हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen

हिन्दुओं के १६ संस्कार - भाग (९/९)

16 Sanskārs of Hindus – part (9/9)

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वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।

[भगवत गीता २.२२]


अर्थ: जैसे मनुष्य जगत में पुराने जीर्ण वस्त्रों को त्याग कर अन्य नवीन वस्त्रों को ग्रहण करते हैं, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नवीन शरीरों को प्राप्त करती है।


जीवात्मा का उद्देश्य है कि वह जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर निकल कर चिर-आनंद की स्थिति 'मोक्ष' को प्राप्त करे। जब तक आत्मा को मोक्ष प्राप्त नहीं होगा तब तक आत्मा इच्छाओं की पूर्ति के लिए नित नए शरीर धारण कर कर्म करती रहेगी। जब तक इन इच्छाओं का अंत नहीं होगा, यह जन्म-मरण का चक्र चलता ही रहेगा।


यह शरीर नश्वर है और इसे एक दिन नष्ट होना ही है। देह से प्राण निकल जाने के पश्चात मृत-देह प्रकृति के तत्वों में ही भली प्रकार मिल जाए न कि प्रकृति को कोई हानि पहुंचाए इसका ध्यान रखते हुए हमारे ऋषिओं ने मृत-देह के लिए भी संस्कार बताया है।


१६) अंत्येष्टि संस्कार: अन्त्य (अंतिम) + इष्टि (यज्ञ) = अंत्येष्टि। यह शरीर के अंत का संस्कार है। इसके बाद कोई अन्य संस्कार नहीं होता है। इसी को नरमेध, नरयाग, दाह-संस्कार आदि कहा जाता है।


विश्व के भिन्न-भिन्न मत एवं धारणा वाले समाज व्यक्ति के मृत शरीर को पृथ्वी, जल, अग्नि अथवा वायु में से किसी एक को भेंट करते है। शव को भूमि में गाड़ दिया जाता है, अथवा जल में प्रवाहित कर दिया जाता है, या फिर उसे जला कर अग्नि को समर्पित किया जाता है और कुछ लोग तो शव को खुले वातावरण में छोड़ कर उसे वायु को समर्पित करते हैं।


मृत्यु के पश्चात शरीर की प्रतिरोधक शक्ति समाप्त हो जाती हैं। भिन्न-भिन्न जीवाणु एवं रोगाणु देह पर आक्रमण कर उसका विघटन आरम्भ कर देते है। देह घुलने व सड़ने लगती है। यदि समय पर उचित उपाय न किए जाए तो वह देह न केवल दुर्गन्ध अपितु भिन्न रोगों को जन्म देने का कारण भी बन सकती है।


हमारे ऋषियों ने अंत्येष्टि संस्कार के रूप में एक वैज्ञानिक मार्ग सुझाया है जो सुनिश्चित करता है कि मृत देह 'पंच-तत्व' में विलीन हो जाए और साथ-साथ पर्यावरण एवं प्रकृति को हानि नहीं पहुंचे अपितु उनका संरक्षण भी हो जाए।


उचित मात्रा में घी तथा विशेष हवन सामग्री (विभिन्न जड़ी-बूटी एवं पदार्थों से युक्त सामग्री) से किया दाह संस्कार का होम हवा से भी हल्के सूक्ष्म कणों में परिवर्तित हो कर मृत शरीर को 'पंच-तत्व' में विलीन कर देता है और वातावरण के संरक्षण के साथ उसकी शुद्धि भी करता है।


शवों को जलाने से भूमि बहुत कम प्रयोग में आती है। शवों को दफनाने पर कब्रों से स्थान -स्थान पर भूमि घिर जाती है। शव के विघटन से कब्रिस्तान की भूमि एवं भूमिगत जल दूषित हो जाते हैं। यदि शव को गहराई से नहीं दबाया जाता तो पशु द्वारा मृत-शरीर को खोद कर खा जाने का भय रहता है। ऐसे में पशु रोगी हो कर मनुष्यों में भी रोग फैला सकता है। हम सभी ने समाचार सुने है कि कुछ पतित लोग तो मुर्दों को उखाड़कर उनके साथ कुकर्म तक कर देते है।


