in Bengal at the time of World War II in 1943. This was because of British Prime Minister Churchill's decision not to provide food and other relief material during this famine. India's non-violence activists did not call this planned murder a violence.

  • Any doctrine in society is successful as long as everyone accepts it, adopts it and follows it.

  • For a balanced society, the rules should be same for all.

  • Answers to many questions are hidden in the womb of history. Knowledge of history will help you in making the right decision in the present. This is what we call as, “we learn from our experiences”.

  • The history of Hindu culture is the most ancient and vast.

  • We should not accept anything because it sounds good, but should accept it when its truth and meaning (indirect and indirect) are established.

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