हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen

हिन्दुओं के १६ संस्कार - भाग (७/९)

16 Sanskārs of Hindus – part (7/9)

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गुरुकुल में रहकर, गुरु से समस्त वेद-वेदागों की शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत शिष्य जब गुरु की कसौटी पर खरा उतर जाता था तब गुरु उसकी शिक्षा पूर्ण होने के प्रतीकस्वरुप उसका समावर्तन-संस्कार करते थे। यह संस्कार एक या अनेक शिष्यों का एक साथ भी होता था। (वर्तमान समय में दीक्षान्त समारोह, समावर्तन संस्कार जैसा ही है किंतु उसका रुप व उद्देश्य बदल गया है।)


१२) समावर्तन संस्कार: 'समावर्तन' का शाब्दिक अर्थ 'वापस लौटना' है। गुरुकुल में शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात गुरु विद्यार्थियों को उनके भावी जीवन (गृहस्थाश्रम) के दायित्वों के संबंध में बताते थे। गृहस्थ जीवन में शिष्य को सभी प्रकार की समस्याओं का सामना स्वयं ही करना होगा व उनका समाधान भी स्वयं ही खोजना होगा। इस स्थिति को गुरु भली प्रकार से समझते थे इसलिये ब्रह्मचारी स्नातक को गुरु आश्रम छोड़ने से पूर्व सामाजिक जीवन के लिए हितकारी एवं जीवनोपयोगी शिक्षा देते थे जिससे वह सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत कर सके। इस अंतिम उपदेश के साथ शिष्यों की गुरुकुल से विदाई की जाती थी। इस संस्कार के उपरांत विद्यार्थी अपने अभिवावकों के पास वापिस लौटता था।


गुरु शिष्य को 'सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्।' के साथ विदा करता था।


सत्यं वद - गुरुकुल के बाहर झूठ भी बोला जाता है। स्मरण रहे कि झूठ तभी तक चलता है जब तक सत्य उजागर नहीं होता और लोग उस झूठ को ही सच माने रहते हैं। झूठ की आयु थोड़ी है। सत्य ही अनंत है।


धर्मं चर - जिन नियमों से समाज का धारण होता है अर्थात जिन नियमों के आधार पर समाज टिका हुआ है वह धर्म है। वेदों में उन नियमों, आचार-व्यवहार का वर्णन है जिनके पालन करने से समाज बना रहता है व उल्लंघन से समाज छिन्न-भिन्न हो जाता है। जीवन में सदा धर्म का पालन अर्थात ऐसा व्यवहार जो व्यक्ति, समाज व देश, तीनों के हित में हो, करना चाहिए।


स्वाध्यायान्मा प्रमदः - भले ही गुरुकुल में अध्ययन समाप्त हो गया हो फिर भी व्यक्ति को भौतिक, मानसिक तथा आत्मिक उन्नति हेतु उत्तम ग्रंथों का अध्ययन एवं 'स्व' अर्थात अपने आप का अध्ययन करते रहना चाहिए।


कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम् - कल्याणकारी कार्यों एवं संसाधनों के विकास में कदाचित प्रमाद नही करना है।


आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः - आचार्य के लिए जो प्रिय धन है: 'शिष्यों की प्रजा' उसके तंतु (श्रंखला) को नहीं तोड़ना है। हम सभी ने 'गुरुदक्षिणा' के विषय में सुना हुआ है। आचार्य का प्रिय धन द्रव्य (रुपया, पैसा, सोना, चाँदी, आदि) नही अपितु शिष्य हैं। आचार्य कह रहे हैं कि शिष्य को संतान को जन्म देना चाहिए कि जिस प्रकार वह शिक्षाध्ययन हेतु गुरुकुल आया है वैसे ही उसकी संतानें भी विद्याध्ययन के लिए आचार्यों के पास गुरुकुल में आती रहें।


वैदिक जीवन चार आश्रम और चार वर्णों पर केन्द्रित व्यवस्था व प्रणाली है। इस व्यवस्था में गृहस्थ आश्रम के आश्रय ही अन्य आश्रम स्थिर रहते हैं। गृहस्थ आश्रम के बिना किसी आश्रम का कोई व्यवहार सिद्ध नहीं होता है। इस संसार में जो कुछ व्यवहार है उस का आधार गृहस्थ आश्रम है। यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी की समाज की संरचना की रीढ़ गृहस्थ आश्रम है। विवाह का होना गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना होता है।