शव का जल-प्रवाह भी उचित नहीं है। जल-जंतु शव को चीर-फाड़कर खा सकते हैं परन्तु ऐसा सभी जल स्रोतों में संभव नहीं है। हड्डियाँ, मल, आदि जल में ही रहेंगे जो जल को दूषित करेंगे, वातावरण में दुर्गंध फैलाऐंगे।


शव को खुले में छोड़ देना कि मांसाहारी पशु-पक्षी उसे नोच खाएं भी उचित नहीं है। हड्डियों की मज्जा व मल सड़कर दुर्गंध करेंगे। पशु-पक्षी मांस के टुकड़े इधर-उधर ले जा सकते हैं और वातावरण को दूषित कर सकते हैं।


स्वास्थय-रक्षा के विचार से, भूमि, जल व वातावरण के संरक्षण के विचार से शव को जला कर भस्म कर देना ही सबसे उचित है। आज जैसे-जैसे पश्चिमी जगत में मृत-शरीर को दफनाने के दुष्परिणामों का ज्ञान बढ़ रहा है लोग शव-दाह की प्रक्रिया स्वीकार कर रहे हैं। किन्ही देशों में तो शव-दाह का अनुपात शव को गाड़ने से अधिक हो गया है


विज्ञान किसी भी विषय का विस्तृत ज्ञान है व ज्ञान की विवेचना (विचार) बुद्धि द्वारा ही हो सकती है। प्रकृति व प्रकृति के नियम ऐसा विज्ञान हैं जो नित्य है, शाश्वत है व जिसे कभी भी बदला नहीं जा सकता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रकृति के नियमों में परिवर्तन असंभव है। हमारे ऋषि-मुनियों का दृष्टिकोण सदैव वैज्ञानिक रहा है। मानव मनोविज्ञान को समझते हुए हमारे ऋषि-मुनियों ने हमें वह मार्ग बताया है जिसे हमारी बुद्धि तर्क की कसौटी पर स्वीकार कर सके। वह मार्ग प्रकृति के नियमों की भाँति सदैव अटल हो व एक प्रकाश-स्तंभ की भाँति नित्य हमारा मार्गदर्शन करता रहे। वे मानते थे कि जब किसी भी कार्य के उद्देश्य को बुद्धि स्वीकार कर लेगी तो मनुष्य में उस कार्य-पूर्ति के लिए विशेष उत्साह व ऊर्जा का संचार होगा। बुद्धि उद्देश्य के उचित अथवा अनुचित होने के तुलनात्मक निष्कर्ष के उपरांत ही कर्म करने की आज्ञा देगी जिससे अनियंत्रित इच्छाओं पर विजय पाने में भी सफलता मिलेगी। यही कारण है कि आपको लोग यह कहते मिल जाएंगे कि हिन्दू जीवन-शैली विज्ञान से जुडी हुई है। कोई अन्य धर्म, मत-मतान्तर नहीं अपितु सनातन-धर्म ही वैज्ञानिक है।


हम न भूलें कि

  • जैसे प्रत्येक बीज एक बीज भी है और वृक्ष का फल भी ऐसे ही प्रत्येक संस्कार कर्म का फल भी है और बीज भी।

  • स्वार्थ, हिंसा और चिंतन-हीनता ये पशु गुण है। चिंतन-शीलता, परोपकार, अहिंसा, विवेक-शीलता श्रेष्ठ गुण है। जिस प्रकार के गुण जिसमे अधिक है उसी प्रकार की योनि मे उसका जन्म होगा।

  • आत्मा की संपत्ति है उस पर पडे संस्कार और उसका ज्ञान जिनके कारण वह अच्छी या बुरी योनि, अच्छा या बुरा तन इस संसार मे प्राप्त करती है।

  • पूर्व-जन्म के कर्मों के फल-स्वरूप आपको यह मानव तन और यह सब कुछ प्राप्त हुआ है परन्तु अब जो आप कर्म कर रहे हो उनके फल-स्वरूप आप क्या पाओगे सदा इसका भी विचार करो।


16 Sanskārs of Hindus – part (9/9)

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vāsānsi jīrṇāni yathā vihāy navāni gṛahṇāti naroparāṇi |

tathā śharīrāṇi vihāy jīrṇānyanyāni sanyāti navāni dehī ||

[Bhagwat Gita 2.22]


Meaning: Just as human beings discard old worn-out clothes and adorn new clothes, similarly the soul leaves the old body and acquires new bodies.


