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इस विश्व का कोई भी देश भारत की भाँति संस्कृति और विरासत में समृद्ध नहीं है। यह देश न केवल भिन्न धर्मों, मजहब, मत-मतांतरों वालों का, आस्तिकों व नास्तिकों का ही घर नहीं है अपितु अनेकों दुर्लभ जीव-जंतुओं, वनस्पति की भी जीवन-भूमि है। वर्ष में छह ऋतुएँ भी तो कहीं और नहीं मिलती। भाषा, भोजन, वेश-भूषा की अपार विविधता होने पर भी यह देश आज अपने पुरातन गौरव को खो चुका है। १९४७ (1947) में स्वतंत्र होने के पश्चात भारत की अपनी उपलब्धियों को हमें भूलना नहीं चाहिए परन्तु समर्थवान व सक्षम होने के लिए अभी हमें बहुत कार्य करना है।

 

सन १९९९ (1999) से पूर्व विदेश में भारत की पहचान एक दीन-हीन देश के रुप में थी। विदेशी भारत की जनसंख्या, निरक्षरता, गरीबी, जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था, मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी न होना, शहरों में बढ़ते प्रदूषण आदि की चर्चा कर भारतियों को नीचा और असक्षम दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे।  १९९९ में जब "वाई टू के" की समस्या के समाधान के लिए "आई टी" क्षेत्र के भारतीय युवक-युवतियों ने विदेशों में जा कर अपने परिश्रम व लगन का उदाहरण दिया तब से भारत की छवि विदेशों में बदलने लगी और देश में प्रौद्योगिकी साधारण जन-मानस की पहुंच में आनी आरम्भ हुई।     

आज प्रौद्योगिकी जन-साधारण के हाथों में है जिसका वह सदुपयोग अथवा दुरुपयोग कर सकता है। सही शिक्षा व सही ज्ञान होने पर ही प्रौद्योगिकी, विज्ञान, सार्वजनिक, धर्मार्थ और निजी माध्यमों का सही व उत्तम उपयोग संभव है। सार्वभौमिक शिक्षा ही व्यक्ति को सफलता की ओर ले जा सकती है और प्रौद्योगिकी से शिक्षा निर्धन और वंचित को भी उपलब्ध कराई जा सकती है। 

द्वितीय विश्व-युद्ध के पश्चात इज़राइल का जन्म हुआ था। ​जर्मनी व जापान की युद्ध में बहुत हानि हुई थी। इन तीनो ही देशों ने प्रौद्योगिकी का सहारा ले अनेकों उपलब्धियाँ पाईं। आज दक्षिण-कोरिया विश्व-पटल पर अपनी छाप बना रहा है। ऐसा क्या हुआ कि उस समय के बलवान व सक्षम देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, और यहां तक की अमरीका विश्व मानचित्र पर आज ३० वर्ष पहले जैसा स्थान नही पाते है। हम थोड़ा चिंतन करेंगे तो पाएँगे की इन देशों के नागरिकों ने प्रौद्योगिकी को अपनाया और इसे आधुनिकता समझ अपनी पुरानी संस्कृति को छोड़ना आरम्भ कर दिया (यदि पुरानी संस्कृति से जुड़े रहे तो "मॉडर्न" नहीं बन सकते)। जर्मनी की युवा पीढ़ी भी धीरे-धीरे अपनी पुरानी संस्कृति छोड़ती जा रही है। इन देशों (यूरोप के लगभग सभी देशों) के सामान्य नागरिक का जीवन-स्तर निरंतर गिर रहा है। इसके विपरीत इज़राइल, जापान व दक्षिण-कोरिया आज भी अपनी संस्कृति से जुड़े हुए है और अपनी पुरानी संस्कृति के प्रति उदासीन नहीं है और उसका बराबर सम्मान करते हैं।

 