१३) पाणिग्रहण संस्कार: 'पाणि' का शाब्दिक अर्थ है 'हाथ'। जब कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे तो दोनों एक दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं। आज समाज में पाणिग्रहण संस्कार 'विवाह' अथवा 'शादी' समारोह के रूप में प्रचलित है। यही एक संस्कार है जिसे समाज में अत्यधिक भव्यता से संपन्न करने की परिपाटी चल पड़ी है। प्राचीन काल में स्त्री-पुरुष में यौन सम्बन्ध जिस प्रकार हुआ उसे ध्यान में रखते हुए विवाह को ८ भिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया था।

१: ब्रह्म विवाह

२: दैव विवाह

३: आर्ष विवाह

४: प्रजापत्य विवाह

५: गंधर्व विवाह

६: असुर विवाह

७: राक्षस विवाह

८: पैशाच विवाह


ब्रह्म विवाह सबसे श्रेष्ठ एवं प्रशंसनीय विवाह है। इस विवाह में पहले योग्य वर की तलाश की जाती है। इसके बाद कन्या पक्ष के परिजन वर पक्ष से विवाह का अनुग्रह करते हैं। दोनों पक्ष में परस्पर सहमति के पश्चात कन्या को विधि-विधान से पति के साथ विदा किया जाता है।


माता-पिता को लड़का-लड़की के सहमति के बिना, उनकी प्रसन्नता के बिना विवाह नहीं करना चाहिए। लड़का-लड़की की प्रसन्नता से विवाह होने पर उनमें विरोध बहुत कम होगा और उनकी संतान भी उत्तम होगी। अप्रसन्नता के विवाह में नित्य क्लेश ही रहता है। विवाह में मुख्य प्रयोजन वर-वधु का है, माता-पिता का नहीं। यदि वर-वधु में परस्पर प्रसन्नता रहेगी तो उन्ही को सुख और विरोध होगा तो उन्ही को दुःख होता है।


यदि लड़का-लड़की स्वेच्छा से एक-दूसरे से विवाह करना चाहते है तो उन्हें चाहिए कि वे अपने विवाह हेतु अभिभावकों से अवश्य परामर्श करें। युवा जोड़े के पास जीवन में बहुत कम अनुभव होता है और माता-पिता के साथ परामर्श उनका ध्यान उन चीजों की ओर भी ले जा सकता है जिनके संबंध में संभवत: उन्होंने सोचा नहीं हो। विवाह परिवार में सभी की सहमति और परामर्श से ही हो। जब स्त्री-पुरुष विवाह करना चाहें, तब विद्या, विनय, शील, रूप, आयु, शरीर आदि का परिमाण यथायोग्य होना चाहिए।

(क्रमश :- )


हम न भूलें कि

  • 'स्व' अर्थात अपने स्वयं के अध्ययन से आप अपनी शक्तियों व क्षीणताओं को जान सकते हैं।

  • अपनी क्षीणताओं एवं त्रुटियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने वाला सफलताएँ प्राप्त करता है।

  • आपकी शक्तियां, आपकी योग्यताएँ आपके भीतर आत्म-विश्वास का संचार करती हैं और आपको उन्नति की ओर ले जाती हैं।

  • अति-आत्मविश्वास घातक है व व्यक्ति की अवनति का कारण है।

16 Sanskārs of Hindus – part (7/9)

ऊपर

After the Guru evaluates the student as ‘learned’ and was of the opinion that the student did not need further education in the gurukul, the Guru used to perform the ‘samāvartan-sanskār‘ as a symbol of the completion of his education. This sanskār was performed for one or several students together. (At present the convocation ceremony in universities is similar to the Samāvartan ceremony, but its form and purpose has changed.)


12) Samāvartan Sanskār: The literal meaning of 'Samāvartan' is 'to return'. After the completion of education in the Gurukul, the Guru used to tell the students about the responsibilities of their future life. In household life (Grihasth-āshram), the student will have to face different kinds of problems and will have to find their solutions on his own. The guru understood this situation very well hence before leaving the gurukul, the students used to get beneficial education for their future social life so that they could lead a successful life in the society. With this last sermon, the students were bid farewell from the Gurukul. After this ceremony, the student used to return to his parents.


