हम न भूलें / Hum Naa Bhooleen

हिन्दुओं के १६ संस्कार - भाग (६/९)

16 Sanskārs of Hindus – part (6/9)

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शिशु के जन्म के पश्चात अभी तक उसके जीवन में मुख्यत: उसके माता-पिता व परिवार के अन्य सदस्य संस्कार डाल रहे थे। एक आयु के पश्चात बालक (एवं बालिका) को शिक्षा के लिए गुरु के पास जाना होता है जिससे बालक नई शिक्षा ग्रहण कर सके। पूर्वकाल में शिक्षा के लिए गुरु के पास गुरुकुल में ही रहना होता था। गुरुकुल में बालक को उसकी प्रवृतियों के अनुसार ज्ञान दे कर नए साँचे में ढाला जाता था। उसकी प्रवृति को केंद्र में रख कर उसे ऐसी शिक्षा दी जाती थी, उस पर ऐसे संस्कार डाले जाते थे कि वह समाज में भली-प्रकार अपना योगदान दे सके।


१०) उपनयन संस्कार: उपनयन का अर्थ है – 'समीप या सन्निकट ले जाना'। श्रेष्ठ मनुष्य निर्माण हेतु बालक को जितना ज्ञान अब तक घर में मिला है, उससे अधिक ज्ञान की आवश्यकता होती है। उसे अब ज्ञान-प्राप्ति हेतु गुरु के पास जाना होगा। यह संस्कार बालक के गुरुकुल जाने से कुछ समय पूर्व किया जाता है। इस संस्कार का मुख्य कर्म यज्ञोपवीत धारण करना है। बालक तीन धागों का एक सूत्र जिसे 'यज्ञ सूत्र' अथवा 'यज्ञोपवीत' या 'जेनऊ' भी कहा जाता है, धारण करता है। इसे धारण करने का अभिप्राय यह था कि बालक लिखना-पढ़ना आरम्भ कर रहा है। यज्ञोपवीत विद्याभ्यास का चिह्म भी कहा जा सकता है। यह विचार करने योग्य है कि जिस देश, जिस समाज में यह संस्कार प्रचलित था वहाँ कोई अशिक्षित, अपठित कैसे रह सकता है। प्रत्येक बालक एवं बालिका का यज्ञोपवीत संस्कार अनिवार्य था। (दुर्भाग्यवश वर्तमानकल में हिन्दुओं में ऐसे मत वाले लोग भी हैं जो कन्याओं के लिए यज्ञोपवीत वर्जित बताते हैं।) आप कल्पना करिए की जो अभिभावक अपनी संतान का यज्ञोपवीत संस्कार नहीं करते होंगे वे संतानें व अभिभावक समाज में स्वयं को कितना निंदनीय अनुभव करते होंगे। कुछ लोगों का तो कथन है कि किन्ही समाज में बच्चों को यज्ञोपवीत वस्त्रों के ऊपर धारण करना होता था जिससे कि सभी को ज्ञान हो सके कि अमुक बालक विद्याभ्यास कर रहा है।


यज्ञोपवीत को व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। इसे गले में इस प्रकार डाला जाता है कि वह बाएं कंधे से कमर में दाईं ओर आता है। व्यक्ति की छाती पर यह उसके ह्रदय के स्थान के ऊपर होता है। इसके तीन सूत्र व्यक्ति को उसके ह्रदय पर पड़े ३ ऋणों का स्मरण कराते है। वे सभी जिन्होंने हमारे जीवन को सुरक्षित व उत्तम बनाने के लिए अपना योगदान दिया है, हम पर उनका ऋण है। ये ३ ऋण हैं :-


१. ऋषिऋण

२. पितृऋण

३. देवऋण


ऋषिऋण: ऋषि-मुनियों, शोधवेत्ताओं आदि का ऋण है जिन्होंने अवलोकन, चिंतन-मनन एवं साधना से ज्ञान-विज्ञान का परिचय प्राप्त कर हमे ज्ञान दिया। संन्यासी भी निरंतर उपदेश दे कर व हमें त्रुटियों से अवगत करा कर हमें सही मार्ग की ओर लेकर जाते हैं।


पितृऋण: हम माता-पिता, परिवार, गुरु, आचार्य, मित्र, राजा आदि उन सभी के जो हमें संरक्षण एवं सुरक्षित वातावरण देते हैं, ऋणी हैं। ये भी सदैव हमें हमारी त्रुटियों से अवगत कराते हैं, उन्हें सुधारने में हमारा सहयोग करते हैं कि हमारा जीवन उत्तम हो सके। (पिता को यदि हम 'जन्मदाता' नहीं अपितु 'प्राप्त करवाने वाला' के व्यापक अर्थ से देखेंगे तो हम पितृऋण को अच्छी प्रकार समझ पाएंगे।)