The aim of the soul is to break the cycle of birth and death and attain salvation 'mokśh' the state of eternal-peace. As long as the soul does not attain salvation, the soul will continue to acquire new bodies for the fulfillment of its desires. As long as these desires exist, the cycle of birth and death will continue.


This body is mortal and it will be destroyed one day. After death the dead body should disintegrate in such a way that it becomes one with the elements of nature without harming it. Our sages have suggested the rites for the dead body which do not harm nature.


16) antyeśhti sanskār: ‘antya (final) + iśhti (yajna) = antyeśhti’. This is the sacrament of the end of the body. After this no other rituals take place. This sanskār is also called ‘narmedh’, ‘narayāg, ‘dāh- sanskār’ etc.


Societies of this world with different believes have different practices for the last rite of a person. They offer the dead body to any one of the elements of nature, namely earth, water, fire or air. The dead body is buried in the ground, or let to flow in water, some cremate it whereas some people leave the dead body in the open.


Since the body's resistance power ends after death, different bacteria and germs attack the body and start its disintegration. The body starts decomposing and it decays. If proper measures are not taken on time, then that body can become the cause of not only bad odor but can also become the cause and spread of a disease.


Our sages have suggested a scientific way in the form of funeral rites, which ensures that the dead body completely assimilates into the five elements of nature (panch-tattv) and at the same time does not harm the environment and nature, rather protect it.


The ‘hom’ or ‘havan’ as final disposition of a dead body through burning is done with the appropriate amount of ghee and special ‘havan-samigrī’ (materials containing various herbs and substances). This ‘hom’ disintegrates the dead body into the 'pancha-tattv' by converting it into tiny particles and molecules even lighter than air. This ‘hom’ protects the environment and also purifies it.


The land needed to burn dead bodies is very less compared to burying them as a lot of land is needed for this. Decomposition of the buried dead body causes contamination of the soil and underground water of the cemetery. If the corpse is not buried deep enough, there is fear of animal digging it up and eating it. This may make the animals become sick and might spread disease among humans. We have also heard about ‘psychotic’ people who dig out dead bodies out of graves and mishandle them.


Disposing the dead bodies in water is also not proper. Water animals cannot consume the whole corpse. The remains (bones, feces, etc.) will remain in the water and will contaminate it. A water-swollen corpse (in the absence of water scavangers) will smell foul and contaminated water will spread water-borne diseases.


Leaving the corpse in the open so that scavengers can feed on it, is also not proper. The bone-marrow and feces will rot and stink. Animals and birds can carry around pieces of meat and contaminate the environment.


Keeping in mind the protection of ​​health, along with land-, water- and environment-conservation burning of dead bodies to ashes is the most appropriate. Today, as the knowledge of the ill-effects of burying the dead body is increasing, people in the western world are accepting the process of cremation. In some countries, the ratio of cremation has exceeded that of burial.


Science is the detailed knowledge of any subject and knowledge can be enhanced only by developing intellect. Nature and the laws of nature are science which is eternal and does not change. It would not be wrong to say that it is impossible to change the laws of nature. The attitude of our sages has always been scientific. Understanding human psychology, our sages have shown us the path that our intellect can accept on the basis of logic. May that path always be unshakable like the laws of nature and guide us like a beacon of light. Our sages believed that when the intellect accepts the purpose of any work, then there will be a special enthusiasm and energy in a person to fulfill that task. The intellect will give the permission to act only after the comparative conclusion of the objective of its being right or wrong. This will also enable a person to conquer his uncontrolled desires. This is the reason why you find people saying that ‘Hindu way of life’ is related to science. No other religion is scientific, but Sanatan-Dharm.


Let us not forget that

  • Just as every seed is not only a seed but also the fruit of the tree, similarly every sanskār is also not only the fruit of every action but also it’s reason (seed).

  • Selfishness, violence and thoughtlessness are animal qualities. Thoughtfulness, charity, non-violence, prudence are good qualities. The dominating qualities will influence the next birth of the soul.

  • The imprints on the mind and its knowledge are the property of the soul which enable it to acquire good or bad category and good or bad quality of body and life.

  • We have acquired this human body and all the things as a result of the actions of our previous births, but always think about which type of body we will get as a result of the actions in the existing life.

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