The guru would give'satyam vad। dharmam char।svādhyāyānmā pramadah। āchāryāy priyam dhanmāhrity prajātantum ma vyavachetsīh। satyānan pramditvyam।dharmānan pramditvyam। kushalānan pramditvyam। Bhutyai na pramditvyam।'as last teaching and bid farewell.


satyam vad - Outside the gurukul boundaries people do lie. Remember that a lie only lasts until the truth is exposed and people keep believing that lie as truth. Lies have a short lifespan. Truth is immortal.


dharmam char - The guidelines by which the society is sustained, i.e. the rules, regulations and norms, conduct and behavior on which the society rests, is dharm. The Veds describe these rules, conduct and behavior. By following them the society remains intact and in case of their violation the society destablises and breaks apart. One should always follow dharm in life i.e. a behavior which is in the interest of all three; the individual, society and the country.


svādhyāyānmā pramadah - Even though the study in Gurukul is over, one should continue with self-study for one’s own physical, mental and spiritual progress. One should keep reading good texts and ‘oneself’ too.


kushalānan pramditvyam। Bhutyai na pramditvyam - One should never be lazy or late in welfare works and development of resources.


āchāryāy priyam dhanmāhrity prajātantum ma vyavachetsīh - The wealth which is most dear to the

teacher is: 'his students'. The chain of getting new students must not break. We all have heard about 'Gurudakshinā'. Teacher is not asking for any wealth (money, gold, silver, etc.) but students. The guru is saying that the student should give birth to a child, who just like him should come to Gurukul to take education.


Vedic life is a system centered on four ‘āshrams’ (life-span stage) and four ‘varns’ (human-being’s caste and category based on professional capability). In this arrangement, all ‘āshrams’ survive properly only if they are supported by ‘grihasth-āshram’ (household). It would not be an exaggeration to say that the backbone of the structure of the society is the household (grihasth-āshram). To get married is to enter the ‘grihasth-āshram’.


13) pāṇigrahaṇ sanskār: 'Pāṇi' literally means 'hand'. When the bride places her hand over the groom’s palm and the groom places his hand over the bride’s palm so that both hold each other’s hand, is called ‘pāṇigrahaṇ’. Pāṇigrahaṇ ceremony is prevalent in the society in the form of marriage ceremony. This is the only ritual which is practiced in the society with great grandeur. In ancient times, marriage was divided into 8 different categories keeping in mind the way in which sexual relations between man and woman took place.


1: brahm vivāh

2: daiv vivāh

3: ārsh vivāh

4: prajāpaty vivāh

5: gandharv vivāh

6: asur vivāh

7: rākśhas vivāh

8: paishāch vivāh


'brahm vivāh’ is the best and most appreciated form of marriage. In this marriage, first a suitable groom for the bride is sought. After this, the family members of the girl's side contact groom's family with marriage proposal. After the mutual consent of both sides, the marriage ceremony with all the rituals is performed and the bride leaves her parents’ house to live with her husband.


Parents should not marry their children without their consent. If the boy and girl marry with mutual consent there will be less differences between them. They will live happily and will have attractive and talented children. If the marriage is without their consent then it will be full of turbulences and the couple will not have a happy life. The main purpose of marriage is bride and groom coming together, not their parents. If bride and groom will have a mutual understanding, attraction and acceptance towards each other they will be happy in the relationship. In absence of these the relationship will not be happy and not only the couple but their children will also suffer under it.


If the boy and the girl want to marry each other, then before marriage they should consult their parents. The young couple has very less experience in life and consultation with parents can bring things into their notice they might not have thought about. Marriage should be done only with the consent and consultation of everyone in the family. When man and woman want to get married, then their education, intelligence, modesty, age, behavior, physical appearance, etc. should be well matched.

(To continue :- )


Let us not forget that

  • Through study of your own ‘self’ you can know your strengths and weaknesses.

  • One, who accepts his weaknesses and flaws and works to remove them achieves success.

  • Your strengths and capabilities infuse self-confidence and lead you to progress.

  • Over-confidence is fatal and is a reason of downfall of a person.

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