देवऋण: देवऋण को समझने हेतु हमें समझना होगा कि 'देव' कौन है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वैदिक काल में उन्हें जो हमें जीवन के लिए कुछ भी देते हैं, देव कहा है। 'देवो दानात्वा:' जो हमे दान दे, वह देव है। इस परिभाषा अनुसार सूर्य, चंद्र, नदी, नक्षत्र, वनस्पति, पशु-पक्षी, आदि देव हैं। इनका ऋण हम इनकी सेवा (इनका संरक्षण) कर उतार सकते हैं।


११) वेदारम्भ संस्कार: शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है। शिक्षित व्यक्ति ही स्वयं का विकास करने के साथ-साथ समाज और देश के विकास में भी सहयोग कर सकता है। उपनयन संस्कार के साथ एक अन्य संस्कार होता है जिसे वेदारम्भ संस्कार कहते हैं। इस संस्कार के नाम से ही हम समझ सकते हैं कि यह वेदों के अध्ययन को आरम्भ करने का संस्कार है। इस संस्कार को हम वर्तमान में 'विद्यारंभ संस्कार' भी मान सकते है।


हिन्दुओं के लिए सभी विद्याओं, कलाओं, शास्त्रों आदि का मूल वेद हैं इसलिए प्राचीन काल में इसे वेदारम्भ संस्कार कहा गया है। वर्तमान में शिक्षा व्यवसायिक शिक्षा तक सीमित हो गई है।


इस वेदारम्भ संस्कार में छात्र को ब्रह्मचारी जीवन के नियम बताए जाते है। उसे जीवन को सात्विक बनाने का मार्ग बताया जाता है। छात्र जीवन में उसके लिए भोग-विलास वर्जित हैं, उसे कड़े अनुशासन में रहना होगा आदि नियमों से उसे परिचित कराया जाता है। हमारे ऋषियों ने विद्याध्ययन आरम्भ करने के दिवस से ही विधार्थी के लिए उच्च आदर्श रखे थे। वर्तमान समाज में विद्यालय मात्र व्यावसायिक शिक्षा देता है। आचार एवं व्यवहार की शिक्षा आज बालक को मुख्यत: गली-मोहल्ले व परिवार में मिलती है। विद्यार्थियों के जीवन में विलासिता भी अधिक हो रही है जिसका परिणाम हमें हर ओर दिखता है। वैदिक संस्कृति में गुरु एवं गुरुकुल का कार्य छात्र-छात्राओं को सार्वभौमिक शिक्षा (आज की प्रचलित शिक्षा नहीं अपितु ऐसी शिक्षा जिसमें व्यवहारिक-शिक्षा, चरित्र-निर्माण, व्यवसायिक-शिक्षा, सांस्कृतिक-शिक्षा, एवं अध्यात्म संग्रहित था) देने का था जिससे की विद्यार्थियों में १) बौद्धिक भाव (आइ क्यू), २) भावनात्मक भाव (इ क्यू), ३) समाजिक भाव (एस क्यू) एवं ४) प्रतिकूल भाव (ए क्यू) का विकास हो सके (देखें: हम न भूलें-02) । गुरु एवं गुरुकुल श्रेष्ठ मानव- एवं समाज-निर्माण के स्तम्भ थे। (क्रमश:- )


हम न भूलें कि

  • विद्या-धन ही सबसे श्रेष्ठ धन है। इसे चोर चुरा नहीं सकते, राजा (प्रशासन) छीन नहीं सकता, इसका संभालना कठिन नहीं है, परिवार में इसका बटवारा नहीं होता। व्यय करने पर (दूसरों को देने पर) तो इसकी वृद्धि होती है।

  • किसी कथन को स्वीकार करने से पहले उचित है कि उसके तथ्यों को जानें और निर्णय लेने से पहले भली प्रकार समझें कि आप अमुक निर्णय क्यों ले रहे हैं।

  • कर्म सत्य को प्राप्त करने की राह है और सत्य को अंध-विश्वास से नही अपितु केवल तार्किक और मेधावी बुद्धि से ही पाया जा सकता है।

16 Sanskārs of Hindus – part (6/9)

ऊपर

The life of a child from the time of birth till now was mainly instilled by parents and other family members. Hereafter the child (both boys and the girls) has to go to a teacher to learn more. In the past, a child had to stay in the Gurukul (boarding school) for education where he was given education according to his interest. Keeping child’s attitude and tendencies in focus, he was educated and thereby values ​​ instilled in him were such that he could contribute well in the society.