विज्ञान व प्रौद्योगिकी हमें ऊँचे शिखर प्राप्त कराते है तो संस्कृति धरातल से जोड़े रखती है और ढृढ़ धरातल प्रदान करती है। विज्ञान और संस्कृति का मेल व समन्वय वट-वृक्ष की भाँति है जिसकी कुछ शाखाएँ शिखर की और बढ़ती हैं तो उनमें से कुछ धरातल की ओर बढ़ कर उसी वृक्ष की जड़ बन कर न केवल वट-वृक्ष को अधिक शक्ति प्रदान करती हैं अपितु अन्य शाखाओं को शिखर की और बढ़ने की संभावना को भी प्रबल करती हैं व वट-वृक्ष के क्षेत्रफल व आयु की भी वृद्धि करती हैं। 


केवल विज्ञान अथवा केवल संस्कृति दीर्घ-काल तक अपने लिए शीर्ष स्थान सुनिश्चित नहीं कर सकते। विज्ञान व संस्कृति का मेल ही आपको समाज के कल्याण के लिए नित नई उपलब्धियाँ प्राप्त करवा शिखर-पटल पर स्थान सुनिश्चित कर सकता है। 

"हम न भूलें" वेबसाइट भारत के इतिहास को दर्शाने का और ऐतिहासिक घटनाओं को न भूलने अपितु उनसे सीख ले अपने वर्तमान व भविष्य को सवांरने का एक छोटा सा प्रयास है। 

इस प्रयास हेतु : लेख ब्लाग 

No country in this world is as rich in culture and heritage as India. This country is not only home to different religions, sects, believers and atheists, but also boasts many rare flora and fauna. Where else would you find six seasons in a year. Despite the varied diversity in language, food and dress, the country is losing its old pride. After becoming independent in 1947, the achievements of India must not be forgotten yet a lot remains to be done to become competent and capable.

Prior to 1999, India was recognized abroad as a poor and downtrodden country. Foreigners sought opportunity to scorn India by highlighting its population, illiteracy, poverty, poor health system, inadequate fulfillment of basic needs, increasing pollution in cities, etc. It was after 1999, when young Indian IT professionals went abroad to solve the "Y2K" problem and gave an example of their hard work and dedication that the image of India began to change and the era of accessible technology for the common man started in India.

 

Today, technology is available to public and can be used or misused. Only through the right education and knowledge, will the proper and best use of science and technology, medium (public, charitable & private) be possible. A universal education can lead a person to success, and technology can help in making education available to the poor and deprived.

 

Israel was born after World War II while Germany and Japan suffered a lot in the war. By resorting to technology these three countries have set a mark in the world through their achievements. Today, South Korea is also creating a mark on the world stage. What went wrong that the powerful and capable countries of that time, like Britain, France, Italy, and even America, do not enjoy the same place on the world stage today as compared to 30 years ago. If we ponder a little, we will find that the citizens of these countries adopted technology, considered it modern and started neglecting their old culture (Adhering to the old traditions would not make them modern). The younger generation of Germany is also gradually distancing from its long standing traditions. The living standard of ordinary citizens of these countries (almost all countries of Europe) is declining and life is getting harsh. On the contrary, Israel, Japan and South Korea are still attached to their culture and respect it.

 

Science and technology make us attain new heights, and our culture and heritage keeps us connected to the ground and provides a strong base. The combination and coordination of science and culture is like a banyan tree. Some branches of this tree rise towards the sky and some of them grow towards the ground and become the root of the same tree, hence not only give more strength to the banyan tree but also enhance the possibility of further growth of other branches and also increase the area and age of the tree.

 

Only science or only culture and heritage alone cannot sustain on the top by themselves for long. It is the healthy combination of science and culture that enables you to gain new achievements for the welfare of the society that can ensure you a place at the top.

 

The "Hum Naa Bhooleen" website is a small attempt to showcase India's history and so as to not to forget historical events, but instead learn from them to groom our present and future.

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