10) Upanayan Sanskār: 'Upanayan' means 'to take near or very close'. To become a good human being, a child needs more knowledge than he has got untill now at home. He has to go to a teacher to gain more knowledge. This sanskār is performed some time before the child leaves for Gurukul. The main act of this rite is to wear 'yajyopavīt'. The child wears a sacred thread (a thin cord, composed of three cotton strands). This sacred thread is also called 'Yajya Sutr' or 'Jenau'. The symbolic meaning of wearing it is that the child is starting to read and write. Yajyopavīt can also be said to be the symbol of learning. It is worth considering that how could one remain illiterate in a country where this culture was prevalent. The 'Upanayan' ceremony of every boy and girl was compulsory. (Unfortunately, in present-days among Hindus there are people who say that 'yajyopavīt' is forbidden for girls.) You can imagine how the children and their parents would have felt in the society if they did not perform the 'Upanayan Sanskār' of their children. It is said that in some regions children were supposed to wear the 'yajyopavīt' above their clothes so that everyone could see that the child is seeking education.


Yajyopavīt is worn by a person over the left shoulder and under the right arm. It is put around the neck in such a way that it sits over the left shoulder goes over the chest towards the right side of the waist. On the chest of a person it is above the place of his heart. Its three cords remind a person of the 3 debts lying on his heart. We are indebted to all those who have contributed to make our life safer and better. These 3 debts are :-


1. Rishi-Riṇ

2. Pitri-Riṇ

3. Dev-Riṇ


Rishi-Riṇ: is the debt of sages who acquired worldly and spiritual knowledge through observation, rumination and meditation which they passed on to us. The saints guide us to the right path by giving constant sermons and making us aware of our weaknesses and mistakes.


Pitri-Riṇ: we are in debt of parents, family, gurus, teachers, friends, kings (state) etc. all those who give us protection and safe environment. They also make us aware of our mistakes, help us in rectifying them so that our life can be better. (If we look at father in the broad sense of 'one who makes things achievable' rather than one who gives birth, we will be able to understand Pitri Riṇ better and easily.)


Dev-Riṇ: To understand 'Dev-Riṇ', we have to understand who is 'Dev'. Our sages in the Vedic era have called all those who give us anything for life, as 'Dev'. 'Devo Dānātvāh', the one who gives us charity is 'Dev'. According to this definition, Sun, Moon, river, stars, planets, vegetation, animals and birds, etc. are 'Dev'. We can repay their debt by serving them (protecting them).


11) Vedārambh Sanskār: According to Hindu scriptures knowledge leads to enlightenment. An educated person not only develops himself but also contributes toward the development of the society and the country. Along with the 'Upanayan' ceremony, there is another rite which is called 'Vedārambh Sanskār'. From the name of this sacrament itself, we can understand that it is the sacrament to begin the study of the 'Veds'. At present we can consider this sanskār as 'Vidyarambh Sanskār'.


For Hindus Veds are the root of arts, educational streams, scriptures, etc., hence it has been called Vedārambh Sanskār in ancient times. Presently education is limited to vocational education only.


In this 'Vedārambh sanskār', the student is informed about the rules of a celibate life. He is guided on how to make his life ‘sātvik’ (pure and simple). In student life, indulgences and luxuries are prohibited. He has to be in a strict and disciplined life routine. He is introduced to different rules and regulations which he will have to follow. Our sages had set high ideals for the student from the first day of his studies. In the present society the school imparts only vocational education. Today, the child gets the conduct and behavior education mainly in the street, neighborhood and in the family. The luxuries and comfort during student-life are on rise and the results can be seen everywhere. In Vedic culture, the task of Guru and Gurukul was to give a universal education to the students (not today's prevailing education but an education in which practical-education, character-building, vocational-education, cultural-education, and spirituality were included) so that, the 1) Intellectual Quotient (IQ), 2) Emotional Quotient (EQ), 3) Social Quotient (SQ) and 4) Adverse Quotient (AQ) could develop in the student (see: Hum Naa Bhooleen-02). Guru and Gurukul were the pillars of better-human and -society building. . (To continue :- )


Let us not forget that

  • Knowledge is the best wealth. It cannot be stolen by thieves, nor can it be snatched by the king (administration). It is not difficult to handle and is also not subjected to division in the family. It increases on sharing (on giving to others).

  • Before accepting a statement, it is advisable to know its facts. Have a clear understanding before making the conclusion.

  • Karm is the path to attain truth and truth can not be experienced by believing in superstitions but only through logic and intellect.

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